उज्ज्वल है बासमती का भविष्य

फसली-विभिन्नता में बासमती की विशेष भूमिका है। पंजाब में 7 लाख हेक्टेयर और हरियाणा में लगभग 6 लाख हेक्टेयर रकबे पर बासमती की काश्त की जाती है। भारत में बासमती की काश्त के अधीन 21 लाख हेक्टेयर रकबा है। वैसे तो घरेलू और विदेशों में बासमती की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन अगर अमरीका-ईरान समझौता सफल हो जाता है तो बासमती का भविष्य और भी उज्ज्वल हो जाएगा। ईरान दुनिया में बासमती का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। पंजाब और हरियाणा की बासमती अन्य देशों के मुकाबले ईरान में अधिक जाती है। गत वर्ष (2025-26 में) भारत से 65 लाख टन बासमती विदेशों को निर्यात की गई और भारत को इससे 50,180 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। उससे एक साल पहले (2024-25 में) भारत से 60 लाख टन बासमती निर्यात हुई थी। तब भी विदेशी मुद्रा इतनी ही (लगभग 50,000 करोड़) प्राप्त हुई थी। पांच लाख टन बासमती का निर्यात बढ़ने के बाद भी विदेशी मुद्रा में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। एग्रीकल्चरल प्रोसेस्ड फूड एक्सपोर्ट डिवेल्पमेंट अथॉरिटी (अपीडा) के अनुसार कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ने  की वजह से इसकी गुणवत्ता और कीमत पर असर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया में युद्ध के दौरान ईरान के अलावा सऊदी अरब, खाड़ी और यूरोपीय देशों को बासमती का लगातार निर्यात होता रहा। सऊदी अरब और ईरान पंजाब एवं हरियाणा की बासमती का भारी मात्रा में आयात करने वाले देश हैं।
यूरोपियन यूनियन द्वारा रसायनों के इस्तेमाल संबंधी सख्त नीति तय करने के बाद पंजाब सरकार ने ट्राईसाइक्लाज़ोन, बायमेथोक्साम, ट्रायजोफॉस, कार्बेन्डाज़िम और एसीफेट के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया हुआ है। यूरोप द्वारा बुप्रोफेजिन और ट्राईसाइक्लाज़ोन रसायनों की अवशेष संबंधी सीमा 0.01 पीपीएम तय करने के बाद किसान रसायनों के इस्तेमाल को लेकर सावधान हो गए हैं। पंजाब, हरियाणा की बासमती की गुणवत्ता अच्छी है। ज्योग्राफिकल इंडिकेटर (जीआई) वाले राज्य जैसे पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ ज़िलों को बासमती पैदा करने के लिए नोटिफाई किया गया है और इन क्षेत्रों में पैदा होने वाली बासमती की फसल को ही बासमती का टैग हासिल है, लेकिन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और राजस्थान भी बासमती की किस्मों के बीजों की काश्त कर रहे हैं। निजी बीज कंपनियां और व्यापारी व्यापक स्तर पर बीज उपलब्ध करवाकर महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी बासमती की काश्त बढ़ा रहे हैं। गैर-जीआई क्षेत्रों में बासमती का बीज उपलब्ध होने से इन राज्यों में बासमती किस्मों की काश्त बढ़ती जा रही है। जीआई क्षेत्र के राज्यों को वहां की भूमि, पानी, जलवायु, पर्यावरण तथा परम्परा को देखते हुए जीआई टैग दिया गया था। अब दूसरे राज्य जो बासमती की काश्त के लिए आगे आ रहे हैं, उन्हें जीआई टैग हासिल नहीं और वहां पैदा की गई फसल को बासमती का दर्जा उपलब्ध नहीं। लेकिन कुछ व्यापारी गैर-जीआई क्षेत्र में पैदा की गई बासमती को सस्ते दाम पर खरीद रहे हैं। इस तरह बासमती की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, क्योंकि उन क्षेत्रों की पैदावार में बासमती के विशेष गुण नहीं। लगभग सारा निर्यात पी.बी.-1121 के लेबल के तहत खाड़ी देशों और ईरान को हो रहा है। पी.बी.-1509 किस्म का चावल भी चाहे लगभग पी.बी.-1121 किस्म के चावल का मुकाबला करता है और इसके लेबल के तहत उपयोग हो जाता है (अगर यह जीआई ज़ोन के क्षेत्र में पैदा किया जाए)।
चाहे मध्य प्रदेश (जो जीआई ज़ोन में नहीं है) को जीआई ज़ोन में शामिल करने का मामला अदालत में विचाराधीन है, परन्तु अफवाहें फैल रही हैं कि केंद्र द्वारा मध्य प्रदेश को जीआई टैग दिया जा रहा है। अगर ऐसा हो जाता है तो बासमती की कीमत कम हो जाएगी। किसानों को डर है कि उन्हें सही दाम नहीं मिलेगा। बासमती के निर्यात में पंजाब और हरियाणा का 60 प्रतिशत तक योगदान है। बासमती पर एमएसपी न होने की वजह से मंडी में दाम कम मिल रहा है। पंजाब में बासमती की काश्त का रकबा बढ़ने की संभावना है, परन्तु उपरोक्त कारणों से किसान बासमती की काश्त बढ़ाने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।
बासमती की काश्त के कुल रकबे में से लगभग 80 प्रतिशत रकबे पर आईसीएआर-इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट की किस्मों की काश्त की जा रही है। पीबी-1509 किस्म जो किसानों की पंसद बन गई है, आईएआरआई के पूर्व निदेशक तथा बासमती के प्रसिद्ध  ब्रीडर डा. अशोक कुमार सिंह की देखरेख में विकसित हुई थी। यह किस्म पकने को कम समय लेती है और इसका उत्पादन अधिक है। इसे बोने से पानी की बचत होती है। कई स्थानों पर यह मॉनसून की बारिश से ही तैयार हो जाती है। किसान इस किस्म को अपना रहे हैं। आईएआरआई के जैनेटिक्स डिवीज़न के प्रमुख डा. गोपाला कृष्णन एस. कहते हैं कि एक और बासमती की किस्म विकास अधीन है, जो ब्लास्ट और ब्लाइट से मुक्त होगी और सीधी बिजाई (डीएसआर) तकनीक से बोई जा सकेगी। निर्यात में अन्य देशों द्वारा इसकी मांग किए जाने की भी पूरी सम्भावना है। आईसीएआर-आईएआरआई के निदेशक डा. सीएच. श्रीनिवासा राव कहते हैं कि संस्थान का बासमती के अनुसंधान तथा इसके प्रसार पर पूरा ज़ोर रहेगा, जिससे भविष्य में निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा और ज़्यादा प्राप्त होगी।
बासमती की काश्त एवं उत्पादन बढ़ाने संबंधी विशेषज्ञ कहते हैं कि बासमती की किस्मों की काश्त गैर-जीआई  ज़ोन के राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना तथा राजस्थान में बंद की जानी चाहिए। गैर-जीआई ज़ोन में बासमती बीजों के सर्टीफिकेशन पर प्रतिबंध लगाया जाए। विश्वविद्यालयों एवं अनुसंधान संस्थानों द्वारा परामर्श जारी किए जाएं कि किसान गैर-जीआई ज़ोन में बासमती किस्मों की काश्त करने की बजाय अन्य फसलों की काश्त करें। इससे ही बासमती की गुणवत्ता बरकरार रखी जा सकती है।
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