अनेक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं लघु उद्योग
आज के लिए विशेष
महात्मा गांधी ने चरखे को हर घर में पहुंचा कर देश को आत्म-निर्भरता का पहला पाठ पढ़ाया। चाहे आज उद्यम के पास 6 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि बेटा बाप की दुकान या कारखाना संभाल रहा है और बैंक से कज़र् मांग रहा है। किसी इंस्पेक्टर को चाय-पानी पिला रहा है। यही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) की कहानी है। 27 जून को विश्व एमएसएमई दिवस के रूप में मनाया जाता है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से : अंग्रेज़ों ने भारत को गुलाम बनाये रखने के लिए यहां से कच्चा माल अपने देश ले जाकर वहां निर्माण करके यहां लाकर मनमानी कीमत पर बेचने से शुरुआत की। इसका मुकाबले करने के लिए स्वदेशी आंदोलन और ‘विदेशी कपड़ा जलाओ’ का नारा दिया गया जो पूरे देश में गूंज उठा। गांव का जुलाहा, कुम्हार, लोहार, बढ़ई इससे जुड़ा और किसान की कृषि संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने लगा। उसका आंगन कारखाना बन गया जिसने ज़ीरो पूंजी पर हुनर सौ प्रतिशत दिया। महात्मा गांधी जब भारत आए और पूरे देश का भ्रमण कर गरीबी को देखा तो चरखा आत्म-निर्भरता का ही नहीं, अपितु स्वतंत्रता प्राप्ति का हथियार बन गया। लाखों कारीगरों के खादी यूनिट खुल गए जो आज के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) की नींव बने।
आज़ादी के बाद लाइसेंस राज शुरू हुआ और सरकार की इजाज़त और छत्रछाया के बिना किसी भी हुनरमंद के लिए कुछ भी करना असंभव हो गया। चाहे सरकार ने कहा कि छोटे उद्योगों को देश की रीढ़ होने का दावा किया, लेकिन इतनी बंदिशें लगाईं कि ये खत्म होने लगे। 1960 में जब एसएसआई में रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ तो इसकी निवेश सीमा 5 लाख रुपये थी, लेकिन बिजली कनेक्शन के लिए 2 साल तक इंतज़ार करना पड़ता था। लाइसेंस के बिना पेच एक पेच तक ठीक नहीं कर सकते थे, परन्तु इंस्पैक्टर राज में रिश्वत देकर कुछ भी करवा सकते हैं।
उदारीकरण का तौहफा : 1991 में लाइसेंस राज खत्म करके एमएसएमई कानून लागू किया गया। एसएसआई की सीमा 1 करोड़ रुपये तक बढ़ा दी गई। 675 आइटमें रिज़र्व रखी गईं। पर चीन का सामान 1995 के बाद बाज़ार में आने लगा तो सूरत का डायमंड, तिरुपुर और लुधियाना में हौज़री से मशीनों के निर्यात पर निर्भरता बढ़ गई। 2005 तक एमएसएमई इकाइयों की संख्या बढ़ कर 1.19 करोड़ हो गई, परन्तु 675 आरक्षित अइटमों में से 500 ‘डी-रिज़र्व’ हो गईं। बड़े उद्योग ने सीधा वही बनाना शुरू कर दिया जो एमएसएमई इकाइयों बनाता था। सरकार ने इन इकाइयों को बड़े उद्योगों से मुकाबला करने के लिए कह कर इन्हें बड़ा झटका दिया। मनमोहन सिंह सरकार में एमएसएमई विकास एक्ट पास हुआ और पहली बार ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम’ की परिभाषा बनी। उत्पादन-सेवा दोनों। 45 दिन भुगतान का कानून बना। 2006-07 तक 1.26 करोड़ यूनिट लगने से 11 करोड़ रोज़गार और आजीविका के साधन पैदा हुए। फिर वायदों की झड़ी लग गई, परन्तु इन इकाइयों को सबसे बड़ा झटका 2016 की नोटबंदी होने और 2017 में जीएसटी के लागू होने से लगा। इनमें 35 प्रतिशत इकाइयों नकदी प्रवाह बंद होने के कारण बंद हो गईं । उद्योग आधार पर 90 लाख यूनिटों में 40 प्रतिशत कागज पर हैं।
नाम मिला, परन्तु सम्मान नहीं : कोलेट्रल लोन मिलने की योजना के होते हुए भी सभी बैंक ज़मीन-जायदाद की गारंटी के बिना रजिस्ट्रेशन नहीं करते। 2020-2026 के उद्यम युग के दौरान पंजीकरण हुए लेकिन रोजगार अलोप होने लगा। कोविड ने 37 प्रतिशत यूनिट बंद करा दिए लेकिन जून 2026 तक 6.29 करोड़ उद्यम हैं। सिर्फ 3.8 करोड़ ही सक्रिय हैं। महिला उद्यमी लगभग एक चौथाई हो गईं, लेकिन उन्हें भीजद्दोजहद से मुक्ति नहीं मिली। 2022-25 के दौरान कच्चा माल 40 प्रतिशत महंगा हो गया है। सौ साल में मुहल्ले की दुकानों की संख्या 4 लाख से बढ़ कर 6 करोड़ हो गई है। जब खादी ने दस लाख रोज़गार दिए पर तब इसका सम्मान था, परन्तु आज 11 करोड़ लोग स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होने के बावजूद सरकार की मज़र्ी के बिना कोई फैसला नहीं ले सकते। पूछना पड़ता है। प्रशासन या बैंक बाबुओं को मनाना पड़ता है। छोटा उद्यमी बाबूओं और बड़े ब्रांड से लड़ रहा है।
दुनिया की फैक्ट्री बनाम भारत का बटन : विदेशों में किसी यूनिट के विफल होने पर सरकार पुन: खड़ा करने के लिए टैक्स माफ कर देती है, परन्तु भारत में ऐसा होने पर 7 वर्ष तक कोई कज़र् नहीं दिया जाता। विषमता देखिए, चीन ने 40 साल में मछुआरों को अरबपति बना दिया, परन्तु इतने समय में हम कारीगरों को ‘निर्यात मज़दूरों’ में बदल देते हैं। सारा अंतर ‘नीति और नीयत’ में है। चीन ‘चैंपियन’ बनाता है, भारत ‘बिक्रेता’ बनाता है। चीन का लड़का 25 साल में ड्रोन कंपनी खोल लेता है, परन्तु हमारे यहां बेटा अपने पिता की 20 मशीन वाली फैक्ट्री संभालता है। अमरीका का बच्चा एआई बनाता है। भारत में बड़े ब्रांड का ठप्पा लगाता है और ‘साहब का ऑर्डर’ पूरा करता है। वहां गैराज से गूगल, ऐपल, मेटा, टेस्ला निकल कर दुनिया में छा जाते हैं और हम उनमें नौकरी पाकर खुश हो जाते हैं। जब तक एमएसएमई को ‘लेबर’ की बजाय ‘नेता’ नहीं मानेंगे, तब तक 6 करोड़ संख्या से जीडीपी नहीं बदलेगी। सरकार लोगों को उद्यमी बनने को प्रोत्साहन तो देती है, लेकिन नियमों और कानून का हवाला देकर उन्हें बेड़ियों में जकड़ देती है। लोग अपना सपना त्याग कर नौकरी ढूंढते हैं और न मिलने पर आत्म-हत्या तक कर लेते हैं। दरअसल, इस हत्या का कारण सरकारी सिस्टम होता है।



