हंसी और फुहड़ता का फर्क जाने समाज
हंसी आपको अच्छी लगती है। स्वास्थ्यकर है। योग अध्यापक हंसी को व्यायाम का एक हिस्सा बताते हैं। इसके आगे अंधेरा है। फुहड़पन है, जो कभी भी किसी भी समाज को श्रेयस्कर नहीं लगा। व्यंग्य की अपनी जगह है। हंसी-व्यंग्य एक साथ बोले जाते हैं, परन्तु व्यंग्य से कटाक्ष प्रयत्न होता है, विसंगतियों पर प्रहार होता है। एक हल्की-सी मुस्कान चेहरे पर आती है परन्तु हंसी नहीं। प्रसिद्ध व्यंग्यकार रविशंकर परसाई ने कहा है- अगर सारी दुनिया में व्यंग्य, साहित्य का मूल स्वर है। बुर्जुआ समाज में बेहद विसंगतियां हैं। परिवार से लेकर राष्ट्र के मंत्रिमंडल तक भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण है। व्यंग्य इन सबसे अन्वेषण और उद्घाटन का माध्यम है।
स्टैंडअप कामेडियन प्रवीण मोरे के कार्यक्रम में हिमांशु जांगड़ा और सेजल पवार की टिप्पणियों ने स्तब्ध कर दिया। कुछ समय पहले रैना के शो में रणवीर इलाहाबादिया के फूहड़ मज़ाक को दलीलता-अश्लीलता अथवा नैतिकता-अनैतिकता की कसौटी पर कसेंगे तो उस संकट को ठीक से समझ पाएंगे, जिसे हमारा सभ्य समाज फैल रहा है और जो हमारे समाज में तेजी से घट रहा है और विस्तार पा रहा है। अगर पुराने मूल्य अर्थवत्ता खो रहे हैं। इनमें छुपी लैंगिक और सामाजिक असमानता को हम रेखांकित कर पा रहे हैं परन्तु नये मूल्य हमारे सामने नहीं हैं। हमने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया न उनकी कोई पहचान बनाई है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग अपनी जगह है। इसे समाज ने एक हद तक स्वीकार भी कर लिया है। लेकिन व्यक्तिगत आपको किसी के बेडरूम में झांकने की आज्ञा नहीं देता। इसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल आपको योग्यता देता है। इस स्वतंत्रता ने आपको व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी भी दी है।
नि:संदेह आज हालात बदल गए हैं। संयुक्त परिवार रहा नहीं। एकल परिवार बने। एकल परिवार में भी टूटने की नौबत आ गई। बच्चों को पढ़-लिख कर घर के पास अच्छे अवसर मिलते नहीं, दूर जाना पड़ता है। पुराने दहले हुए घरों में मां-बाप प्रतीक्षारत रहते हैं कब घर में चहचहाहट आए, हंसी गूंज उठे। नई आर्थिक हैसियत खुशियों के नाम पर चीजें इकट्ठी कर रहे हैं। अकेलापन वैसे का वैसा रहता है। चीज़ें सम्भाली नहीं। रिश्तों में दूरी तो बनी लेकिन अलग होने की तड़प ने अपनी जगह बना ली।
शिक्षा क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखे गए हैं। जीवन की गहरी समझ और पहचान शिक्षा नहीं दे पा रही। प्रतियोगिता ने शिक्षा की बुनियाद पर हमला किया है। बारहवीं पास के बाद ही अच्छा धन कमाऊ नौकरी पर ध्यान केन्द्रित होता रहा है। चमचमाता दफ्तर, घर, बड़ी गाड़ी, लैपटॉप पर अपना व्याकरण रचती रहती है। काम में तनाव, कम्पनी के बाहर कर देने का खतरा जहन में हज़ार सवाल दागता रहता है। ऐसे में तनाव रहित होने के लिए स्टैंडअप कॉमेडी, ओ.टी.टी. पर मिलती अच्छी-बुरी फिल्में तरह-तरह से रूप बदल कर राहत देने के नाम पर सामने आती हैं। नौकरी छूटती है तो रिश्ते भी बदल जाते हैं, इस सब से बनता है, वह समाज जो गाली-गलौच से भद्दा है, औरत देह तक सीमित रखता है। फूहड़ हंसी मजाक में रस लेने लगता है। मर्यादा को भूल जाता है। समाज के बने बनाए मापदंड की उपेक्षा कर देता है। इसे बदकिस्मती कहें यह सब तब हो रहा है जब भारत का महिला वर्ग पुरुष समाज के सामने समानता की मांग करने लगा है, जोकि समयानुकूल, तर्क-संगत और मानवीय है, लेकिन पुरानापन-दकियानूसी विचार, पोंगापंथी ने अभी साथ छोड़ा नहीं। मर्दवादी मानसिकता स्त्री अस्मिता को जल्दी कहीं कहां स्वीकार करती है। वह अपमान करने की कोशिश करती है। कई मोर्चों पर, जहां भी अवसर मिले लड़कियों को 370 रुपये की बिरयानी खरीद लेने लायक चीज मानती है।

