एक मूर्ति.. हज़ारों हाथों से विदाई

विघ्न विनाशक गणपति की विदाई का दृश्य अपने आपमें भारतीय संस्कृति का एक अनूठा दृश्य है। सिर पर पगड़ी बांधे बुजुर्ग, हाथों में मोबाइल लिए युवा और रंग-बिरंगे कपड़ों में सजी महिलाएं, कंधों पर गणपति की प्रतिमा उठाये बच्चे तथा ढोल की थाप पर थिरकते अलग-अलग उम्र के लोग- सब एक ही स्वर में पुकारते हैं, ‘गणपति बप्पा मोरेया’। कुछ घंटे पहले तक जो प्रतिमा किसी घर, गली या मोहल्ले के एक मंडप की केंद्र बिंदू थी, विसर्जन के समय वह हजारों लोगों की साझी आस्था और भावनाओं का केंद्र बन जाती है। यही गणेश विसर्जन की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषता है। एक मूर्ति, लेकिन उसे विदा करने के लिए हजारों हाथ।
गणेशोत्सव धार्मिक पूजा से ज्यादा सामूहिकता और साझेदारी का उत्सव है। गणेशोत्सव की खूबसूरती केवल प्रतिमा की स्थापना और पूजा में नहीं बल्कि उसके आसपास निर्मित होने वाली सामुदायिक दुनिया में है। मोहल्ले में मंडप लगाना, मिलकर सजावट करना, सामूहिक रूप से प्रसाद तैयार करना और फिर मिलकर आरती में शामिल होना, वास्तव में गणेश स्थापना से लेकर गणेश विसर्जन तक एक लंबा सांस्कृतिक उल्लास लोगों के बीच छाया रहता है। यह उल्लास विसर्जन के समय चरम पर पहुंचकर भावुक विदाई में बदल जाता है। अगर गणेश विसर्जन को ध्यान से देखें तो लगता ही नहीं कि यह किसी मूर्ति का विसर्जन है। ऐसे लगता है जैसे अपने किसी अत्यंत प्रिय से हम बिछड़ रहे हों। 
विसर्जन के समय सामूहिकता का सौंदर्य देखने लायक होता है। कोई प्रतिमा उठाता है, कोई रास्ता साफ करता है, कोई पानी बांटता है, कोई ढोल बजाता है, कोई फूल बरसाता है, कोई पीछे चल रहे बच्चों का ध्यान रखता है, यह समूचा उल्लास सामूहिकता का उत्सव होता है। इस अर्थ में गणेश विसर्जन भारतीय समाज की उस पुरानी परम्परा को जीवित करता है, जिसमें उत्सव केवल देखने की चीज नहीं है, मिलकर जीने की चीज होता है। सामान्य दिनों में भले भारतीय समाज की सामजिक संरचना में जाति, वर्ग, पेशा और आर्थिक स्थिति की अनेक दूरियां साफ तौर पर दिखायी पड़ती हों, लेकिन लोकपर्वों जैसे होली और गणपति पूजा के पर्व में यह कहीं नहीं दिखती।
किसी हाथ में आरती की थाली होती है, तो कोई रस्सी पकड़कर प्रतिमा के साथ चल रहा होता है, कोई ढोल बजा रहा होता है और कोई नृत्य कर रहा होता है। यहां व्यक्ति की सामाजिक पहचान से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी साझी भागीदारी बन जाती है। यही वजह है कि गणेशोत्सव सिर्फ पूजा का पर्व नहीं बल्कि सामाजिक मेल-जोल का सार्वजनिक उत्सव होता है। गणेश विसर्जन की एक और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विशेषता यह है कि इसमें पीढ़ियों का अंतर मिट जाता है। गणेश विसर्जन कई पीढ़ियों को एक साथ जोड़ देता है। बुजुर्गों के पास परम्परा की स्मृतियां होती हैं, युवाओं के पास ऊर्जा और आयोजन की ज़िम्मेदारी संभालने का भाव होता है। क्योंकि बच्चे पूरे उत्सव में उत्सुकता और विस्मय के साथ भागीदार रहते हैं। एक बुजुर्ग जब बच्चे को समझाता है कि गणपति की स्थापना क्यों की जाती है और विसर्जन का अर्थ क्या है, तो यह सिर्फ एक धार्मिक जानकारी नहीं होती। यह उस सांस्कृतिक स्मृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का जरिया होती है, जो ऐसी ही परंपराओं से मिलती है।
