असफलता का महिमा मण्डन
जब सफलता की घोषणा के बावजूद सफलता कहीं नज़र न आये, और हर दौड़ में असफलता ही पल्ले पड़े, तो क्यों न सफलता के श्रम साहस मार्ग को छोड़ कर उसका बातूनी उत्सव मना लिया जाये। तरक्की ़गैर-हाज़िर है तो क्या हुआ? उसकी दर के बढ़ने की अकादमिक घोषणाएं तो हो रही हैं। आइए न क्यों न इन्हीं घोषणाओं का जयघोष करके हर्षित हो जाएं।
लोग कहते हैं, आपकी ज़िन्दगी से हंसी क्या मुस्कान भी गायब हो गई। अट्टहासों की क्या बात करते हो, वह तो अब केवल मंचीय नाचकों में मिलते हैं, या राजनीति की पासा पलट खेलों में वे कहते हैं, आपने बहुत तरक्की कर ली। जब तरक्की के सौ बरस मनाओगे तो हो सकता है, आप इतने विकसित हो जाने की घोषणा के हकदार हो जाओ, कि दुनिया की पहली और दूसरी ताकतों को अपदस्थ कर दो।
हमें पूरा विश्वास है कि ऐसा हो जाएगा, क्योंकि हमारे पास आर्थिक शक्ति कम है तो सांस्कृतिक शक्ति भी तो अकूत ताकत है। सूचकांक में सांस्कृतिक परम्परा और गौरवपूर्ण इतिहास का आधार भी डाल सकते हैं। अपने आप अपनी समकालीन शक्तियों के आर्थिक आधार हिला देंगे। तरक्की बन्द गलियों के आखिरी मकान तक नहीं गई, तो क्या हुआ? हम इन जीर्ण शीर्ण मकानों की छतों पर हज़ारों बरस के गौरवपूर्ण इतिहास के शिलालेख चिपका देंगे। अवश्य लोग अपनी असफलता को इस सफलता की कीमत समझ कर इसका महिमा मण्डन कर देंगे। फिर इसका सम्मान किसी उत्साहवर्द्धक नृत्य के साथ कर सकते हैं। आखिर नृत्य भी तो हमारी लोककलाओं की परम्परा है। पहले कहते थे, डर लगे तो गाना गा। अब कहेंगे, भूख लगे तो अतीत की ओर झांक। जीवन में उपवास के महत्त्व को समझ। उपवास करेगा तो आध्यात्मिक चिन्तन होगा। आध्यात्मिक चिंतन से ही योग ध्यान सम्भव होता है। फिर होता है योग निद्रा का आगमन। आदमी धरती से चार फीट ऊपर शांत वायवीय अहसास में जीने लगता है। मुक्त हो जाने के आनंद में टुच्ची दुनियावी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। भूख, प्यास और काम तलाश की जगह जीवन के नखलिस्तान में अपूर्व शांति का वरण करता है।
किताब पढ़ने की ज़रूरत क्या है जब उससे अधिक ज़रूरी है, आत्म ज्ञान। अपने अन्दर झांक कर देखो। एक नया संसार खुल जाएगा, नये ज्ञानचक्षु खुल जाएंगे। फिर क्या ज़रूरत है रोज़गार दिलाने वाली खिड़कियों के बाहर अन्तहीन कतारें लगाने की। भई, उनका रुख बदल चुका है। अब ये कतारें सस्ते अनाज के वितरणालयों और मुफ्त रेवड़ियां बांटने के दया-धर्म केन्द्रों के बाहर लगती हैं। आम के आम और गुठलियों के दाम। लोगों की भूख की समस्या का हल हो गया, और मीरे-कारवाओं उदार धर्म का पालन करते हुए खुले लंगर लगाये, और बेहतर मूल्यों से सृजन का महिमा मण्डन कर लिया।
यहां तो लोग घोषित होते ही स्थापित हो जाते हैं। हमने रचनाकारों की ऐसी-ऐसी प्रायोजित गोष्ठियां देखी हैं, जो पुस्तक का विमोचन और कृति अभिनंदन एक साथ कर देती हैं। लेखक समर्थ हो और आगतों का स्वागत ढंग से कर सके, तो उसे एक अमर लेखक भी उसी गोष्ठी में बना दिया जाएगा।
जब सफलता के प्रांगण में हथेलियों पर यूं गुलदाऊदी के फूळ खिलने लगें, तो अध्ययन और अध्यवसाय का अवमूल्यन होगा कि नहीं?
देश बदले हुए शीर्षकों में जीने लगेगा। जो पहले असफलता थी, आज वह चोर दरवाज़े खुलने के साथ अपूर्व सफलता होने लगी, और हम शिक्षा से मानव-उपाधियों की ओर, जागरण से निद्रा की ओर बढ़ने लगे। निद्रा शब्द किसी को परेशान न करे, इसलिए इसे गरिमा देकर योग निद्रा कह लीजिये। अवसाद से छुटकारा कह लीजिये।
छुटकारा अभी भी नहीं मिला तो महसूस कीजिये, जो अहसास उपलब्ध हो जाने में है, वह उम्र भर खटने के बाद भी अचीन्हे रह कर लुप्त हो जाने में कहां? असफल रहे, तो इस असफलता का चेहरा बदलने के लिये मिथ्या आंकड़े हैं। जो व्याख्या करनी हो, उसे अपने दृष्टिकोण से करें तो लगेगा देश के आर्थिक विकास की दर आज भी दुनिया में सबसे अधिक है। चाहे यह विकास दर हमें ऊंची इमारतें और आयातित बड़ी गाड़ियां खरीद पाने की धूमधाम में खोती मिली। सदियों का कथन है, राजा का बेटा राजा और ़गरीब का बेटा ़गरीब। लाभ से प्रेरित निजी क्षेत्र की भागीदारी अपने सार्वजनिक उपक्रमों के लिए मांग कर तो देखो, भव्य प्रासाद अगर और ऊंचे होते हैं तो उनकी नींवों में गरीब भी तो फटीचर हो जाएंगे, परन्तु यह उनका कर्म लेख है भाई! इस भाग्य रेख में मेख कैसे मारोगे। हां, रास्ते हैं। जन खैरात का नाम जन-कल्याण में बदल दो, और लोगों को कार्य नीति नहीं, उपकार नीति के एजेंडे परोस दो। मतदान का समय आएगा, तो आप इन एजेंडों में अधिक से अधिक उपकारी हो जाने का मुकाबला भी देख सकते हैं। आपको कैसे भ्रम हो गया कि अपने देश के खेलों में प्रगति नहीं होती।



