निर्माण स्थलों का धराशायी होना विकसित भारत के संकल्प को बड़ी चुनौती

देश में सार्वजनिक निर्माण के अनेकानेक स्थलों के क्षतिग्रस्त होने, ढहने, टूटने की खबरों का सिलसिला जारी है। विडम्बना ये है कि इनमें कई परियोजनाएं प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित की गई हैं। अभी कुछ दिन पूर्व उत्तर प्रदेश के चर्चित 594 किमी लम्बे 36,000 करोड़ रुपये लागत वाले 6 लेन गंगा एक्सप्रेस वे (मेरठ-प्रयागराज खंड) मार्ग पर उन्नाव के पास मानसून की भारी बारिश और मिट्टी क्षरण से दस मीटर गहरा गड्ढा हो गया। इससे पहले इसी मार्ग पर अमरोहा के पास बीस मीटर की दरार से सड़क के क्षतिग्रस्त होने की घटना घटी थी। इसी मार्ग पर हापुड़ में एक एसयूवी ने सड़क की खराबी से कई पलटी मारकर चार लोगों की जान ले ली। इस सड़क परियोजना का प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले 29 अप्रैल को उद्घाटन किया था। 
ऐसी घटना की दूसरी बानगी दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे में भी दिखी, इसका भी बड़े तामझाम से पिछले 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन किया गया था। करीब सवा अरब डॉलर लागत वाली इस परियोजना के उद्घाटन के तीन महीने के भीतर पहली जुलाई को शामली में दो बड़े गड्ढे बन गए। देश में राजमार्गों के निर्माण को संचालित करने वाले केंद्रीय उपक्रम एनएचएआई ने इस घटना पर यह सफाई दी कि सड़क पर पड़ने वाली बारिश के पानी की निकासी के लिए जो ढलान और ड्रेनेज नाली बननी थी, वह भूमि अधिग्रहण विवाद के चलते तैयार नहीं होने से यह घटना घटी। हालांकि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने इस घटना पर इस सड़क परियोजना के निदेशक, प्राधिकरण इंजीनियर और निर्माण ठेकेदार को कारण बताओ नोटिस जारी किया व अपने कई कर्मचारियों को निलंबित किया। तत्काल एक पानी ड्रेनेज बनाकर इस सड़क को बहाल कर दिया गया। 
तीसरी बानगी बिहार में दिखी, जहां सार्वजनिक निर्माणों खासकर पुलों के ढहने की कुछ ज्यादा ही घटनाएं घटती रही हैं। अभी कुछ ही दिन पहले 10 सितम्बर को प्रदेश के वैशाली ज़िले के लालगंज के पास निर्माणाधीन फोर लेन पुल का एक बड़ा कंक्रीट स्लैब लोहे के गार्डर लांचर के साथ गिर गया, जिस हादसे में 8 मजदूर बुरी तरह से घायल हो गए। यह पुल केंद्र सरकार की भारतमाला परियोजना का हिस्सा था। इससे पूर्व 4 मई को प्रदेश के भागलपुर में गंगा नदी पर निर्मित महत्वपूर्ण बिक्रमशिला ब्रिज का एक विशाल स्लैब नदी में गिर गया जबकि एक सप्ताह पूर्व इस पुल के मुख्य इंजीनियर ने पुल को पूरी तरह सुरक्षित बताया था। इस घटना के उपरांत उत्तर बिहार, बंगाल और झारखंड से भागलपुर का संपर्क कई दिनों तक बाधित रहा। तीसरी घटना प्रदेश के गोपालगंज में पिछले मार्च में घटी जब यहां के घोघरी नदी पर निर्मित एक छोटा पुल गिर गया। ये अलग बात है कि इस निर्माण कार्य में जुड़े तीन इंजीनियरों को निलंबित कर कॉन्ट्रैक्टर को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया गया।  
यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ भारत दुनिया में विकसित देश बनने का पुरजोर संकल्प प्रदर्शित कर रहा है, तो दूसरी तरफ आये दिन देश में अनेकानेक निर्माण कार्यों के बिखरने, टूटने और उससे कई हादसे घट रहे हैं। देश में पिछले दो वर्षों में बुनियादी संरचना की दो दर्जन बड़ी परियोजनाएं जिनमें राष्ट्रीय राजमार्ग, एक्सप्रेस वे, हवाई अड्डे, फ्लाईओवर, पुल, प्रतिमा व अनेक सार्वजानिक भवन शामिल हैं, उनके क्षतिग्रस्त होने, गिरने और धराशायी होने की घटनाएं घट चुकी हैं। बिहार की एक घटना में देखा गया कि 1700 करोड़ की लागत से खगड़िया और भागलपुर के बीच बन रह 3 किमी पुल तीन बार गिरा। आईआईआईटी रुड़की ने जब इस परियोजना की जांच की तो पता चला कि निर्माण सामग्री की क्वालिटी बेहद घटिया थी। कहने का मतलब भ्रष्टाचार को बार-बार दोहराया गया। 
