क्या यूपीआई को खुद ही कमज़ोर कर रही है सरकार ?

तकनीक की दुनिया में भारत की जिस एक सफलता को दुनिया भर में सराहा गया है, वह यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) है। लोगों की ज़िंदगी आसान बनाने की कसौटी पर यह वित्तीय तकनीक खरी उतरी है। मगर अब खुद भारत सरकार ने इसकी राह में रुकावटें खड़ी करने की शुरुआत कर दी है। 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) तय कर नरेंद्र मोदी सरकार ने वह रास्ता खोला है, जिससे आगे चलकर यह माध्यम आम कारोबार में आकर्षक नहीं रह जाएगा। यही बात भारत के अपने कार्ड नेटवर्क रुपे पर भी लागू होती है। फिलहाल, 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर/ भुगतान शुल्क तय हुआ है। यह सिर्फ  कहने की बात है कि एमडीआर का भुगतान खरीदारों को नहीं, बल्कि विक्रेताओं को करना होगा। क्रेडिट कार्ड के पुराने तजुर्बे के आधार पर यह कहने का आधार है कि अनेक स्थानों पर शुल्क भुगतान का बोझ उपभोक्ता को भी साझा करना होगा। इससे भी आपत्तिजनक पहलू यह शिकायत है कि यह कदम अमरीका के दबाव में उठाया गया है। डोनल्ड ट्रम्प प्रशासन विभिन्न देशों पर डिजिटल भुगतान में अमरीकी कंपनियों के लिए रास्ता सुगम बनाने के लिए दबाव डालता रहा है। यह भी गौरतलब है कि यूपीआई भुगतान का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा अमरीकी कंपनियों के ऐप—फोन-पे, गूगल-पे, अमेजन आदि के ज़रिए होता है। अब 2000 रुपये से ज्यादा के हर भुगतान पर वसूले गए शुल्क में इन कंपनियों को 20 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। इससे उनका बाज़ार भाव बढ़ेगा। इसीलिए भारत के राष्ट्रीय नज़रिए से ताज़ा निर्णय को आत्म-प्रहार ही कहा जाएगा। 
भागवत के संकेत का मतलब
राष्ट्रीय स्वयंसेवक सेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में फिर ऐसी बात कही है, जिसके राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं और कयास लगाया जा रहा हैं कि वह किसकी ओर इशारा कर रहे थे। उन्होंने अहंकार को लेकर कहा कि जिसका उदय हुआ है उसका अस्त भी होगा। भागवत ने कहा कि अगर कोई समझता है कि हर समय उसकी ही सत्ता रहेगी और सब कुछ उसके हिसाब से ही होगा तो ऐसा नहीं होता है। उनके इस बयान के बाद अटकलों का दौर शुरू हो गया है। माना जा रहा है कि उनका इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर है। यह भी कहा जा रहा है कि संघ के मुखिया ने मोदी का जन्मदिन बहुत व्यापक पैमाने पर मनाने और आम लोगों से दीये जलवाए जाने के संदर्भ में यह बात कही। हो सकता है कि उन्होंने मोदी को लक्ष्य करके यह बात कही हो। एक साल पहले 75 वर्ष की उम्र में सेवा-मुक्ति लेने वाला उनका बयान भी ऐसा ही था, जिस पर उन्होंने बाद में स्पष्टीकरण भी दिया था। 
राहुल क्यों नहीं समझाते?
