पश्चिम बंगाल-कड़ा चुनाव मुकाबला
आगामी अप्रैल के महीने में असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में चुनाव होने जा रहे हैं। हर एक राज्य में अलग-अलग मुद्दों को लेकर इन चुनावों में लोगों की बड़ी दिलचस्पी देखी जा सकती है। इस समय राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक दिलचस्पी के साथ पश्चिम बंगाल के चुनाव को देखा जा रहा है। इसके कई बड़े कारण भी हैं। तृणमूल कांग्रेस पिछले 15 वर्ष से यहां शासन कर रही है। ममता बनर्जी का इस पूरे समय में केन्द्र सरकार के साथ अनेक मुद्दों पर सीधा टकराव हुआ है। इस कारण यह सरकार व्यापक स्तर पर लगातार चर्चा में रही है। कभी इस राज्य में कांग्रेस की तूती बोलती थी। फिर मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व में वामपंथी सरकारों ने यहां लम्बा समय शासन किया और पिछले तीन कार्यकाल तक ममता ने यहां नगारे की चोट पर शासन किया है।
अब भी विधानसभा में सदस्यों की स्थिति भी बड़ी दिलचस्प है। यहां कुल सीटें 294 हैं। इनमें तृणमूल कांग्रेस की सीटें 224 हैं और इसी ही समय में उभरी दूसरी पार्टी भाजपा के पास 65 सीटे हैं। शेष सभी पार्टियों के हिस्से मात्र 6 सीटें ही आई हैं। इनमें राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के हिस्से में एक सीट भी नहीं है। इस तरह अभी भी चुनाव मुकाबला इन दोनों पार्टियों में ही बना दिखाई दे रहा है। कांग्रेस भी प्रदेश की विधानसभा में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए हाथ-पांव मार रही है और दूसरी तरफ वामपंथी पार्टियों के गठबंधन में मार्क्सवादियों सहित 7 पार्टियां चुनाव मैदान में हैं। इसके अतिरिक्त बहुजन समाज पार्टी और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन भी चुनाव मैदान में उतरी हुई हैं। पिछले कुछ महीनों से एस.आई.आर. को लेकर राज्य में भी और देश भर में भी बड़ा टकराव पैदा हुआ है, जहां तृणमूल कांग्रेस लगातार इस कवायद में लाखों ही वोट काटे जाने का प्रत्येक स्तर पर विरोध कर रही है। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंच चुका है। वहां चुनाव आयोग इस कवायद के पारदर्शी और पूरी तरह निष्पक्ष होने का दावा कर रहा है।
विगत दिवस ममता बनर्जी ने 291 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। मात्र 3 सीटें गोरखा जनजाति मोर्चे के लिए छोड़ी हैं। इसके साथ ही ममता ने 74 विधायकों का पत्ता काट दिया है और 15 विधायकों की सीटें बदल दी हैं। नए घोषित उम्मीदवारों की सूची में 13 ऐसे व्यक्ति हैं, जो कुछ समय पहले तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे। इस घोषणा ने पार्टी कतारों में बड़ा विवाद पैदा कर दिया है और ज्यादातर स्थानों पर इस संबंध में भारी विरोध भी होने शुरू हो गए हैं। चाहे ममता बनर्जी द्वारा टिकटों में यह बदलाव अपने विधायकों की पिछली लम्बी कारगुज़ारी के दृष्टिगत और लम्बे समय से प्रशासन में आई त्रुटियों को महसूस करके किए गए होंगे, परन्तु मौजूदा 224 विधायकों में से सिर्फ 135 का पुन: चयन करने से कुल 40 प्रतिशत नामों को काट दिया गया है। ममता ने इस बार भवानीपुर की सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा की है। उसके समक्ष भाजपा के प्रभावशाली नेता शुभेंदू अधिकारी जो कभी ममता के साथी रहे हैं, दोबारा खड़े हुए हैं।
ममता 2021 में शुभेंदू के खिलाफ नंदीग्राम से चुनाव लड़ी थीं लेकिन वह 1956 मतों से हार गई थीं। इसके बाद उन्होंने भवानीपुर का उप-चुनाव जीता था। तृणमूल की शक्ति का केन्द्र अभी तक भी ममता बनर्जी बनी हुई हैं। इस पार्टी के पास मज़बूत संगठनात्मक ढांचा है परन्तु लम्बे समय तक सत्ता में रहने के कारण इसमें व्यापक स्तर पर नाराज़गी और भ्रष्टाचार ज़रूर बढ़ा है। व्यापक स्तर पर गुटबाज़ी भी दिखाई दे रही है। दूसरी तरफ वर्ष 2001 में राज्य के चुनाव में भाजपा को 5 प्रतिशत वोट ही मिले थे, जो आज बढ़ कर 39 प्रतिशत हो चुके हैं। इन दोनों पार्टियों के मुकाबले में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां अपने अस्तित्व के लिए हाथ-पांव मारती ही दिखाई दे रही हैं। इस तरह से इन दोनों पार्टियों के लिए यह चुनाव जीतना प्रतिष्ठा का सवाल बना दिखाई देता है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के अतिरिक्त वरिष्ठ केन्द्रीय नेताओं ने लगातार यहां के दौरे किए हैं। दूसरी तरफ ममता अपने दम पर ही पूरे विश्वास और साहस के साथ चुनाव मैदान में उतरी हैं। नि:संदेह इस प्रदेश के चुनाव परिणाम राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की समर्था रखते हैं।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

