नस-नस में घुलता ज़हर और टूटते भविष्य का चक्रव्यूह
देश की राजधानी दिल्ली से लेकर सरहदी राज्य पंजाब तक आज हमारा पूरा समाज एक ऐसे अदृश्य और घातक युद्ध का सामना कर रहा है, जिसके हथियार बारूद की तरह धमाका नहीं करते, बल्कि चुपचाप हमारी रगों में पिघलकर एक पूरी पीढ़ी को भीतर से खोखला कर रहे हैं। नशीले पदार्थों का फैलता यह मायाजाल केवल कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर ही एक सामान्य चुनौती नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक तानेबाने, पारिवारिक संबंधों की उम्मीदों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक सीधा प्रहार है। जब किसी देश की युवा आबादी रचनात्मकता, तकनीक और विकास के नए सोपान गढ़ने के बजाय सिंथेटिक ड्रग्स और हेरोइन के नशे में अपनी सुध-बुध खोने लगे, तो वह संकट किसी महामारी से कम नहीं रह जाता। विडंबना यह है कि यह धंधा अब सिर्फ कुछ खास इलाकों या महानगरों के अंधेरे कोनों तक सीमित नहीं रहा, यह आधुनिक तकनीक और डार्कवेब की बैसाखी थामकर देश के हर कोने में पैर पसार चुका है।
यदि हम इस समस्या के तात्कालिक और सबसे भयावह गढ़ को देखें, तो देश की धड़कन कही जाने वाली दिल्ली इस त्रासदी की अग्रिम पंक्ति में आकर खड़ी हो गई है। दिल्ली में ड्रग्स का यह मायाजाल किस कदर फैल चुका है, इसका सबसे ताजा और खौफनाक उदाहरण हाल ही में सामने आया है। दिल्ली पुलिस द्वारा चलाए गए एक व्यापक 96 घंटे के विशेष एंटी-नारकोटिक्स ऑपरेशन में लगभग 5 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं। इस बड़े एक्शन में पुलिस ने 19 से अधिक ड्रग तस्करों को गिरफ्तार किया, जिनमें छह विदेशी नागरिक भी शामिल हैं जो राजधानी की सड़कों पर मौत का यह सामान बांट रहे थे। इस जब्ती में केवल पारंपरिक गांजा ही नहीं, बल्कि हेरोइन, अफीम और कोकीन जैसे अत्यंत घातक और महंगे सिंथेटिक ड्रग्स बरामद हुए हैं। दिल्ली में ड्रग्स का यह स्वरूप बेहद कॉरपोरेट और खतरनाक हो चुका है, जहां नाइजीरियाई और अन्य अंतर्राष्ट्रीय गिरोहों की सक्रियता से लेकर स्थानीय पेडलर्स का एक ऐसा जाल तैयार हो गया है जो स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्र-छात्राओं को अपना आसान शिकार बना रहा है। महानगर की चकाचौंध, ‘पीयर प्रेशर’ (दोस्तों के बीच कूल दिखने की चाहत), माता-पिता की व्यस्त जीवनशैली और बच्चों के एकाकीपन ने इस आग में घी डालने का काम किया है। दिल्ली पुलिस और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो आए दिन करोड़ों रुपये की खेप पकड़ते हैं, लेकिन यह जब्ती समुद्र में एक बूंद जैसी ही दिखाई देती है, क्योंकि मांग की जो खाई तैयार हो चुकी है, उसे पाटना केवल पुलिसिया कार्रवाई के बस की बात नहीं है।
दिल्ली के इस कॉरपोरेट ड्रग नेटवर्क के तार जब राज्यों की सीमाओं को पार करते हैं, तो पंजाब का नाम इस त्रासदी के दूसरे सबसे बड़े प्रभावित केंद्र के रूप में उभरता है। कभी अपनी खुशहाली, हरित क्रांति और गबरू जवानों के पौरुष के लिए पहचाना जाने वाला पंजाब आज पिछले कुछ दशकों से नशे के ऐसे दलदल में फंसा है जिससे निकलना उसके लिए लगातार मुश्किल होता जा रहा है। दिल्ली जहां एक बड़े वितरण केंद्र और उपभोक्ता बाजार के रूप में इस्तेमाल हो रही है, वहीं पंजाब सीमा पार से होने वाली नार्को-तस्करी की सीधी मार झेल रहा है। सीमापार से होने वाली ड्रोन