अवैध पटाखा फैक्टरियों में होते विस्फोट

देश के तीन बड़े राज्यों महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान में कुछ ही दिनों के अन्तराल पर तीन भिन्न पटाखा फैक्टरियों में हुए विस्फोटों में लगभग 45 लोगों के मारे जाने की घटनाओं ने लोगों को दहला कर रख दिया। इन विस्फोटों में बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए। इनमें से एक घटना महाराष्ट्र के ज़िला नागपुर में घटी जहां एक पटाखा फैक्टरी में हुए एक भीषण विस्फोट में 17 लोग मारे गये, और 18 अन्य घायल हो गये। घायलों में कई लोगों की स्थिति बेहद गम्भीर बनी थी जबकि मृतकों में से कइयों के चीथड़े उड़ गये। दूसरी घटना इससे एक ही दिन पूर्व आन्ध्र प्रदेश के काकिनाड़ा ज़िले में घटित हुई जहां कम से कम 21 लोगों की मौत हुई जबकि अनेक अन्य घायल हो गये। गम्भीर रूप से घायलों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया। तीसरी घटना इससे चार दिन पूर्व राजस्थान में हुई जहां एक अवैध पटाखा फैक्टरी के विस्फोटक पदार्थों में हुए विस्फोट के कारण सात लोग मारे गये, और दो अन्य गम्भीर रूप से घायल हो गये।
 घटना के समय इस अवैध पटाखा फैक्टरी में बीस लोग कार्यरत थे जिनमें से 11 विस्फोट होने के बाद किसी तरह से बच कर बाहर निकल आए थे।  इस फैक्टरी का लाईसैंस मूल रूप से रैडीमेड परिधान तैयार करने का है किन्तु अवैध तौर पर इसमें चिरकाल से पटाखों की विभिन्न किस्मों का उत्पादन किया जा रहा था। भारत उत्सवों और त्योहारों का देश है। यहां प्रत्येक त्योहार-उत्सव पर बड़ी मात्रा में आतिशबाज़ी किये जाने की परम्परा है। देश में अभी त्योहारों एवं उत्सवों का मौसम बेशक शुरू नहीं हुआ है किन्तु आतिशबाज़ी के निर्माण का कार्य  देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में आज भी पूरी गति से जारी है। इन दुर्घटनाओं को इसलिए भी गम्भीर श्रेणी में आंका जा रहा है क्योंकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन्हें लेकर खेद जताया। 
प्रधानमंत्री की टिप्पणी के बाद स्थानीय प्रशासनों की ओर से व्यापक-स्तरीय जांच के आदेश जारी किये गये किन्तु आश्चर्य की बात है कि अक्सर ऐसी भीषण घटनाओं के तत्काल बाद एकाएक सतर्कता में आ जाने वाला सम्बद्ध स्थानीय प्रशासन, घटनाओं से पहले हरकत में क्यों नहीं आता। जिस ज़िला एवं प्रदेश प्रशासन को कपड़ों की इस फैक्टरी के अवैध पटाखा फैक्टरी होने का पता दुर्घटना के बाद चला, उसने इससे पहले इस अवैध स्थल पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? यह भी कि जिन फैक्टरियों में त्योहारी मौसम न होने के बावजूद निर्माण-कार्य चल रहा था, नि:संदेह वहां का माल अन्य राज्यों में भी उपलब्ध होता होगा। इतने बड़े स्तर पर आतिशबाज़ी की किस्मों को बनाने वाली अवैध फैक्टरियां किसी भी प्रशासन की आंखों में कभी न रड़कें, यह कैसे सम्भव हो सकता है। 
अवैध पटाखा फैक्टरियों में इस प्रकार के विस्फोट की यह कोई पहली घटना नहीं है। देश के अनेक राज्यों में ऐसी कई अवैध पटाखा फैक्टरियां अभी भी चल रही होंगी। निश्चित रूप से इनमें से कई ऐसी दुर्घटनाओं के कगार पर भी होंगी। चेन्नई में भी एक मकान में चल रही एक अवैध फैक्टरी में विस्फोट से चार लोगों की मृत्यु हुई थी। पंजाब में वर्ष 2020 के बाद के पांच वर्षों में अवैध पटाखा फैक्टरियों में हुए पांच बड़े हादसात में कम से कम 32 लोग मारे गये जबकि चार दर्जन से अधिक लोग घायल भी हुए थे। इन अवैध पटाखा फैक्टरियों में हुए विस्फोटों में लाखों रुपये की सम्पत्ति की हानि भी हुई। ऐसी घटनाओं के बाद जांच समितियां भी बनीं, किन्तु अधिकतर मामलों में जांच रिपोर्ट सार्वजनिक ही नहीं की गईं। जिन जांच रिपोर्टों को सार्वजनिक किया भी गया, उन पर क्या कार्रवाई हुई, यह किसी को भी पता नहीं चला।
हम समझते हैं कि अधिकतर ऐसी अवैध पटाखा फैक्टरियों के तार भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र से जुड़े होते हैं। किसी दुर्घटना के बाद भी प्रशासन के कुछ भ्रष्ट तत्व अपने विशाल डैनों के नीचे इनकी विकरालता को ढंक लेते हैं। ऐसी घटनाओं के पीछे मूल रूप में अनुचित लाभ और जल्दी अमीर होने की लालसा ही ज़िम्मेदार होती है। ऐसी घटनाओं का शिकार समाज के गरीबी की चक्की में दबे-पिसे लोग ही बनते हैं जो थोड़े से पैसे के लालच में ऐसे खतरनाक कार्य को करने हेतु राज़ी हो जाते हैं। इस वर्ष का त्योहारों का मौसम बेशक अभी आने वाला है किन्तु आतिशबाज़ी का मौसम पूरा वर्ष बना रहने लगा है। इसलिए यह अवैध कारोबार भी अब वर्ष भर चलने लगा है। अदालतों के कड़े नियमों-निर्देशों के बावजूद न तो आतिशबाज़ी का निर्माण सका है, न इसके वैध-अवैध कारोबार पर ही अंकुश लगा है। ऐसे अधिकतर विस्फोट अक्सर अवैध फैक्टरियों में ही होते हैं। आतिशबाज़ी से पर्यावरण और ओज़ोन की परत को भी नुक्सान पहुंचता है। हम समझते हैं कि सरकार की इच्छा-शक्ति, प्रशासनिक सर्तकता और जन-साधारण की नैतिक प्रतिबद्धता से ही इस अवैध और अनुचित कारोबार पर थोड़ा-बहुत अंकुश अवश्य लगाया जा सकता है। 

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