क्या चुनाव आयोग की छवि पुन: बहाल हो सकेगी ?
क्या चुनाव आयोग की मीटिंग के बाद चुनाव में धांधली का सवाल खत्म हो गया? क्या प्रेस रिलीज़ के ज़रिए इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का जो जवाब दिया गया है, उससे चुनाव आयुक्त संधू और जोशी के उठाये प्रश्नों का हल मिल गया है? क्या सारी शंका का समाधान हो गया है? मेरी राय में जो मूल सवाल हैं, वो अभी खूंटी पर टंगे हैं और पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था से पूछ रहे हैं कि जो असली सवाल था कि क्यों और किसके कहने पर वोटर लिस्ट को बदलने की कोशिश की जा रही थी? क्या ये महज एक तकनीकी बात थी या खामी थी या फिर पूरी वोटर लिस्ट के सिस्टम को हाईजैक कर के किसी को जिताने और किसी को हराने का खेल खेला जा रहा था?
संधू और जोशी के हवाले से जो खबर छपी थी उसमें साफ था कि किसी बहुत शक्तिशाली व्यक्ति के कहने पर या इशारे पर (ई.आर.ओज़) के पास जो वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और काटने के अधिकार थे वो कानूनी अधिकार थे। उनके अलावा किसी एक चुनाव क्षेत्र में कोई और न तो वोटर का नाम जोड़ सकता था और न ही नाम काट सकता था। लेकिन ये अधिकार उनसे छीन लिया गया था। 1950 और 1960 के कानून के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी एक भी वोटर का नाम वोटर लिस्ट में न तो जोड़ सकते हैं और न ही हटा सकते हैं लेकिन एक्सप्रेस के कहने पर ये अधिकार ई.आर.ओज़ से लेकर दिल्ली में किसी को दे दिये गये थे जो ़गैर-कानूनी है। आयोग की प्रेस रिलीज़ इस सवाल का जवाब नहीं देती।
संधू और जोशी ने ये सवाल पूछा था कि बंगाल में सोलह लोगों के नाम काटने का आदेश किसके कहने पर दिया गया था? इसका जवाब आयोग की बैठक में नहीं मिला। इस रहस्य पर से पर्दा क्यों नहीं हटाया गया कि चुनाव आयुक्तों की जानकारी के ब़गैर इतनी बड़ी संख्या में नाम काटने की कहानी किस की थी? कौन चाहता था कि ये नाम कटे और चुनाव आयुक्त ने जब सवाल किया तो उन्हें जवाब नहीं दिया गया? क्यों? क्या ये नाम किसी पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिये काटे जाने वाले थे? क्या ये नाम किसी एक पार्टी के समर्थक थे? क्या नाम किसी एक जाति या धर्म से जुड़े थे? क्या ये सारे नाम अवैध थे? कौन चाहता था कि इस रहस्य पर से पर्दा न उठे? क्या संधू और जोशी ये सवाल उठा कर चुप रह जायेंगे या जानने की कोशिश करेंगे कि वो कौन था जो चाहता था या चाहती थी कि इतनी बड़ी संख्या में नाम कटें? ये नाम आना भारत के लोकतंत्र के लिये बेहद ज़रूरी है ताकि पता चले कि वो असली अपराधी कौन है जो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था से खेल रहा था, जीतने के लिये या किसी को जिताने के लिये?
फिर इस सवाल का जवाब भी नहीं मिला कि गोवा में 97 वोटरों के नाम ई.आर.ओ. के बार-बार चिट्ठी लिखने के बाद भी वोटर लिस्ट में क्यों नहीं जोड़े गये। क्यों? यहां तक कि दिल्ली में बैठे डिप्टी चुनाव आयुक्त के कहने के लिखित आदेश के बाद भी ये काम नहीं किया गया। क्यों?
ये तीनों सवाल वोटर लिस्ट को मनमुताबिक तरह से बदलने के हैं। इस काम से मुख्य चुनाव आयुक्त या फिर उनके अधीन कनिष्ठ अधिकारियों को कोई फायदा नहीं होना था। न ही इसके बदले उन्हें किसी वित्तीय लाभ की बात है। इन अधिकारियों को चुनाव भी नहीं लड़ना था कि ये वोटर लिस्ट में बदलाव कर चुनाव जीतने की कोशिश करते। ऐसे में ये सवाल अहम है कि किसके कहने पर ये सब किया गया? किसको फायदा पहुंचाया जा रहा था? मेरा तो मानना है कि तीनों आयुक्तों के रहते हुए अब आयोग की छवि को सुधारा नहीं जा सकता। लिहाजा तीनों अपने पदों से इस्तीफा दें और नये आयोग का गठन हो। ज्ञानेश की छवि बहुत खराब हो चुकी है। उनके रहते लोगों को आयोग पर संदेह बना रहेगा। बाकी को भी ये जवाब देना होगा कि एक साल तक क्यों वो चुप रहे? वो संवैधानिक पदों पर थे। उन्हें पहले ही दिन आवाज़ उठानी चाहिए थी। क्यों नहीं उठाई? नये आयोग का गठन होगा तो उसकी ईमानदारी और निष्पक्षता पर सवाल नहीं होगा। विपक्ष को ये काम करना होगा। क्या वो कर पायेंगे? क्या कोई निष्पक्ष जांच हो पायेगी ये पता करने के लिये कौन है वो जो पूरी चुनावी प्रक्रिया को हाईजैक कर रहा था! ये पता लगना सबसे ज्यादा ज़रूरी है। क्या विपक्ष अपना काम कर पायेगा?



