धान के मंडीकरण की चुनौती
धान पंजाब की मुख्य फसलों में से एक है। पिछले लम्बे समय से यह किसान की आर्थिकता का आधार बना हुआ है। अभी भी इस फसल के उत्पादन में यह देश के अग्रणी राज्यों में माना जाता है। इस बार सरकार द्वारा इसकी खरीद का लक्ष्य 180 लाख मीट्रिक टन रखा गया है। प्रदेश में 26 लाख एकड़ क्षेत्र में यह फसल बीजी गई है। इसलिए सरकार सहित सभी संबंधित पक्ष इसके मंडीकरण के प्रबंधों के लिए सक्रिय लगते हैं। इस पक्षों में किसानों के अलावा संबंधित सरकारी विभाग, आढ़ती और शैलर मालिक शामिल हैं। इसलिए केन्द्र के साथ अच्छे संबंध बनाए जाने की ज़रूरत होती है तभी इसकी खरीद, लिफ्टिंग व छटाई और इससे संबंधित अन्य बड़े कार्यों को पूरा किया जा सकता है। सरकारी घोषणा के अनुसार इसकी खरीद 1 अक्तूबर से शुरू की जा रही है। इसलिए प्रदेश में 18000 मंडियां तैयार की गई हैं। आज से कुछ दिन पहले से ही कई अनाज मंडियों में परमल धान की आमद शुरू हो चुकी है। इसके साथ-साथ बासमती की आमद भी आनी जारी है।
इस बार सरकार के कृषि और सिविल सप्लाई विभाग के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं, जिसको हर हाल में दूर करने की ज़रूरत होगी। प्रदेश में पांच हज़ार के करीब शैलर मालिकों ने इस कार्य को पूरा किया है। चाहे इस बार पहले ही लगभग 5 लाख बारदाने का प्रबंध अवश्य किया जा चुका है, परन्तु सबसे बड़ी चुनौती इसके भंडारण की आएगी, क्योंकि इसे सम्भालने के लिए शैलरों में जगह की बहुत कम हुई दिखाई दे रही है। आने वाली धान की फसल को शैलरों में भेजना ज़रूरी है, परन्तु समाचारों के अनुसार अधिकतर शैलरों में पहले ही गेहूं के साथ-साथ धान तथा चावल के भंडार लगे हुए हैं। यदि मंडियों से शैलरों तक फसल को ले जाने की रफ्तार कम होती है तो इसका प्रभाव किसानों सहित समूचे प्रबंध पर पड़ेगा। इसके प्रति शैलर मालिक पहले ही चिंता व्यक्त करते रहे हैं कि उन्हें नई फसल के लिए गोदामों में ज़रूरत के अनुसार जगह की कमी पेश आ सकती है। इसलिए राज्य सरकार लगातार केन्द्र के साथ सम्पर्क में भी रही है, परन्तु सूचना के अनुसार पंजाब के ज़्यादातर गोदामों में भारतीय खाद्य निगम की पहले ही फसल पड़ी हुई है। यह भी सूचना मिली है कि निगम का 2023-24 के समय का लाखों टन चावल इन गोदामों में पड़ा है, क्योंकि भारतीय खाद्य निगम द्वारा इस नीति की ओर ध्यान नहीं दिया गया कि पहले आई फसल को प्राथमिकता के आधार पर उठाया जाए। यदि पुरानी फसल शैलरों या गोदामों में पड़ी है तो उसकी गुणवत्ता पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।
अब जिस प्रकार तेज़ी से मंडियों में धान आएगा, यदि उतनी ही तेज़ी से भारतीय खाद्य निगम गोदामों को खाली करके पहले पड़े चावल और गेहूं को दूसरे राज्यों में नहीं भेजता, तो मंडियों में आने वाली फसल के लगने वाले अम्बारों को कैसे सम्भाला जा सकेगा? इस मामले को राज्य सरकार केन्द्र के सहयोग से किस तरह सुलझाएगी, यह आगामी दिनों में देखने वाली बड़ी बात होगी। सभी सम्बद्ध पक्षों के सतत् यत्नों से ही यह मामला सुलझाया जा सकता है। नि:संदेह इस फसल की सम्भाल जहां एक बड़ी चुनौती होगी, वहीं एक कड़ी परीक्षा में से गुज़रने वाली बात भी होगी, जिसके लिए प्रत्येक पक्ष से पूरी तह सक्रिय होने की ज़रूरत होगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

