ज्ञान और रौशनी का स़फर
भारत कई सदियों तक विदेशी ताकतों के अधीन रहा, जो इस देश को लूटने आते और राजा बनकर बैठ जाते। ये शासकों और उनके सहयोगी भारत वासियों पर इतना अत्याचार करते थे कि किसी की भी इज़्ज़त, जीनव तथा धन-सम्पत्ति सुरक्षित नहीं थी। विदेशी हमलावर तो जो ज़ुल्म करते थे, सो करते थे, परन्तु जो पाप पूरे भारत में जड़ जमा चुका था, वह भी कहनी और कथनी से बाहर था। यहां के राजा और तथाकथित ऊंची जातियों के कहलाने वाले अपने ही लोगों पर ज़ुल्म की हदें पार कर चुके थे। भारत के लोग अलग-अलग जातियों में बंटे हुए थे, जिनमें एकता नहीं थी। ऐसे हालात का विदेशी हमलावर खूब फायदा उठाते रहे और इस देश को, इसकी सम्पत्ति को, इसके लोगों को लूटते रहे। विदेशी हमलावरों में तो यह कहावत भी प्रसिद्ध हो गई थी कि यह ब़ेगैरत लोगों की धरती है, इसे जितना चाहो लूटो, जो चाहो करो, ये लोग कुछ भी मुंह से नहीं बोलते, आह तक नहीं करते।
गुरु नानक देव जी का प्रकाश 15 अप्रैल, 1469 ईस्वी को ननकाना साहिब की धरती पर हुआ था। एक ऐसा प्रकाश जिसके पास अंधेरा अब तक भी नहीं जा सका। उन्होंने हक-सच नारा बुलंद किया और बताया कि सब एक ही हैं।
उन्होंने जात-पात के कोढ़ और असमानता को खत्म करने के लिए लोगों को शब्द रूप, साहस, ध्यान, ज्ञान दिया। ज्ञान भी ऐसा कि शब्द का प्रकाश लोगों के अंधेरे मन को रौशन करने लगा।
हिंदू पहाड़ी लोगों को ये सब बातें अच्छी नहीं लगीं। उन्होंने कई बार दशम पातशाह पर हमला भी किया, लेकिन मुंह की खाकर शर्मसार हुए। जब कोई बस नहीं चला तो बाईधार के राजा झूठी कहानियां लेकर मुगल दरबार में पहुंच गए। आगे झूठों ने भी झूठों पर तुरंत विश्वास कर लिया। औरंगज़ेब के आदेश पर सूबा सरहद, लाहौर, कश्मीर और बाईधार के राजाओं ने मिलकर आनंदां की पुरी को घेर लिया, लेकिन छह-सात महीने जब जीत नसीब नहीं हुई तो बाईधार के हिंदू राजाओं और मुगलों ने गुरु जी के सामने गायों और कुरान की कसमें खाईं कि वह यह किला खाली कर दें, तो उन्हें रास्ते में कोई नहीं रोकेगा, लेकिन हुआ इसके विपरीत।
औरंगज़ेब और बाईधार के हिंदू राजाओं और रंघड़ों ने सिरसा के तट पर गुरु जी के काफिले पर हमला कर दिया। सिरसा का किनारा, कोटला निहंग, चमकौर की गढ़ी, सरहिंद की दीवार, खिदराने का ढाब, माछीवाड़ा का जंगल आज भी धर्म युद्ध के गवाह हैं। जो कलंक बाईधार के हिंदू राजाओं और मुगल बादशाह ने कमाया, वह आज भी जस का तस है।
गुरु नानक पातशाह का जो ‘एक’ का उपदेश था, वह दसवें जामे तक आकर पूरा प्रवान चढ़ गया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी आज भी हमें प्यार सिखाते हैं, इंसानियत सिखाते हैं, दुश्मनों से कैसे मुक्त होना है, यह बताते हैं। 234 पृष्ठों की लोकगीत प्रकाशन (मोहाली) द्वारा प्रकाशित ‘ज़फरनामा—जित्त दी चिट्टी’ गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखी हुई एक शाहकार लिखित है। यह दशम ग्रंथ साहिब में सुशोभित है।
बहुत-से विद्वान कहते हैं कि 111 शे’अर ही जीत की चिट्ठी के हैं, लेकिन साथ जो 11 हिकाइतें हैं, वे इंसान के भीतर, इंसान को आईना दिखाने की योग्यता रखते हैं। वैसे भी इंसान दूसरों की कमियां जल्दी देखता है। यही वजह है कि गुरु जी ने ज़फरनामा में यह जो लिखा है, उससे औरंगज़ेब के मन को अवश्य झटका लगा होगा। इस सारी लिखित में गुरु जी ने औरंगज़ेब को अपने खुद के कर्म देखने की नसीहत की है।
अंतिका
(पातशाही 10वीं)
देह सिवा बर मोहि इहै सुभ करमन ते कबहूं न टरों।।
न डरों अरि सो जब जाइ लरों निसचै कर अपनी जीत करों।।
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