तस्करी, पारंपरिक अंतर्राष्ट्रीय रास्तों से छनकर आने वाली हेरोइन और स्थानीय स्तर पर मिलने वाले सिंथेटिक ड्रग्स ने पंजाब के गांवों और कस्बों को श्मशान जैसी खामोशी की तरफ धकेल दिया है। आंकड़ों और हालिया रिपोर्टों से यह साफ जाहिर होता है कि पंजाब में ड्रग्स की समस्या अब सिर्फ चुनावी रैलियों का एक खोखला नारा बनकर रह गई है, जबकि जमीन पर स्थिति यह है कि राज्य की युवा ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा ‘चिट्टे’ की भेंट चढ़ चुका है। बेरोज़गारी, कृषि क्षेत्र का ठहराव और पश्चिम की तरफ भागने की अंधी दौड़ ने युवाओं को एक ऐसे अवसाद में धकेला है जिसका फायदा सीधे तौर पर सीमा पार बैठे तस्करों और स्थानीय राजनेताओं-अपराधियों के गठजोड़ ने उठाया है।
वैश्विक स्तर पर भारत की भौगोलिक अवस्थिति ने इस संकट को और अधिक संवेदनशील बना दिया है, क्योंकि हम दुनिया के दो सबसे बड़े अवैध अफीम उत्पादक क्षेत्रों ‘गोल्डन क्रेसेंट’ (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान) और ‘गोल्डन ट्रायंगल’ (म्यांमार, लाओस, थाईलैंड) के बीच सैंडविच की तरह फंसे हुए हैं। इसी भौगोलिक मजबूरी और सीमाओं के पार से होने वाली साजिशों के कारण दिल्ली और पंजाब जैसे क्षेत्र इस समय नशे की सबसे भीषण मार झेल रहे हैं। आज का ड्रग माफिया केवल सीमाओं पर कंटीली तारों के नीचे से पैकेट फेंकने तक सीमित नहीं है। अब डार्कवेब, एंक्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए नशीली दवाओं की डीलिंग की जा रही है। एक क्लिक पर कॉलेज के हॉस्टल या घर के दरवाजे तक कूरियर सेवाओं के माध्यम से ड्रग्स डिलीवर हो रहे हैं। तकनीक के इस दुरुपयोग ने अपराधियों को एक अभेद्य सुरक्षा कवच दे दिया है, जिससे उनके मूल स्रोतों तक पहुंचना बेहद जटिल हो गया है। यह सीधे तौर पर हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चेतावनी है, क्योंकि खुफिया रिपोर्टें बार-बार इस बात की पुष्टि करती हैं कि ड्रग्स के इस व्यापार से होने वाली काली कमाई (नार्को-टेररिज्म) का इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों, हथियारों की खरीद और आतंकवाद को वित्तपोषित करने के लिए किया जा रहा है।
इस सर्वव्यापी संकट से निपटने के लिए सरकार ने ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ और राष्ट्रीय कार्ययोजना जैसी नीतियां तो बनाई हैं, लेकिन इन नीतियों का क्रियान्वयन प्रशासनिक सुस्ती की भेंट चढ़ जाता है। स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 जैसे सख्त कानून होने के बावजूद अपराधियों को सजा मिलने की दर बेहद कम है, जिसके कारण तस्करों के हौसले बुलंद हैं। इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए हमें त्रि-स्तरीय रणनीति पर पूरी ताकत से काम करना होगा, जिसमें पहला स्तर आपूर्ति को पूरी तरह रोकना, दूसरा मांग को खत्म करना और तीसरा पुनर्वास है। सीमाओं पर ड्रोन-विरोधी तकनीक, तटीय सुरक्षा में आधुनिक रडार और डार्कवेब की निगरानी के लिए विशेष साइबर विंग को चौबीसों घंटे सक्रिय रखना होगा। इसके साथ ही, दिल्ली और पंजाब जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष टास्क फोर्स का गठन करके राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बैठे सफेदपोश मददगारों को बेनकाब करना होगा, जिनके संरक्षण के बिना यह अरबों रुपये का धंधा फल-फूल नहीं सकता।



