एक बार का आपातकाल : हमेशा के लिए एक चेतावनी

‘आपातकाल’ शब्द बेचैनी और चिंता का भाव पैदा करता है। इसका सामान्य अर्थ यह होता है कि किसी बड़े उद्देश्य के लिए कुछ समय के लिए सामान्य नियम और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं रोक दी जाएं। हालांकि, सभी आपातकाल एक जैसे नहीं होती। उदाहरण के लिए अस्पतालों में आपातकालीन सेवाएं लोगों का जीवन बचाने और संकट के समय तत्काल सहायता प्रदान करने के लिए काम करती हैं। वहीं, वैश्विक स्तर पर युद्ध, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियां भी एक प्रकार का आपातकाल हैं। इनसे निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को मिलकर काम करना होगा और छोटी सोच से ऊपर उठना होगा। आज पूरा देश ‘संविधान हत्या दिवस’ मना रहा है। 1975 में लागू आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास पर एक अमिट धब्बा है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। आधी सदी बीत जाने के बाद भी उस अंधकारमय और दर्दनाक दौर की यादें ‘लोकतंत्र की जननी’ भारत को हिला देती है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। साथ ही, यह हमें उन कठिन संघर्षों और बलिदानों की भी याद दिलाता है जिनके कारण हमें स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक के अधिकार प्राप्त हों। इतिहास के इस सबसे कठिन दौर से सीख लेते हुए, हमें अपने लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए। 
हमारा संविधान इन शाश्वत लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है। डा. भीमराव अंबेडकर ने संविधान को ‘जीवन का वाहन’ बताया था, जिसमें युगों की भावना समाहित है। लेकिन आपातकाल लागू होने से इन बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया गया, जिससे संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की पवित्र भावना को गहरी चोट पहुंची। 
1975 का राष्ट्रीय आपातकाल मात्र एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि इसने भारत में लोकतांत्रिक विचार-विमर्श और सार्वजनिक जीवन के कामकाज को गहराई से प्रभावित किया। इंदिरा गांधी के सत्ता-केंद्रित और स्वार्थी शासन ने संविधान की मूल भावना को दरकिनार करते हुए, नैतिक शासन प्रणाली को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया। 
1971 के लोकसभा चुनावों में अनियमितताएं, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला और उनके इस्तीफे की बढ़ती जन-मांग, भारत में आंतरिक अशांति नहीं थी। वास्तव में यह संकट इंदिरा गांधी के लिए ही था, जो लंबे समय से वंशवाद की राजनीतिक विरासत से लाभ उठा रही थीं, लेकिन उनके इस राजनीतिक संकट से निपटने के लिए ‘आंतरिक अशांति’ के नाम पर पूरे देश में आपातकाल लगाना एक गंभीर और गलत निर्णय था।
घटनाओं का क्रम इंदिरा गांधी की लोकतंत्र विरोधी मानसिकता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। 19 मार्च 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान, वह अदालत में गवाही देने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय संख्या 24 ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायालय ने उनके चुनाव को रद्द कर दिया और उन्हें 6 वर्षों के लिए किसी भी निर्वाचित पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। 
इसके बाद इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। 24 जून 1975 को सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर सशर्त रोक लगा दी। न्यायालय ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में संसद की कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दी, लेकिन अंतिम निर्णय आने तक उन्हें संसद में मतदान करने और वेतन प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी। 
इसी दौरान 25 जून, 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुई एक विशाल जनसभा ने इंदिरा गांधी पर इस्तीफा देने का दबाव और बढ़ा दिया। देश भर में विभिन्न राजनीतिक दलों और जनता की ओर से उनके इस्तीफे की मांग तेज़ हो गई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय जैसे संवैधानिक निकायों के निर्णयों से निराश होकर इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने का निर्णय लिया। 25 जून, 1975 की मध्यरात्रि को उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को केंद्रीय मंत्रिमंडल की पूर्व स्वीकृति के बिना आपातकाल घोषित करने की सलाह दी। यह सलाह सादे कागज़ पर भेजी गई थी, सरकारी लेटरहेड पर नहीं। 
इसके बाद 26 जून को सुबह 6 बजे मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई गई, जो महज़ एक औपचारिकता थी। इस प्रकार न्यायपालिका की अनदेखी करके और मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी को कमजोर करके, संविधान की मूल भावना को गंभीर रूप से चोट पहुंचाई गई। यह घटना सत्ता के शीर्ष स्तर पर स्थित संस्थाओं की प्रतिष्ठा में गिरावट और राजनीतिक सत्ता को बनाए रखने के लिए अपनाए गए निरंकुश तरीकों का एक उदाहरण बन गई। 
आपातकाल के दौरान प्रैस की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए थे। इससे न केवल पत्रकारों और अपने विचार व्यक्त करने वालों की आवाजें दबाई गईं, बल्कि करोड़ों नागरिकों को सत्य, पारदर्शिता और जवाबदेही तक पहुंच के अधिकार से भी वंचित किया गया।
अतीत के घावों को याद करते हुए, मोदी सरकार ने 11 जुलाई, 2024 को एक राजपत्र अधिसूचना जारी करके 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया। यह दिन उन सभी लोगों के साहस और योगदान को याद करने और सम्मानित करने का अवसर है जिन्होंने राष्ट्रीय आपातकाल का विरोध किया और लोकतंत्र की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित रहे। 
आज जब हम भारतीय लोकतंत्र के उस सबसे काले अध्याय को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में याद करते हैं, तो हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम हर स्तर पर संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को और मजबूत करेंगे। यह दिन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सही मूल्यों को अपनाना और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। तभी हम राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकते हैं और उस भारत के निर्माण में योगदान दे सकते हैं, जिसकी कल्पना स्वामी विवेकानंद ने सदियों पहले की थी। उनके शब्दों में— ‘प्रत्येक राष्ट्र का अपना उद्देश्य होता है, प्रत्येक राष्ट्र के पास विश्व को देने के लिए एक संदेश होता है और प्रत्येक राष्ट्र के पास पूरा करने के लिए एक विशेष मिशन होता है।’ 
आइए, भारत का मानवीय गरिमा, विविधता में एकता, संवैधानिक मूल्यों और निस्वार्थ सेवा का संदेश 21वीं सदी के विश्व में अधिक स्पष्ट और प्रभावी ढंग से गूंजे। यदि हम इन आदर्शों पर दृढ़ रहें, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि लोकतंत्र न केवल जीवित रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए और भी मज़बूत और समृद्ध होता रहे। 

(लेखक भारत सरकार के केन्द्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र चार्ज)
और संसदीय कार्य राज्य मंत्री हैं।)

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