इस तरह हर साल होने वाला विसर्जन परंपरा की पुनरावृत्ति के साथ-साथ उसके हस्तांतरण का भी अवसर बन जाती है। वास्तव में गणपति विसर्जन का सबसे भावुक क्षण वो होता है, जब भक्त प्रतिमा को विदा करते हैं, लेकिन इस विदाई में स्थायी वियोग का भाव नहीं होता। क्योंकि विदाई के दौरान जो जयकारा लगता है, उसमें विदाई के साथ-साथ वापसी का निवेदन कहीं ज्यादा मुखर होता है, ‘गणपति बप्पा मोरेया, अगले बरस तू जल्दी आ।’ यह जयघोष भारतीय संस्कृति के एक गहरे जीवनदर्शन को व्यक्त करता है। यहां विदाई के साथ पुनर्मिलन का विश्वास मौजूद होता है। इसलिए विसर्जन का दुख अगले आगमन की प्रतीक्षा के एहसास में कम हो जाता है। मिट्टी की प्रतिमा का पानी में विलीन होना भी इसी भाव को विस्तार देता है, जिस मिट्टी से आकृति बनी, वह फिर प्रकृति में लौट जाती है। प्रतीकात्मक रूप में यह प्रक्रिया यह बताती है कि रूप बदलता है, लेकिन संबंध और स्मृति बने रहते हैं।
गणेश विसर्जन केवल धार्मिक जुलूस नहीं होता। ढोल-ताशे, लोकगीत, नृत्य, पारंपरिक वाद्य और सामूहिक जयघोष यह सब मिलकर एक जीवंत लोकसंस्कृति गढ़ते हैं। महाराष्ट्र में विशेषकर ढोल और ताशा तथा विसर्जन यात्रा का हिस्सा होते हैं। उनकी यह सामूहिक लय केवल संगीत नहीं पैदा करती बल्कि साथ चल रही भीड़ को भी एक रिद्म, एक साझी ताल देती है। हजारों कदम जब एक ही ताल पर उठते हैं और एक ही ताल पर जमीन में गिरते हैं, तो व्यक्ति भीड़ का एक हिस्सा भर नहीं रहता बल्कि सामूहिक अनुभव का सहभागी बन जाता है। गणेश विसर्जन में यही सांस्कृतिक अनुभव हर कोई महसूस करता है। 
गणेश विसर्जन का यह दृश्य एक ज़रूरी सामाजिक संदेश भी देता है कि प्रतिमा चाहे भले किसी एक परिवार ने स्थापित की हो या किसी सार्वजनिक मंडल ने, पर उसकी विदाई सामूहिक होती है। सिर्फ वो लोग ही उसमें शामिल नहीं होते, जो उसके साथ चलते हैं बल्कि यह विसर्जन यात्रा जहां-जहां से गुजरती है, वहां-वहां के लोग इसके हिस्से हो जाते हैं। फिर भले चाहे वो कुछ कदम चलकर इससे अलग हो जाएं, मगर विसर्जन जुलूस जहां से गुजरता है, वह अजनबी भीड़ के रूप में नहीं गुजरता बल्कि हर जगह मौजूद लोग इसमें शामिल हो जाते हैं। इसलिए विसर्जन वास्तव में प्रतिमा को महज पानी में प्रवाहित करने की प्रक्रिया नहीं है, यह साझी आस्था, साझी जिम्मेदारी और साझी भावनाओं का सामूहिक और सांस्कृतिक प्रदर्शन है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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