शानदार परिसर नहीं, गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा की ज़रूरत
शिक्षा किसी भी देश की सबसे अहम पूंजी होती है। सड़कें, इमारतें, उद्योग और तकनीक देश की प्रगति को गति दे सकते हैं, लेकिन ज्ञानवान, कुशल और ज़िम्मेदार नागरिकों के बिना यह प्रगति टिकाऊ नहीं हो सकती। इसलिए उच्च शिक्षा में निवेश को केवल खर्च नहीं, बल्कि शैक्षिक पूंजी में निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत में पिछले दशकों में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी सामने है कि क्या गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा वास्तव में सामान्य परिवारों के बच्चों के लिए किफायती है? आज कई शिक्षण संस्थान अपने विशाल कैंपस, आधुनिक इमारतों, वातानुकूलित कक्षाओं और महंगी सुविधाओं को अपनी पहचान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। ये सुविधाएं उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन एक अच्छे कॉलेज की वास्तविक शक्ति केवल उसकी इमारतों में नहीं होती।
अच्छे शिक्षक, मज़बूत पाठ्यक्रम, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं शोध के अवसर, डिजिटल संसाधन, विद्यार्थी मार्गदर्शन और मजबूत शैक्षणिक वातावरण किसी संस्थान की वास्तविक गुणवत्ता का निर्माण करते हैं। इसलिए भारत को ऐसे अधिक कॉलेजों की आवश्यकता है जो उच्च गुणवत्ता और कम फीस के मॉडल को अपनाएं। किसी विद्यार्थी के लिए शिक्षा का खर्च केवल ट्यूशन फीस तक सीमित नहीं होता। हॉस्टल, परिवहन, किताबें, डिजिटल उपकरण, परीक्षा शुल्क, भोजन और अन्य शैक्षणिक खर्च भी परिवार पर बड़ा आर्थिक बोझ डाल सकते हैं। एक सामान्य परिवार के लिए ये सभी खर्च मिलकर उच्च शिक्षा को कठिन बना सकते हैं। कई बार एक योग्य विद्यार्थी केवल इसलिए अपनी पसंद का पाठ्यक्रम नहीं कर पाता क्योंकि परिवार उसकी पूरी लागत वहन नहीं कर सकता। यह स्थिति हमें सोचने के लिए मजबूर करती है कि क्या शिक्षा केवल उन लोगों तक सीमित होनी चाहिए जिनके पास अधिक आर्थिक संसाधन हैं?
भारत के धनाढ्, उद्योगपति, कारोबारी, परोपकारी संस्थाएं, पूर्व विद्यार्थी और कॉरपोरेट क्षेत्र उच्च शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। बड़ी दान राशियां केवल शानदार इमारतें बनाने में ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की शिक्षा को किफायती बनाने में भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। ऐसे योगदान से छात्रवृत्तियां, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, शोध केंद्र, शिक्षक विकास, हॉस्टल और डिजिटल शिक्षा की सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दान का उपयोग ऐसे अवसर पैदा करने के लिए हो, जिनसे अधिक से अधिक योग्य विद्यार्थी लाभान्वित हो सकें। छात्रवृत्ति बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल छात्रवृत्ति ही समाधान नहीं है। हमें ऐसे संस्थानों की भी आवश्यकता है जहां सामान्य परिवारों के बच्चे बिना भारी कज़र् या अत्यधिक आर्थिक दबाव के पढ़ सकें। इसलिए किफायती कॉलेज मॉडल भारत की उच्च शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा हो सकता है जैसे कम फीस, गुणवत्तापूर्ण अध्यापन और मज़बूत शैक्षणिक सुविधाएं।
भारत की बड़ी आबादी गांवों और छोटे शहरों में रहती है। प्रत्येक विद्यार्थी के लिए महानगरों में जाकर महंगी शिक्षा प्राप्त करना संभव नहीं है। यदि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे, किफायती और आधुनिक कॉलेज विकसित किए जाएं तो विद्यार्थियों को अपने घरों के पास ही उच्च शिक्षा के अवसर मिल सकते हैं। इससे परिवारों का रहने और परिवहन का खर्च भी कम हो सकता है और स्थानीय क्षेत्रों में ज्ञान तथा रोज़गार का वातावरण भी मजबूत हो सकता है।
कॉरपोरेट क्षेत्र और बड़ी कंपनियां शिक्षा को सामाजिक निवेश का महत्वपूर्ण क्षेत्र मान सकती हैं। उनका योगदान केवल भवन निर्माण तक सीमित न रह कर विद्यार्थी छात्रवृत्ति, शोध, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल प्रयोगशालाओं और ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक अवसरों की दिशा में भी होना चाहिए। इसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और शैक्षणिक स्वतंत्रता को भी महत्व देना आवश्यक है।
किसी संस्थान के पूर्व विद्यार्थी उसकी सबसे मूल्यवान पूंजी हो सकते हैं। जो विद्यार्थी सफल होकर समाज में अपना स्थान बनाते हैं, वे अपनी पुरानी संस्था को आधुनिक सुविधाएं दे सकते हैं। उच्च शिक्षा को केवल सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना देना उचित नहीं है। महंगा कॉलेज अपने आप में अच्छी शिक्षा की गारंटी नहीं होता। हमारा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि विद्यार्थी क्या सीख रहा है, उसमें कौन-से कौशल विकसित हो रहे हैं, उसे शोध और स्वतंत्र चिंतन के कितने अवसर मिल रहे हैं और वह समाज के लिए किस प्रकार योगदान दे सकता है। हमें ऐसे भारत की कल्पना करनी चाहिए जहां किसी विद्यार्थी का भविष्य उसके परिवार की आय से नहीं, बल्कि उसकी योग्यताए मेहनत और उपलब्ध अवसरों से निर्धारित हो।
-मो. 94656-82110



