चापलूसी राजनीतिक पार्टियों को कमज़ोर कर देती है
प्रधानमंत्री मोदी को देर से जन्म दिन की ढेरों शुभकामनाएं। लंबी उम्र हो। वैसे मैं जन्म दिन मनाने के पक्ष में नहीं रहता लेकिन परिवार और दोस्तों के दबाव में जन्म दिन मन जाता है। दोस्त आते हैं और लोगों का मिलना हो जाता है। ऐसे मौकों पर दोस्त टांग खिंचाई ज्यादा करते हैं। तारीफ तो शायद ही कोई करे। जो मुझे जानते हैं या जिन लोगों ने मेरे साथ काम किया है वो इस बात की तस्दीक करेंगे कि मुझे चमचागिरी पसंद नहीं है। राजनीति का मेरा तजुर्बा कम है। कुल साढ़े चार साल का लेकिन कह सकता हूँ कि राजनीति में ऐसे लोग खूब फलते फूलते हैं। इस किस्म के लोग, मुंह पर तो फूल बरसाते हैं और पीठ पीछे गालियां देते हैं। और यही लोग वक्त मिलते ही आप का साथ छोड़ देते हैं या अपने स्वार्थ के लिये दल बदल लेते हैं और फिर दूसरे के चमचे बन जाते हैं। गांधी से लेकर मोदी तक अगर आप इतिहास को खंगालेंगे तो चमचों की एक पूरी लिस्ट बन जायेगी। ये भी सचाई है कि हर नेता को, हर कामयाब आदमी को ऐसे चमचे पसंद होते हैं, या यूं कहे कि अपनी तारीफ सुनना इन्हें अच्छा लगता है। ऐसे में मोदी जी के जन्म दिन पर चमचागिरी का जो तमाशा देखने को मिला वो अप्रत्याशित तो नहीं था।
बड़े-बड़े नेताओं का प्रधानमंत्री के लिये हवन करना, आरती उतारना और दीये जलाना दुखद था। ये सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये ही ऐसा कर रहे थे। ये जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी भाजपा के इतिहास में सबसे कामयाब नेता हैं। वो पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं। तीन बार के मुख्यमंत्री और तीन बार के प्रधानमंत्री। उनकी नज़र टेढ़ी हो जाये तो राजनीतिक कैरियर खत्म। नज़र में दया भाव आ जाये तो बल्ले बल्ले। क्या कुछ नहीं वो कर सकते या क्या कुछ नहीं बना सकते। दोस्त मेरे घर आते हैं मेरा जन्म दिन मनाने तो मेरी टांग भी खींचते हैं और तंज भी कसते हैं और जो वाकई में दोस्त हैं वो अच्छी सलाहें भी देते हैं। मेरी गलतियों पर कभी कभी सुना भी देते हैं या यूं कहें कि सही रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं। लेकिन राजनीति का मेरा अनुभव कहता है कि वहां दोस्ती नहीं है। वहां प्रतिस्पर्धा है। गला काट प्रतिस्पर्धा। एक-दूसरे को गिराने का खेल चलता रहता है। राजनीति व्यक्ति की सबसे खराब और घृणित प्रवृत्ति को उभारती है, मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देती है। विरले ही होते हैं जो अच्छे इंसान बने रहते हैं और ऐसे लोग राजनीति में ज्यादा सफल नहीं होते।
मोदी जी को क्या ऐसे लोग पसंद हैं जो उनकी तुलना भगवान से करते हैं? या उनको विष्णु का अवतार बताते हैं? मैं ये दावे से कह सकता हूं कि ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। लेकिन ये उनकी राजनीति का सफल फार्मूला है। चमचागिरी करने वाले हमेशा उनके तेज और खौफ में दबे रहे ये ज़रूरी है ताकि ये लोग उनके खिलाफ बगावत न कर सकें। उनके विरुद्ध विरोध का झंडा न बुलंद कर सकें। और इस तकनीक का इस्तेमाल हर सफल राजनेता करता है। और शायद ये उसकी कामयाबी का एक बेहतर नुस्खा भी है। और यहीं से निकलता है व्यक्ति पूजा का रास्ता। परिपक्व लोकतंत्र में व्यक्ति पूजा के लिये कोई जगह नहीं होती। भारतीय लोकतंत्र में ‘प्रधानमंत्री समान लोगों में प्रथम होता है’। उनका दर्जा भी कैबिनेट मिनिस्टर का ही होता है। भारतीय लोकतंत्र के निर्माताओं ने ये व्यवस्था की थी कि प्रधानमंत्री किसी पार्टी का नेता नहीं होगा और न ही चुनाव पार्टी आधारित होंगे। भारतीय संविधान में पार्टी शब्द तक नहीं है। पहली बार पार्टी शब्द का ज़िक्र तब आया जब ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति को रोकने के लिये दल बदल विरोधी कानून आया। अन्यथा संविधान साफ तौर पर कहता है कि चुनाव के बाद लोकसभा सदन का नेता चुनेगी और जो नेता चुना जायेगा वो प्रधानमंत्री होगा। और फिर वो अपनी कैबिनेट का चयन करेगा।