राहुल गांधी पूरे देश में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता की लड़ाई लड़ने का बीड़ा उठाए हुए हैं। वह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर इस बात को लेकर लगातार हमले करते हैं कि उसने मीडिया का गला घोंट दिया है और वह पत्रकारों को अपना काम करने से रोक रही है। जब भी किसी पत्रकार के खिलाफ  कोई कार्रवाई होती है तो राहुल सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं, लेकिन कांग्रेस के शासन वाले राज्यों में ऐसा कुछ होता है तो वह खामोश रहते हैं। हाल ही में केरल में पुलिस एक मलयालम टीवी चैनल के कार्यालय में लाइव शो के बीच पुलिस घुसी और उसने कार्यक्रम रुकवा कर चैनल कार्यालय में तलाशी ली व लोगों से पूछताछ की। यह मामला अर्जेंटीना के फुटबॉल खिलाड़ी लियोनल मेसी के केरल दौरे से जुड़ा हुआ है। आरोप है जब मेसी केरल के दौरे पर पहुंचे थे तब जो कार्यक्रम आयोजित हुआ था, उसमें बहुत वित्तीय गड़बड़ी हुई थी। इस मामले की जांच के लिए एक एसआईटी बनी है। उसने चैनल के दफ्तर पर ही छापा मार दिया। मलयालम चैनल ‘रिर्पोटर टीवी’  के प्रमोटर ऑगस्टीन बंधु है। उनके अन्य ठिकानों पर भी छापा मारा गया है और जांच पड़ताल चल रही है। बहरहाल इतने बड़े घटनाक्रम पर राहुल गांधी चुप हैं।
धीरेंद्र शास्त्री ने भाजपा का नुकसान किया
पश्चिम बंगाल में सरकार बनने के बाद बड़े धूम-धड़ाके से बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री बंगाल पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी की सरकार थी तो उनको राज्य में नहीं आने दिया जाता था। उन्होंने यह भी कहा कि अब सरकार बदल गई है और लोगों का मन बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुर्गापूजा के समय जो लोग मांसाहारी भोजन का सेवन करते हैं, उन्हें इसे छोड़ने को कहा। यह बात मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी में उन्होंने कही। इसका कितना बड़ा नुकसान हुआ है उसका अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि बंगाली लोगों को शांत करने के लिए भाजपा के सभी प्रदेश नेताओं ने धीरेंद्र शास्त्री पर हमला किया। डैमेज कंट्रोल करने के लिए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी को माता के एक मंदिर में जाकर मछली का भोग लगवाना पड़ा और वही बैठ कर मछली खानी पड़ी। इसके वीडियो और तस्वीरें भाजपा की ओर से वायरल कराई गईं। पहले विश्व हिंदू परिषद के कुछ नेताओं ने भी मांस, मछली न खाने की सलाह दी थी। इसका बहुत विरोध हो रहा है और बंगाली लोग इसे अपनी संस्कृति पर हमला मान रहे हैं। भाजपा को चिंता हो गई है कि राजनीतिक रूप से कमज़ोर हो रही ममता बनर्जी को इस विवाद से नई संजीवनी मिल गई है। ममता ने भाजपा को बंगाल विरोधी बताना शुरू कर दिया है। 
अब आम नहीं, अपना आदमी पार्टी
भारत में जब भी किसी राजनीतिक पार्टी के पदाधिकारियों की घोषणा होती है तो देखा जाता है कि उसमें जातीय समीकरण का कितना ध्यान रखा गया है। ऐसे की सरकार के मंत्रियों के चयन में भी सामाजिक व क्षेत्रीय संतुलन की बात होती है। हर जाति को उसकी राजनीतिक ताकत और उस पार्टी के प्रति उसके समर्थन के अनुपात मेें जगह दी जाती है। लेकिन नए तरह की राजनीति करने वाले आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल इसका ध्यान नहीं रखते हैं। उनके लिए जातीय समीकरण से ज्यादा नेताओं की निष्ठा ज्यादा महत्व रखती है। पिछले दिनों उन्होंने पार्टी की नई कार्यकारिणी बनाई और नए संगठन का ऐलान किया तो हमेशा की तरह उसमें अपनी जाति और रिश्तेदारी के लोगों को ही महत्वपूर्ण पदों पर रखा। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई, जिसमें केजरीवाल को एक बार फिर राष्ट्रीय संयोजक चुना गया। माना जा रहा है कि जब तक उनके परिवार का कोई सदस्य संयोजक की ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हो जाएगा तब तक केजरीवाल ही संयोजक रहेंगे। पिछले 14 साल से वह यह ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर उठा रहे हैं। उन्होंने अपने स्वजातीय पंकज गुप्ता को फिर से पार्टी का सचिव बनाया गया। तीसरी सबसे अहम नियुक्ति एन.डी. गुप्ता की हुई। उन्हें पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाए रखा गया। यानी आम आदमी पार्टी के तीनों शीर्ष पदों पर वैश्य समुदाय के तीनों नेता महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभाते रहेंगे।

#क्या यूपीआई को खुद ही कमज़ोर कर रही है सरकार ?