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जो भारत के हाईवे मेकर कहे जाते हैं, वह भी राजमार्गों के निर्माण में हो रही गिरावट और हादसे की घटना को लेकर कई बार निरुत्तर दिखे हैं। अभी दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे जो देश की सबसे महत्वपूर्ण एक्सप्रेस वे परियोजना है; उसमें कई खंडों पर सड़क निर्माण की कमजोरी की घटना प्रकाश में आयी। सबसे पहले राजस्थान में दौसा और सवाई माधोपुर में गड्ढा हो गया। फिर इस मार्ग में गुजरात के अंकलेश्वर में 8 फीट गड्ढा बन गया। गुजरात के सांचोर-संतालपुर राजमार्ग बारिश से दरार और खुरदुरापन का वाक्या सामने आया। इस मामले पर सड़क ठेकेदार पर 2.8 करोड़ का जुर्माना लगाया गया और एक साल के लिए उसे प्रतिबंधित भी कर दिया गया। करीब 19 नयी राजमार्ग परियोजनाओं के निर्माण में खामियों को देखते हुए सड़क परिवहन मंत्री गडकरी अब तक एनएचएआई के 11 अधिकारियों को बर्खास्त भी कर चुके हैं।  
देश में हो रही इन घटनाओं ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिये हैं। सबसे पहले इन घटनाओं से देश के विकसित राष्ट्र की संकल्पना की धज्जियां उड़ती हैं, तो दूसरी तरफ देश और विदेश में हमारे सार्वजानिक निर्माण की क्वालिटी की जगहंसाई होती है। देश की सार्वजानिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार किस तरह व्याप्त है, ये घटनाएं इसका जीता जागता प्रतीक हैं। यह हमारे इंतजामिया की ‘नो टॉलरेंस टू करप्शन’ की मशीनरी कितनी पुख्ता है, इसकी भी कलई खोलता है? अर्थशास्त्र की दृष्टि से तो ये ‘वैल्यू फॉर पब्लिक मनी’ की धज्जियां उड़ाने का प्रतीक है। चिंता की बात ये है कि ये निर्माण चंद लोगों की लापरवाही और लालच की कीमत पर देश में कई हादसे पैदा कर एक आपराधिक कृत्य को भी जन्म देते हैं। मिसाल के तौर पर पूर्वोत्तर भारत की निर्माणाधीन पनबिजली परियोजना में निर्मित हो रहे टनल के गिरने से 9 श्रमिक हताहत और 15 श्रमिक गंभीर रूप से घायल हो गए। केरल जैसे बेहतर शासन वाले राज्य में निर्माणाधीन 26 राजमार्गों में से 8 परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुईं। प्रदेश के मल्लपुरम में एन एच 66 में 250 किमी लम्बा एलिवेटेड कॉरिडोर गिर पड़ा। 
सवाल ये है कि इन घटनाओं की जिम्मेदारी घटिया निर्माण सामग्री और कमीशनखोरी है तो दूसरी तरफ यह सरकारी अधिकारियों, राजनीतिज्ञों और ठेकेदारों के नापाक गठबंधन की तरफ इशारा करता है? जब तक ये नापाक गठबंधन धूल धूसरित नहीं होगा, तब तक सार्वजानिक निर्माण कार्यों का धराशायी होना बंद नहीं होगा और तब तक विकसित भारत केवल नारा बना रहेगा। गौरतलब बात ये है कि भ्रष्टाचार से इतर निर्माण डिजाइन का मानसून प्रूफ नहीं होना,परियोजना संचालन में तकनीकी खामी और निर्माण डेडलाइन पूरी करने में दिखाई गयी जल्दबाजी वह हड़बड़ी का भी नतीजा है कि इन परियोजनाओं में ये टूटन और हादसे घटित हो रहे हैं। स्थायी निर्माण कार्यों में हर तरह की संवेदनशीलता बरतकर आल वेदर प्रूफ बनाने व बिल्कुल दक्ष, ईमानदार तथा कुशल निर्माण कंपनियों को इन निर्माण कार्यों का ठेका ही इन स्थितियों का निदान है। अंत में ये सभी निर्माण स्थल मानसून की पूरी अवधि में टेस्ट कर उसके उपरांत कमीशन किये जाए तो ज्यादा सही होगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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