जगमगाहट के बिना जलते हुए दीये

‘पुराने गाने तो कभी नहीं सुनते होंगे आप?’ मशहूर गायक के.एल. सहगल का एक गीत है, ‘जगमग जगमग दीया जला।’ जब हमने यह गीत सुना तो हमारे मन में अवश्य आया कि हमें भी आज के ज़माने में उस दीये की तलाश करनी चाहिए, कि जो जलते हुए वास्तव में जगमगाता है, और रास्ते की रौशनी छांट देता है। 
लेकिन जनाब, युग बदल गया है। हमें तो ऐसे दीये मिले कि जो जलने के बावजूद जगमगाते नहीं, बल्कि रौशनी छांटने की बजाय अंधेरा और बढ़ा देते हैं। हां, आजकल जब प्रशासन के द्वारा मौसम बदलने पर फिर घोषणा होती है, कि ‘बिजली आपूर्ति का पूरा-पूरा इंतजाम कर लिया गया है और इस बार कोई पॉवर कट नहीं लगेगा,’ तो लोग अपने अपने दीयों की रसद तलाशने लगते हैं। क्योंकि पॉवर कट नहीं लगने का मतलब है कि पॉवर कट लगेगा ही लगेगा और लोग अपना-अपना अंधेरा छांटने के लिये दीये जलाने की व्यवस्था करने लगते हैं। 
इस देश में हमेशा ऐसे ही होता है। जब यहां घोषणा होती है कि बहुत सी विचारणीय समस्याएं देश के सामने मुंह बाये खड़ी हैं और इस बार संसद या विधानसभाओं के नये सत्र में सदस्यगण तनिक भी हंगामा नहीं करेंगे, और बड़ी गम्भीर चर्चा के बाद किसी ठोस नतीजे पर पहुंच जाएंगे, तो समझ लीजिये आपके सामने वही माहौल नज़र आएगा, तो सांसद या विधानसभा सदस्य इस बार चिल्लाने के सब रिकार्ड मात कर देंगे। इनके सत्रों का इतनी बार सत्रावसान हो जाएगा कि आपको लगेगा कि क्या संसद या विधानसभा के नये सत्रों को आयोजित करने का अर्थ सत्रावसान या संसद या विधानसभा के सत्र का स्थगित हो जाना बन गया है। इस बीच थोड़ा-सा समय मिलने पर बिना चर्चा के अपने बहुमत के बल पर सरकार सभी प्रायोजित बिल पास करवा लेती है। निष्कर्ष निकलता है, कि संसद और विधानसभा अपने लक्ष्य के अनुसार चली और सभी प्रायोजित बिल पास हो गये। चाहे इस दौरान विपक्षी सदस्य अपने गाल बजाते रहे, या अभ्रद टिप्पणियां देने के मानदण्ड पक्षी-विपक्षी सदस्यों द्वारा स्थापित होते रहे, लेकिन इससे हमें क्या लेना? सरकार को तो ऐसे सत्रों के बाद विजय का दीपक जला लेना चाहिए कि लक्ष्यानुसार काम हो गया, और भारत का लोकतंत्र शानदार सफलता के साथ चलता रहा।
हमें किसी ने पूछा है, कि इस बार आप यह दीया जलाने का सन्देश कहां से ले आए और बार-बार इसे दुहरा रहे हैं? क्या आपको याद नहीं कि इस देश में कोविड महामारी के दिनों में कोविड के मच्छरों को भगाने के लिए पहले थालियां बजाने और इसके बाद दीये जलाने का हुक्म हर आम और खास के लिए हुआ था। दीये जले थे, और खूब जले थे, लेकिन कोविड के मच्छर उसी तरह दनदनाते रहे, और कोविड की लहर-दर-लहर आती रही। लोग मरते रहे तो हमारे भाग्य-नियन्ताओं ने कहा कि चलो हमारे गणित से जनसंख्या का नियंत्रण अपने आप होने लगा। एक लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो अधिक आबादी वाले इस देश में अत्याधिक जनसंख्या के नियंत्रण का लक्ष्य तो पूरा हुआ। शायद इसी सफलता का प्रमाण है कि हमारा भारत आज दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में पहले नम्बर दो था, अब नम्बर एक हो गया है, और चीन को इस दृष्टि से पछाड़ कर आगे बढ़ गया। चलो किसी दृष्टि से तो हमने चीन को पछाड़ा, आओ इस खुशी में एक दीया जला लें। लेकिन बाज़ार में गए तो पता चला कि बाज़ार से दीये गायब हैं। दीपावली तो दूर है, फिर दीये कैसे गायब हो गये?  जी हां, सांस्कृतिक खोज में महानायक ने हमें बताया कि दीये हमें हमेशा महामानवों के अवतरण या ऐसी ही किसी बड़ी खुशी होने के अवसर पर जलाये जाते हैं। हमने कहा ‘कि इस समय तो सबसे बड़ी खुशी का दिन वह होता, कि जब इस देश से बेकारी गायब हो जाती। भ्रष्टाचार मिट जाता या परिवारवाद का खात्मा हो जाता।’ जवाब मिला, ऐसा कुछ नहीं है। हमारे यहां सब काम करीने से होता है। पहले यहां महानायक का जन्मदिन मनाया जाता है। उत्सव प्रेमी देश है। खुशियां बंटती हैं। बाजा-गाजा होता है। नृत्य गीत होता है। फिर बाकी सब कामों की ओर ध्यान देने की बारी आती है। अभी तो देखो, दीये जला कर कैसा बड़ा उत्सव मनाया जा रहा है।
हमने गरीब बस्तियों की ओर देखा, वहां घुप्प अंधेरा था। एक भी दीया जलने का साहस नहीं कर रहा था। हां, दीये जल रहे हैं... बहुमंज़िला इमारतों पर, भव्य प्रासादों पर। हम खुशी से भर गये। हां यही तो हमारी असली तरक्की की तस्वीर है।

#जगमगाहट के बिना जलते हुए दीये