विद्यार्थियों की समस्याओं को गम्भीरता से सुना जाए
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी देश में उत्कृष्ट तकनीकी शिक्षा के सबसे प्रतिष्ठित केंद्रों में गिने जाते हैं। कठिन प्रवेश परीक्षा, कठोर अकादमिक प्रशिक्षण, शोध, उद्योग से मज़बूत संबंध और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों से मिलकर आईआईटी की पहचान बनी है। दुनिया भर की प्रतिष्ठित कंपनियां यहां से निकलने वाले युवाओं को अवसर देती हैं। इस चमकदार तस्वीर का स्याह पक्ष यह है कि इन संस्थानों में विद्यार्थियों की आत्महत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
आईआईटी बॉम्बे के छात्र की आत्महत्या ने एक बार फिर इन संस्थानों की व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाया है। गत वर्ष दिसम्बर में सरकार ने लोकसभा में बताया था कि पांच साल में 23 आईआईटी में छात्रों की आत्महत्या के 45 मामले सामने आए। आत्महत्या करने वालों में 12 छात्र ओबीसी, 9 एससी और 7 एसटी समुदायों से थे। 16 छात्र सामान्य श्रेणी से और एक छात्र आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) श्रेणी से था। ज़ाहिर है आईआईटी में आत्महत्या करने वालों में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों की संख्या भी कम नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों को जातीय और आरक्षण के नज़रिए से देखना समस्या के असली कारणों से मुंह चुराना होगा। आईआईटी परिसरों में विद्यार्थियों की आत्महत्याओं की घटनाएं केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं। किसी भी मेधावी विद्यार्थी की मौत परिवार ही नहीं देश के लिए भी अपूरणीय क्षति है और संस्थान के लिए आत्म-मंथन का अवसर भी। इसलिए संकीर्ण नज़रिए से निकलकर इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश होनी चाहिए।
आईआईटी में विद्यार्थियों की आत्महत्या की घटनाओं की जब चर्चा होती है तो अकादमिक दबाव की अनदेखी नहीं हो सकती। कठिन पाठ्यक्रम, लगातार परीक्षाएं, कम ग्रेड, बैकलॉग और भविष्य को लेकर चिंता के चलते विद्यार्थी दबाव में रहते हैं। आईआईटी में आने वाला विद्यार्थी सामान्यत: अपने स्कूल या कोचिंग के दिनों में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करता रहा होता है। यहां पहुंचने के बाद जब उसे पहली बार अपेक्षाकृत कम अंक मिलते हैं या वह अपनी कक्षा के अन्य विद्यार्थियों से पीछे महसूस करता है, तो उसे झटका लगता है।
ऐसे माहौल में शिक्षक की भूमिका केवल विषय पढ़ाने तक सीमित नहीं रह जाती। शिक्षक विद्यार्थी के लिए अकादमिक मार्गदर्शक होने के साथ-साथ उस व्यवस्था का मानवीय चेहरा भी होता है। इसलिए आईआईटी के प्रोफेसरों के पढ़ाने और विद्यार्थियों से व्यवहार के तौर-तरीकों को लेकर उठ रहे सवालों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। विद्यार्थियों के बीच एक आम शिकायत यह सुनने को मिलती है कि कई प्रोफेसर उनसे पर्याप्त संवाद नहीं करते और उनकी व्यक्तिगत कठिनाइयों या शैक्षणिक समस्याओं को अपेक्षित महत्व नहीं देते।
कक्षा में किसी विषय को समझाने और विद्यार्थी के समझने में अंतर होता है। एक शिक्षक अपने विषय का विशेषज्ञ हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह हर विद्यार्थी की सीखने की गति, मनोवैज्ञानिक स्थिति या व्यक्तिगत परिस्थिति को भी समझता हो। आईआईटी जैसे संस्थानों में विद्यार्थी देश के अलग-अलग हिस्सों और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं। इसलिए यहां शिक्षकों में संवेदनशीलता का महत्व बढ़ जाता है। अकादमिक अनुशासन आवश्यक है। विद्यार्थियों से उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा रखना गलत नहीं है। समस्या तब पैदा हो सकती है जब किसी विद्यार्थी को यह महसूस होने लगे कि एक खराब ग्रेड या अकादमिक असफलता के बाद उसके लिए संस्थान में कोई सहारा नहीं है। इसलिए आईआईटी में शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों की भी नियमित समीक्षा होनी चाहिए।
विद्यार्थियों की संख्या के लिहाज से शिक्षक भर्ती नहीं हुई है। पिछले लगभग एक दशक में आईआईटी में विद्यार्थियों की संख्या करीब 65 हजार से बढ़कर 1.35 लाख तक पहुंच गईए जबकि शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। यह केवल पढ़ाई की गुणवत्ता का प्रश्न नहीं है। कम शिक्षक होने का अर्थ यह भी है कि शिक्षक के पास विद्यार्थियों से व्यक्तिगत संवाद का समय ही नहीं है। जब हज़ारों विद्यार्थी बड़े संस्थान में पढ़ रहे हों तो केवल नियम, समितियां और शिकायत निवारण तंत्र बना देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए मानव संसाधन भी चाहिए। इसलिए छात्र कल्याण पर होने वाली चर्चा को शिक्षक भर्ती से अलग नहीं किया जा सकता। अधिक सक्षम और पर्याप्त संख्या में शिक्षक होंगे तो अकादमिक मार्गदर्शन, मेंटरिंग और विद्यार्थियों की समस्याओं को शुरुआती स्तर पर पहचानने की क्षमता भी बढ़ेगी। (एजेंसी)

