मेरी कॉलम-नवीसी के यादगारी पल

1970 के होला महल्ला के दौरान मैं अपनी पत्नी सहित ज़िला होशियारपुर में माहिलपुर के पास अपने पैतृक गांव सूनी गया हुआ था कि सुबह समाचार पत्र से पता चला कि पंजाब भाषा विभाग ने अपना वार्षिक ईनाम वितरण समारोह आनंदपुर साहिब में रखा है। सम्मानित होने वालों में मेरे जान-पहचान वाले हरिभजन सिंह और सूबा सिंह भी थे। हम भी वहां पहुंचे गए। उस समय आम लोग आनंदपुर को सिर्फ नंदपुर कहते थे। वहां सिख शान-ओ-शौकत का सैलाब आया हुआ था। निहंग सिंहों घोड़े, तलवारें और भाले, तम्बुओं के पास भांग घोटने वाले बर्तन जिन्हें सिंह इस्तेमाल कर रहे थे। पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह मुख्यातिथि थे। उन्होंने सूबा सिंह के बारे में क्या कहा होगा और जवाब में सूबा सिंह ने ज़ैल सिंह पर क्या व्यंग्य कसा होगा, जानना कठिन नहीं।
उन दिनों मेरे मित्र खुशवंत अपनी नौकरी से सेवा-मुक्त होने के बाद लगातार कॉलम लिख रहे थे। मैं पंजाबी में उनके जैसा बनना चाहता था, लेकिन मुझे कॉलम-नवीस बनने के लिए किसी को विनती करना उचित नहीं लगता था। मैंने नमूने का कालम अपने हाथ से लिखकर चार समाचार-पत्रों पंजाबी ट्रिब्यून, अजीत, जग बानी और नवां ज़माना को भेज दिया। प्रत्येक फोटो कॉपी पर लिख दिया कि इस तारीख को या उसके बाद प्रकाशित होने के लिए है। कॉलम का नाम ‘निक सुक’ रखा। सभी समाचार-पत्र देखे, परन्तु किसी ने भी प्रकाशित नहीं किया और मैं मन को समझा कर सुख की नींद सो गया।
अगले दिन तीन टेलीफोन आए। पहला, दैनिक भास्कर के सर्वमीत का सवालिया फोन, ‘अजीत के लिए कॉलम लिखने लग गए हो?’। उसके बादए नवां ज़माना के जतिंदर पन्नू का, ‘हमारे लिए क्यों नहीं लिखते?’ फिर दिल्ली से ‘अक्स’ के अमरजीत सिंह का, यह बताने के लिए कि उन्हें मेरी लिखित पसंद आई। दोपहर बाद ‘अजीत’ से फोन आया ‘भाअ जी’ का। यह बताने के लिए कि कॉलम प्रकाशित होने में एक दिन की देरी इसलिए हो गई है, क्योंकि उन्हें मेरी तस्वीर नहीं मिल रही थी। बरजिन्दर सिंह की शब्दों में स्नेह था, एक घोषणा भी कि अगर मैं लगातार लिख सकूं तो वे मेरी रचना हर हफ्ते प्रकाशित करना चाहेंगे। उन्हें मेरा दिया हुआ नाम  ‘निक-सुक’ भी पसंद आया था।  दिल्ली लौटा तो ‘कौमी एकता’ के सम्पादक का फोन आया कि मैं होला मोहल्ला समारोह के बारे में उनके समाचार-पत्र के लिए कुछ लिखूं। कौमी एकता बिकने तथा पढ़ा जाने वाला समाचार-पत्र था। उसका सम्पादक खुद मुझसे विनती कर रहा था। मैंने कलम और कागज़ उठाया और ऊपर लिखी बातों में मिर्च-मसाला लगा कर एक रिपोर्ट लिख दी। मैंने इस बार के नंदपुर दौरे की बचपन के नंदपुर दौरे से तुलना की। कैसे मैं अपने पिता के साथ साइकिल पर आगे या पीछे बैठता और नूरपुर बेदी में विश्राम करके शिवालिक पहाड़ियों की रौशनी का आनंद  लेता नंदपुर पहुंच कर किसी न किसी दीवान वाले तम्बू के नीचे बिछी पराली का बिस्तर बना कर सो जाता था। मेरे पिता पास बैठे कवियों की कविशरी सुनते रहते।
रिपोर्ट पढ़ कर सम्पादक ने अपने चपरासी को मेरे घर भेजा। रिपोर्ट के साथ प्रकाशित करने के लिए मेरी तस्वीर चाहिए थी। मेरी एड़ी ज़मीन पर नहीं लगी, मैंने अपनी जवानी की तस्वीर ढूंढी और उसे एक लिफफे में डालकर चपरासी को दे दी। रिपोर्ट छप गई और ऊंची-नीची बातें का बहुत मूल्य पड़ा। तारीफ के खत और टैलीफोन आए।
लगभग एक महीने बाद मुझे पता चला कि एक मनीऑर्डर वाला मुझे ढूंढ रहा है। मैं डाकघर गया तो मेरे लिए ‘कौमी एकता’ वालों ने 35 रुपये भेजे थे। पंजाबी अख़बार की ओर से लेखक को पैसे और चर्चा अधिक। समाचार-पत्र में प्रकाशित तस्वीर उससे भी ऊपर। मेरी रिपोर्ट से खुश होकर सम्पादक ने लगातार कॉलम लिखने को कहा तो मुझे पत्रकारिता चुटकियां काटने लगी, लेकिन मेरे हाथ कहानियों की हथकड़ियों में जकड़े हुए थे। क्या करता?
आज मेरा कॉलम ‘निक सुक’ फिकर तौंसवी के ‘प्याज के छिलके’ और खुशवंत सिंह के ‘न कहूं से दोस्ती न कहूं से वैर’ की तरह खूब पढ़ा जाता है। मुझे यह बताने में कोई झिझक नहीं है कि मेरे कॉलम ने मेरे घर बाबा बंदा सिंह बहादुर के नाम स्थापित अंतर्राष्ट्रीय फाऊंडेशन लुधियाना के अध्यक्ष कृष्ण कुमार बावा तथा उनके सहयोगी कांग्रेस नेता एवं प्रसिद्ध कारोबारी गुरदेव सिंह लापरां तथा प्रसिद्ध समाज सेवक व रामगढ़िया समुदाय के गुरनाम सिंह कलेर ने पूर्व मंत्री मलकीत सिंह दाखा के ज़रिये मेरे लिए बाबा बंदा सिंह के बारे में पुस्तकों का सैट, सिरोपा तथा हज़ूर सहिब (नांदेड़) का प्रसाद पहुंचाया, जिसे प्राप्त करते समय मैंने बाबा बंदा सिंह बहादुर की दृढ़ता के कई किस्से साझा किए। 
उनकी संगति में मुझे पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी में कवि गुरभजन सिंह गिल और मित्रों के मित्र स्वर्गीय जगदेव सिंह जस्सोवाल की संगति में व्यतीत किए दो वर्ष याद करवा दिए। मेरी कॉलम-नवीसी के लिए इससे बड़ी उड़ान और क्या हो सकती थी? मेरे लिए ये पल श्री गुरु गोबिंद सिंह जी और बाबा बंदा सिंह बहादुर का आशीर्वाद लेने के ही नहीं, बल्कि आनंदपुर साहिब और हज़ूर साहिब की महिमा का आनंद लेने का भी था आमीन

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