दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए

विगत दिवस चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमरीका यात्रा की विश्व भर में चर्चा रही है। इसलिए भी कि शी जिनपिंग 11 वर्षों बाद अमरीका गए हैं, इसलिए भी कि आज दोनों देश विश्व की बड़ी अर्थ-व्यवस्था हैं, इसलिए भी कि ट्रम्प ने गत वर्ष 90 देशों पर टैरिफ लगाया, जिसमें भारत और चीन भी शामिल थे। चीन ने भी जवाब में टैरिफ लगाए, इस लड़ाई में दोनों देशों का ही बड़ा नुकसान हुआ। चाहे बाद में ट्रम्प ने अपने लगाए टैरिफों में सुधार किया परन्तु विगत दिवस उन्होंने अमरीकी संसद से हरी झंडी मिलने के बाद टैरिफ लगाने के अधिकार पुन: हासिल कर लिए हैं। दोनों देश अक्सर एक दूसरे से टकराव की स्थिति में रहते हैं, परन्तु दोनों देशों के इस सम्मेलन के बाद टकराव की स्थिति के मौजूदा समय में टल जाने की संभावना बनी दिखाई देती है। दोनों ही राष्ट्रपतियों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि वह ज्यादातर क्षेत्रों में एक दूसरे के साथ टकराव की बजाये सकारात्मक मुकाबलेबाज़ी की भावना से आगे बढ़ेंगे। अमरीका को चीन से दुर्लभ खनिजों की ज़रूरत है। अपनी कारों, हथियार, उड्डयन और इलैक्ट्रानिक वस्तुओं के उत्पादन में इन दुर्लभ खनिजों की बड़ी ज़रूरत है। अमरीका लगभग 70 प्रतिशत ऐसे दुर्लभ खनिज चीन से मंगवाता है। दोनों देशों का व्यापार लगभग 30 अरब डॉलर का है। यदि दोनों में सद्भावना जारी रहती है तो इनके आपसी व्यापार में भी भारी वृद्धि होने की संभावना है। चाहे इस यात्रा के दौरान चीन के राष्ट्रपति का भव्य स्वागत किया गया। ट्रम्प स्वयं उन्हें लेने के लिए हवाई अड्डे पर पहुंचे और उनके सम्मान में शाही दावतों का प्रबंध भी किया गया, परन्तु ऐसा सब कुछ होने के बावजूद दोनों देशों में क्रियात्मक रूप में कोई आपसी बड़े समझौते नहीं हुए, परन्तु प्रभावी भेंटवार्ता से जहां दोनों के व्यापार में वृद्धि हो सकती है, वहीं तकनीकी आदान-प्रदान भी बढ़ सकता है। चीन अमरीका-ईरान युद्ध में भी कोई अच्छी भूमिका अदा कर सकता है, परन्तु चीन हमेशा यह चाहता रहा है कि अमरीका ताइवान को सैन्य सहायता देना बंद करे, क्योंकि वह ताइवान को अपना हिस्सा समझता है। जबकि ताइवान अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने का इच्छुक है। इसलिए अमरीका उसे अरबों-खरबों डॉलरों के हथियार बेचता रहा है, परन्तु दोनों देशों के बीच इस बात का भी समझौता नहीं हो सका कि उनके बीच की टैरिफ लड़ाई किस तरह खत्म होगी। यदि आगामी समय में अमरीका पुन: यह हथियार प्रयोग करने का यत्न करता है तो इस टकराव के दोबारा शुरू होने की संभावना है। 
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में दोनों ही देश बड़ी तेज़ी से काम कर रहे हैं, परन्तु यह समझ अभी उत्पन्न होना शेष है कि इस नई तकनीक का इस्तेमाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवता की बेहतरी के लिए कैसे करना है? अमरीकी राष्ट्रपति के लिए इस समय चीन के साथ बेहतर संबंध बनाने इसलिए भी ज़रूरी हैं, क्योंकि आगामी नवम्बर में अमरीका में मध्यकालीन चुनाव होने जा रहे हैं। यदि ईरान के साथ उसकी लड़ाई कम होती है, आपसी सहयोग से अमरीका में ज़रूरी वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों में कमी आती है और अमरीकी कम्पनियां पुन: चीन में अपनी पूंजी लगवाने में सफल होती हैं, तो इन बातों का आगामी चुनावों में अमरीकी मतदाताओं पर बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना ज़रूर बन जाएगी, परन्तु क्या इसके बावजूद दोनों देश वर्षों से सामने खड़े आपसी मामलों का निकट भविष्य में कोई सुखद हल निकालने में सफल हो सकेंगे, इस संबंध में आशंकाओं के अभी भी रहने की संभावना दिखाई देती है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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