ए.आई. मनुष्य के बस में रहे
कृत्रिम बौद्धिकता का नकारात्मक असर वही बता रहे हैं जो इस वजह से नौकरी से बाहर कर दिए गए हैं या जिनके कहने पर निकाले जाने की तैयारी चल रही है। इसी आर्टीफिशियल इंटेलिजेंसी (ए.आई.) के विकास को लेकर सबसे बड़ा सवाल अब सिर्फ यह नहीं रहा कि मशीनें कितनी बुद्धिमान हो रही हैं, या होंगी अपितु यह भी है कि उनकी बढ़ती क्षमताओं को समय रहते नियंत्रित किया जा सकेगा या नहीं। विशेषज्ञों की चेतावनियों और यूक्रेन युद्ध में स्वचालित हथियारों के बढ़ते हमले/इस्तेमाल ने इस खतरे को गम्भीरता से देखने पर विवश किया है। रूस बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए ऐसे घातक ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है, जो तेजी से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं। यूक्रेन भी ड्रोन तकनीक में तेजी से तैयारी कर रहा है और लंबी दूरी के ड्रोन से रूस के भीतरी ठिकानों को निशाना बना रहा है। उधर अमरीका और चीन के बीच ए.आई. की प्रतिद्वंद्विता जोखिम को विस्तार दे रही है।
कृत्रिम बौद्धिकता क्षेत्र में कई प्रमुख शख्सियतें वर्षों से चेतावनी दे रही हैं कि अगर तकनीक मानवीय मूल्यों और सुरक्षा व्यवस्था को चैलेंज करते हुए आगे निकल गई तो इसके परिणाम बेहद गम्भीर हो सकते हैं और होने वाले हैं। एंथ्रोपिक की एक ताज़ा रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार क्लाउड मॉडल का इस्तेमाल माली की खुफिया एजेंसी के लिए बड़े पैमाने पर निगरानी सिस्टम और यमन में मिसाइल तकनीक विकसित करने जैसे कार्यों में किया गया। यूक्रेन युद्ध इस खतरे का सचमुच का उदाहरण है।
अमरीका और चीन इस मामले में साफ प्रतिद्वंद्वी नज़र आते हैं। इस समय के अमरीकी प्रशासन की सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि अगर चीन ए.आई. में आगे निकल जाता है तो उसे सैन्य, साइबर, जासूसी और हाइब्रिड युद्ध में बड़ी रणनीतिक प्राथमिकता मिल जाएगी। जब माहौल ऐसा हो जाए तो कोई भी देश अपनी तकनीकी स्पीड कम कर दूसरे प्रतिद्वंद्वी को आगे निकलने का मौका नहीं देना चाहेगा। यही स्पष्ट कारण है कि ए.आई. पर अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा समझौता एक असंभव सा व्यवहार दिखाई पड़ता है। किसी भी संभावित समझौते को शीत युद्ध को हथियार नियंत्रण संधियों की तरह पारदर्शिता निरीक्षण और घटनाक्रम की स्टीक जानकारी साझा करने का प्रावधान बनाना और ईमानदारी से अमल करना ज़रूरी हो जाएगा, परन्तु डेटा सेंटर दिखाई देने के बावजूद उसके भीतर चल रही अत्याधुनिक ए.आई. ट्रेनिंग और सुरक्षा व्यवस्थाओं की निगरानी काफी कठिन होगी। विशेषज्ञ बताते हैं कि खतरा केवल महाविनाश तक ही नहीं है। ए.आई. एजेंट यदि बिजली ग्रिड, वित्तीय ढांचा या हथियार प्रणालियों तक अपनी पकड़ बना लेते हैं और उन्हें रोक पाने की कोशिशें असफल रह जाती हैं तो सीमित स्तर की घटना भी एक बड़े संकट में बदल सकती है। यह दौड़ सुपर इंटेलिजेंस तक चली गई है। ऐसे में सामाजिक ज़िम्मेदारी, मनुष्य की नैतिकता के प्रश्न, जिन्होंने अब तक दुनिया को महाविनाश से बचाये रखा, बेमानी हो जाएंगे। साइंस फिक्शन ने अब तक हमें ऐसी मशीनों से डरना सिखाया जो चेतना हासिल कर लें और लड़ने का फैसला कर लें। लेकिन शायद यह डर की वजह नहीं है। किसी ए.आई. सिस्टम को किसी नेटवर्क पर हमला करने के लिए न तो गुस्से की ज़रूरत है न ही ज्यादा संसाधनों के लालच की। उसे बस एक लक्ष्य चाहिए, उस लक्ष्य को हासिल करने की पूरी क्षमता चाहिए और पहले ही निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने की कोई एक छोटी-सी भूल या सुराग।

