बेहद ज़रूरी है संयुक्त राष्ट्र का शक्तिशाली होना
इस समय बेहद तपिश भरी दुनिया में एक बड़ी चिंता का कारण है अलग-अलग स्थानों पर छिड़े हुए युद्ध। इनका सिर्फ युद्ध वाले क्षेत्रों में ही प्रभाव नहीं पड़ता, अपितु किसी न किसी रूप में इनका नकारात्मक प्रभाव विश्व के ज्यादातर क्षेत्रों को प्रभावित करता है। जैसे-जैसे ये युद्ध लम्बे होते जाते हैं, वैसे-वैसे ही अधिक विनाश के दृश्य सामने आते जाते हैं और इससे लगातार यह ़खतरा भी बना रहता है कि यह क्षेत्रीय युद्ध कहीं बड़े विश्व युद्ध न बन जाएं। 20वीं सदी में दो विश्व युद्ध हुए थे, जिनमें करोड़ों ही लोग मारे गए थे। धरती का बड़ा भाग तबाह हो गया था और दशकों तक इनका प्रभाव बरकरार रहा था। धीरे-धीरे देश इनके प्रभावों से उभरे थे, परन्तु प्रतीत होता है कि इन विनाशकारी युद्धों से सरकारों ने कोई सबक नहीं लिया, परन्तु इसके साथ यह भी सोचने वाली बात होगी कि आज जिस तरह के व्यापक स्तर पर ़खतरनाक हथियार और ़खतरनाक विनाशकारी बम बन चुके हैं, उनसे पूरी धरती ही जल कर राख हो सकती है। दो विश्व युद्धों के बाद बहुत से ऐसे संगठन भी अस्तित्व में आए, जो व्यापक स्तर पर शांति का दूत बने। मौजूदा समय में ज्यादातर देश एक-दूसरे के निकट आ चुके हैं। नई टैक्नोलॉजी ने एक तरह से इन्हें एकजुट कर दिया है। बहुत से संगठन एक सांझ के अहसास से व्यापार भी कर रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में दूसरे बड़े विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में आया था, जिसका मिशन विश्व के सभी देशों को एक कड़ी में पिरोना और शांति स्थापित करना था। इस उद्देश्य के लिए देशों के आपसी विवादों को अपने मंच द्वारा सुलझाना भी इसकी मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल था, परन्तु 80 वर्ष से भी अधिक समय से अस्तित्व में आया यह संगठन युद्धों को नहीं रोक सका। चाहे इसका मुख्य संदेश शांति स्थापित करना ही रहा है, परन्तु क्रियात्मक रूप में यह संगठन अलग-अलग विचारों के प्रकटावे के लिए एक मंच बन कर ही रह गया है। इसे प्रभावशाली और समय के समकक्ष बनाने के लिए सदस्य देशों द्वारा लगातार आवाज़ ज़रूर उठती रही है, परन्तु इसके पहले बनाए ढांचे में बड़े बदलाव संभव नहीं हो सके। यहां तक कि इस संगठन के अस्तित्व में आने के समय अफ्रीका के ज्यादातर देश और एशिया के कई देश बस्तीवाद का अपमान सहन कर रहे थे। स्वतंत्र होने के बाद वे संयुक्त राष्ट्र के सदस्य ज़रूर बन गए, परन्तु इसका ढांचा पुराना ही रहा। इसका पुनर्गठन करने से प्रभावशाली देशों ने अक्सर बड़ी हिचकिचाहट ही दिखाई है।
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटारेस जिनका दूसरा 5 वर्षीय कार्यकाल दिसम्बर, 2026 में समाप्त हो रहा है, ने संयुक्त राष्ट्र की जनरल असैम्बली के 81वें सत्र में अपना अंतिम संदेश दिया। उन्होंने कहा कि इस संगठन की सुरक्षा परिषद् का गठन दूसरे विश्व युद्ध के बाद किया गया था। उस समय और अब तक विश्व बड़ी सीमा तक बदल चुका है, जिसका अक्स प्रत्येक स्थिति में सुरक्षा परिषद् में नज़र आना चाहिए। अब नए समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उचित उपयोग करना, जारी युद्धों को खत्म करना और पर्यावरण के क्षेत्र में पैदा हुई नई चुनौतियों का सामना करने के लिए इस संस्था को नया रूप देना बेहद ज़रूरी होगा। विगत दिवस जनेवा में 4 देशों के विदेश मंत्रियों की एक अहम बैठक हुई थी, जिसमें भारत, ब्राज़ील, जर्मनी और जापान शामिल थे। विदेश मंत्रियों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में तत्काल सुधार करने पर ज़ोर दिया था और यह भी कहा था कि यह परिषद् मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की अपनी ज़िम्मेदारी को प्रभावशाली ढंग से निभाने में असमर्थ रही है।
आज के चुनौतियों भरे राजनीतिक माहौल में इस अंतर्राष्ट्रीय संगठन में अधिक सुधारों की ज़रूर प्रतीत होती है। इसमें अफ्रीका, एशिया, लातीनी अमरीका और कैरेबियन जैसे कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों की अधिक भागीदारी होनी चाहिए। आज इस संगठन को प्रभावशाली ढंग से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी भूमिका निभाने के लिए बड़े सुधारों की ज़रूरत है, जिसके लिए प्रभावशाली देशों को भी अपना रवैया बदलना होगा, ताकि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देशों के विवादों का पारदर्शी और मज़बूत ढंग से हल किया जा सके।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

