सूख रहे प्राकृतिक जल-स्रोत

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान सहित देश के लगभग नौ राज्यों में बन रहे सूखे जैसे हालात ने देश के भू-वैज्ञानिकों एवं कृषि-विशेषज्ञों को चिन्ता में डाला है। इस स्थिति का बड़ा लक्षण और प्रमाण इन राज्यों में चिरकाल पुराने जल-स्रोतों जैसे झीलों, सरोवरों, तालाबों, जौहड़ों आदि में पानी का स्तर निरन्तर कम होते जाना है। सूखा जैसी स्थिति से दो-चार हुए शेष छह अन्य राज्यों में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, तमिलनाडू, कर्नाटक और पुडुचेरी हैं। रिपोर्ट में सूखे जैसी स्थिति को लेकर यूं तो पूरे देश का ज़िक्र है, किन्तु इसमें यह भी बताया गया है कि इस स्थिति को लेकर दक्षिणी राज्यों में अभी चिन्ता की कोई बड़ी बात दिखाई नहीं दी हालांकि यहां भी प्राकृतिक जल-भंडार क्षेत्र धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं। इस स्थिति की भावी गम्भीरता का अनुमान इस एक तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि विशेषज्ञों ने यह माना है कि इस रफ्तार से देश के अधिकतर जल-भण्डारण गृहों का पानी सूखता जाएगा तो देश के समक्ष गम्भीर चुनौतियों का खतरा खड़ा हो सकता है। विशेषज्ञों ने यह भी तर्क दिया है कि यह स्थिति साधारणतया दृष्टिविगत किये जाने वाली नहीं है। अत: इस स्थिति को अतीव गम्भीर हो जाने से बचाने के लिए तत्काल रूप से समुचित निरोधक पग उठाये जाने की बड़ी आवश्यकता है। जल भण्डारण गृहों से पानी सूखने के कारण एक ओर जहां भूमिगत पानी और नीचे चले जाने का खतरा है, वहीं कृषि क्षेत्र के प्रभावित होने की भी बड़ी आशंका है।
राष्ट्रीय भू-जल पुनर्भरण ब्यूरो द्वारा वर्ष 2025 के लिए जारी इस रिपोर्ट के अनुसार देश भर में कुल जल भंडारों में से क्षेत्रीय आधार पर मूल्यांकन किया गया है। इस आंकलन के अनुसार देश के कुछ दक्षिणी राज्य और छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखण्ड जैसे राज्य अधिक बेहतर स्थिति में हैं। इसके विपरीत पंजाब एवं हरियाणा चिन्ताजनक स्थितियों से प्रभावित हैं। रिपोर्ट में पंजाब के हिस्से में दावा किया गया है कि कुल 153 मूल्यांकन इकाइयों में से 72.55 प्रतिशत अतीव दोहन क्षेत्र में आती हैं अर्थात पंजाब में स्थिति अन्य राज्यों से कहीं अधिक गम्भीर है। पंजाब में जल-संग्रह इकाइयों की बात करें, तो केवल 11.11 प्रतिशत जल-भण्डारण क्षेत्र ही सुरक्षित श्रेणी में आते हैं। इसी प्रकार राजस्थान भी सुरक्षित जल-भण्डारों के मामले में बड़ी नाजुक स्थिति में आता है जहां 302 जल-भण्डार इकाइयों में से 7.53 प्रतिशत अत्यधिक दोहन स्थिति में आती हैं। हरियाणा भी इस पथ का राही है जहां 143 इकाइयों में से 63.64 प्रतिशत इस अति दोहन वाली लकीर के इतर आती हैं। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान में इस गम्भीर स्थिति का एक बड़ा कारण मई-जून में मानसून की वर्षा का कम होना भी है।
रिपोर्ट में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में स्थितियों की गम्भीरता अत्यधिक स्तर पर आती है। दिल्ली में कुल 34 मूल्यांकन इकाइयों में से 32.35 प्रतिशत अत्यधिक गम्भीर स्थिति में आती हैं जबकि 29.41 अन्य इकाइयां भी अधिक जल-दोहन की सीमा के भीतर पड़ती हैं। उत्तर प्रदेश का एक बड़ा आबादी-वार राज्य होने के कारण वहां स्थिति अधिक गम्भीर होते दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में आबादी का बढ़ना भी इन चिन्ताओं को बढ़ाने के लिए काफी है। प्रदेश का बड़ा आकार और आबादी में वृद्धि की रफ्तार स्थितियों के और गम्भीर होने को दर्शाने के लिए काफी है।
नि:संदेह देश में प्राकृतिक जल-संग्रहण भण्डारों को लेकर राष्ट्रीय भू-जल पुनर्भरण रिपोर्ट के आंकड़े भावी स्थितियों को भयावह कर देने के लिए काफी हैं। देश भर में ग्रामीण क्षेत्रों के बढ़ते शहरीकरण, घटते वन्य क्षेत्र और निरन्तर बढ़ती आबादी के कारण जल-भण्डारण गृहों में पानी के सूखने की स्थिति के और गम्भीर होते जाने का बड़ा खतरा है। तेलंगाना, आन्ध प्रदेश और केरल में भी स्थितियां कमो-बेश ऐसी ही हैं। ऐसी स्थिति में देश के सभी जल-संरक्षण गृहों अथवा प्राकृतिक भण्डारों में जल के पुनर्भरण की स्थितियों को सुधारने और बढ़ाने की बड़ी आवश्यकता है। वर्षा के मौसम में वर्षा जल भण्डारण को सुरक्षित करना भी इस हेतु बड़ा ज़रूरी होगा। जल-भण्डारण गृहों में पानी के संरक्षण की मात्रा बढ़ाने के लिए यथोचित प्रबन्ध करना ज़रूरी होगा। हम यह भी समझते हैं कि कृषि कार्यों एवं सिंचाई के लिए पानी के नियमन की समुचित व्यवस्था करना भी बहुत ज़रूरी है। पानी के संरक्षण की पुरातन व्यवस्था को लागू करने से भी स्थितियां नियंत्रण में लाई जा सकती हैं। हम यह भी समझते हैं कि स्थितियों की गम्भीरता को देखते हुए वर्षा के आगामी मौसम से पूर्व इसे अवश्य अपनाया जाना चाहिए ताकि वर्षा के अधिकाधिक पानी को इन जल भण्डारण-गृहों में संरक्षित किया जा सके।

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