अच्छी दिशा की ओर उठते कदम

अमरीका, इज़रायल और ईरान के टकराव भरे संबंध अब तेज़ी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। अनेक स्तर पर दोनों पक्षों में हो रहे समझौतों में आई जटिलताओं को सुलझाने के यत्न किए जा रहे हैं, परन्तु वर्षों से चलते आ रहे इस घटनाक्रम के कारण हालात अभी भी बेहद जटिल और गम्भीर बने हुए हैं, इन दशकों तक पश्चिमी एशिया के इस क्षेत्र में विनाश और बेचैनी पैदा किए रखी है। तेल और गैस के प्राकृतिक भण्डारों से भरपूर खाड़ी देश इस हालात की गिरफ्त में हैं। अमरीका और अन्य महा-शक्तियों की लगातार इन प्राकृतिक भण्डारों पर नज़र रही है, जिसके कारण वह इस क्षेत्र में अपनी-अपनी चाल चलते आ रहे हैं। 28 फरवरी को अमरीका-इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद यहां भयावह विनाश के मंज़र देखे गए हैं। ईरान चाहे आज भी बड़ी दृढ़ता व साहस से डट कर मुकाबले में खड़ा है परन्तु उसके मूलभूत ढांचे का बड़ी सीमा तक विनाश हो चुका है, उसकी आर्थिकता भी व्यापक स्तर पर डावांडोल हो चुकी है।
इस युद्ध का प्रभाव भारत सहित विश्व भर के देशों पर पड़ा है। ईरान की समुद्री सीमा के साथ लगते होर्मुज़ जल मार्ग बंद होने से व्यापक स्तर पर तेल का व्यापार बंद हो गया था, जिस कारण विश्व स्तर पर तेल और गैस की कीमतों में भारी वृद्धि हो गई थी। इसका प्रभाव अमरीका और यूरोपियन देशों सहित पूरे विश्व पर पड़ा था। अमरीका के ज्यादातर लोग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा शुरू किए गए इस युद्ध का विरोध करते रहे हैं। अमरीकी कांग्रेस (संसद) में भी इसके विरोध में स्वर उठते रहे हैं। यहां तक कि डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के ज्यादातर प्रतिनिधि भी इस युद्ध का विरोध करते दिखाई दे रहे हैं। अब अमरीकी सैनेट ने बहुमत के साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान के विरुद्ध युद्ध नीतियों को सीमित करने संबंधी प्रस्ताव पारित करके अपनी मोहर लगा दी है। दूसरी तरफ दोनों पक्षों के बीच चाहे अस्थायी समझौता हो चुका है लेकिन अभी कई तरह के अवरोध शेष हैं, परन्तु वर्तमान समय में होर्मुज़ मार्ग खुलने तथा ईरान पर लगे तेल के निर्यात की पाबंदियों में ढील दिए जाने से विश्व ने राहत की सांस ली है। अब तेल की आसमान छूती कीमतों में भारी गिरावट आई है, जो एक अच्छा संदेश है। इसके दृष्टिगत ही दोनों पक्षों द्वारा आपसी समझौतों के यत्न और भी तेज़ कर दिए गए हैं, परन्तु इज़रायल द्वारा लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर हमले अभी पूरी तरह रोके नहीं जा रहे, यह स्थिति समझौते के मार्ग में रुकावट पैदा कर रही है। चाहे लेबनान की सरकार अपने देश को बड़े विनाश से बचाने के लिए अमरीका के माध्यम से इज़रायल के साथ समझौता करने के लिए यत्नशील है परन्तु लेबनान के बड़े भाग पर ईरान की ओर से मिलती लगातार सहायता के कारण हिज़्बुल्लाह संगठन का दबदबा बना हुआ है। वह किसी भी स्थिति में इज़रायल के साथ समझौता नहीं करना चाहता। ईरान की अमरीका के साथ समझौते के लिए एक शर्त यह भी है कि इज़रायल लेबनान पर भी हमले करना बंद करे, परन्तु दूसरी तरफ यह बात विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती है कि ऐसी स्थिति में हिज़्बुल्लाह इज़रायल के विरुद्ध अपनी कार्रवाइयां बंद कर देगा।
परन्तु अमरीकी प्रशासन को अब यह अहसास हो चुका है कि वह इस युद्ध में शिकस्त खा चुका है। इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प हर हाल में इस समझौते को सफल बनाने के लिए यत्नशील प्रतीत होते हैं। यदि आगामी दो माह में दोनों पक्षों की समझौते की शर्तों पर सहमति बन जाती है तो इससे विश्व भर को बड़ी राहत मिलेगी, परन्तु इसके साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य संबंधित पक्षों द्वारा लगातार किए जा रहे ये यत्न जारी रहने चाहिएं ताकि लटकते आ रहे इस मामले का स्थायी हल निकाला जा सके। 1948 में इज़रायल का अस्तित्व संयुक्त राष्ट्र के फैसले से बना था। अब इज़रायल और फिलिस्तीन दोनों देशों को सभी द्वारा स्वीकार करने और उनकी सीमा निर्धारित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय यत्नों की ज़रूरत होगी ताकि दशकों से युद्ध में घिरे रहे इस क्षेत्र के लोगों के लिए शांति और विकास के मार्ग प्रशस्त हो सकें।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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