संविधान निर्माताओं ने तब नहीं सोचा था कि एक दिन भारतीय लोकतंत्र पार्टी या पार्टियों का पर्याय हो जायेगा। नेहरू के जमाने से पार्टी का ऐसा प्रभुत्व जमा कि बिना पार्टी के भारतीय लोकतंत्र की कल्पना करना भी असंभव हो गया। नेहरू लोकतांत्रिक थे इसलिये उनकी पार्टी में विचार भिन्नता के लिये जगह थी और पार्टी के अंदर विचारों में संघर्ष होता था। खुद नेहरू कभी-कभी इससे परेशान होकर इस्तीफे की पेशकश कर देते थे लेकिन इंदिरा गांधी के समय पूरी पार्टी ‘सम्राट तंत्र’ में बदल गई। पार्टी में इंदिरा ही थी, ऊपर से नीचे तक। देबकांत बरुआ ने तो कह दिया था- ‘इंदिरा ही भारत हैं और भारत ही इंदिरा’। चमचों की इस जमात ने कांग्रेस की इमारत को कमजोर किया। और दरबारी नेताओं को लगने लगा था कि चमचागिरी कर के ही बड़े-बड़े पद पाये जा सकते हैं। ये प्रवृत्ति इंदिरा के लिये तो सुखद थी लेकिन पार्टी के लिये ज़हर। संजय गांधी की चप्पल जब कैबिनेट मंत्री ढोने लगे तो कांग्रेस का पतन निश्चित हो गया। कांग्रेस आज जहां पहुंची है उसके लिये इंदिरा गांधी काफी हद तक ज़िम्मेदार हैं। दरबारियों ने ऐसे हालात बना दिये कि पार्टी के मज़बूत और जनाधार वाले नेताओं को कांग्रेस छोड़नी पड़ी। ममता बनर्जी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। आज वही लक्षण भाजपा में भी मुझे दिखाई पड़ रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धियां तारीफ के काबिल हैं। पार्टी नेताओं को उनकी तारीफ करनी चाहिये लेकिन तारीफ करने और चमचागिरी करने में फर्क है। भाजपा में आज की तारीख में इंदिरा कालीन कांग्रेस की तरह ऐसे तमाम नेताओं को, जिनका मज़बूत जनाधार था या है, उनको किनारे लगा दिया गया है या लगाया जा रहा है। अटल-आडवाणी के समय में दूसरी पंक्ति के नेताओं की एक शानदार जमात थी। केंद्र में भी और राज्यों में भी। आज योगी आदित्यनाथ जैसे एक दो नेताओं को छोड़ दें तो बाकी अपना चुनाव नहीं जीत सकते। एक-एक कर हर बड़े नेता को निपटा दिया गया है जैसे इंदिरा गांधी ने किया था। भाजपा के शीर्ष पर वो नेता हैं जो दस साल या अधिक से उनकी कृपा से मंत्री बने हैं या पार्टी में ऊंचे ताकतवर पदों पर बने हुये हैं। सिवाय प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश को आंख मूंदकर मानने के उनकी कोई उपलब्धि या प्रतिभा नहीं है। ये बड़े-बड़े बंगलों में रहते हैं। लेकिन ये सिर्फ दीवार पर टंगी तस्वीरें हैं जिनमें जीवन नहीं है। इनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, यही इनकी सफलता का राज है।
भाजपा में आज की तारीख में बड़ी संख्या में वो लोग ऊंचे पदों पर हैं, कैबिनेट मंत्री या मुख्यमंत्री बने हुये हैं जो बाहर से आये हैं। इनकी कोई विचारधारा नहीं है। ये विशुद्ध तौर पर दरबारी हैं। पदलोलुप। अवसरवादी। भाजपा कमजोर होगी तो फिर पाला बदल लेंगे। भाजपा में ऐसे लोगों को जगह मिली ये हैरानी की बात है क्योंकि भाजपा कैडर बेस्ड पार्टी है, उसकी एक सुविचारित विचारधारा है। वो सामूहिक नेतृत्व पर चलती रही है। लेकिन मोदी के नेतृत्व सम्भालनेबाद से भाजपा में सामूहिक नेतृत्व खत्म हो गया है। पार्टी पूरी तरह से मोदी में समाहित हो गई है। जैसे इंदिरा के समय हुआ था। भाजपा के वरिष्ठ नेता जो पहले तेजस्वी होने का दंभ पालते थे अचानक अपने मूल स्वरूप में आ गये। मोदी की जय-जय कार करने लगे और उनकी तुलना भगवान से करने लगे। ये सफलता का सबसे नायाब नुस्खा है। जो रोग कांग्रेस को लगा था वो भाजपा को लग गया है। ये वो रोग है जो पार्टी को घुन की तरह खाता रहता है और जब तक वो नेता शीर्ष पर रहता है तब तक सबकुछ सही लगता है और जैसे ही वो नेता हटता है, इमारत जर्जर हो जाती है और फिर उसकी उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। मोदी की चमचागिरी में होने वाला कृत्य मोदी की ताकत की निशानी है लेकिन ये अपने साथ भाजपा के पतन की कहानी भी लिख रहा है।

