समय-समय की बात

ठनाठन पहलवानों के अखाड़े के मालिक झुनझुनामल अपने बदन पर तेल की मालिश चमकाकर दस-बारह पहलवानों को पहलवानी के दांव-पेंच सिखला रहे थे। साथ में उन्हें चुनाव में खड़े प्रत्याशी की किस प्रकार मदद करनी है, के सारे भेद समझा रहे थे। हमने उनके अखाड़े में प्रवेश किया तो उन्होंने मेरे नमस्कार के उत्तर में मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। उन्होंने मुझे कोई तगड़ा ग्राहक समझा।  झुनझुनामल का अखाड़ा पिछले अनेक वर्षों से नये-नये पहलवान पैदा कर रहा है। इस अखाड़े के पहलवान अपने दम-खम के लिए मशहूर हैं। 
एक पहलवान के क्या दाम हैं?- मैंने पूछा। 
उन्होंने उल्टा सवाल किया कि मुझे विधानसभा चुनाव के लिए कुछ चाहिए या लोकसभा चुनाव के लिए! मैंने कहा कि क्या दोनों के लिए अलग-अलग दाम हैं। 
झुनझुनामल ने कहा कि जब दर्जे की बात आती है तो दाम भी उसी के मुताबिक कम-ज्यादा होते हैं। विधानसभा के चुनाव में जीत हासिल करने वाला प्रत्याशी अगर बाद में कुछ करोड़ों में खेल पाता है तो लोकसभा का चुनाव जीतने वाला सैंकड़ों करोड़ों में खेल सकता है। आजकल तो सरकारी कार्यालयों का आडिट करने वाली पार्टी भी उस विभाग के बजट के अनुसार अपनी कमीशन तय करती है। वो कहते हैं कि पइसा बोलता है। हमारी बोली भी उसी मुताबिक होती है। फिर हमारे यहां के पहलवानों की भी कॉल-गर्ल्स की तरह कैटीगरिस हैं। जिस पहलवान का जितना अच्छा व्यक्तित्व होगा, उसके दाम भी उतने ही ज्यादा होंगे। माल और सप्लाई का सन्तुलन भी रेट-फिक्स करने में अपना रोल अदा करता है। रिस्क-फैक्टर भी काम करता है। अगर किसी सैंसटिव क्षेत्र के लिए पहलवान चाहिए तो उसका दाम कुछ अधिक होगा ही। आखिर जान जोखिम में डालनी पड़ती है। 
झुनझुनामल ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा-भाई साहिब अब क्या बतलायें पहलवानों की उतनी कद्र नहीं रही जितनी किसी ज़माने में हुआ करती थी। अब तो आम दिनों में एक पहलवान के पास अपने लिए पर्याप्त खुराक तक का बन्दोबस्त नहीं हो पाता। शादी-ब्याह के सीजन में जैसे बैंडवालों, घोड़ी वालों और टैंट आदि वालों की बन पड़ती है, ऐसे में चुनाव के दिनों में हमारी भी कुछ बन पाती है। वैसे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों का धर्म-ईमान तो रहा नहीं। कुछ प्रत्याशी हमारे पहलवानों को लालच देते हैं कि चुनाव जीतने के पश्चात् उन्हें अच्छी नौकरी पर लगवा देंगे लेकिन चुनाव जीतने के पश्चात् अपने वायदे से मुकर जाते हैं। ऐसे हिपोक्रेटस जनता का क्या भला कर पायेंगे, आप भली-भांति समझ सकते हैं। चुनाव लड़ने से पूर्व बड़े-बड़े वायदे लोगों से करते हैं। जनता की सेवा के लिए हमेशा तैयार रहने की घोषणा करते हैं, लेकिन चुनाव जीत जाने के पश्चात ईद का चांद हो जाते हैं। आम जनता की समस्याओं को सुलझाने की जगह अपना विकास प्रारम्भ कर देते हैं।
कुछ मंत्रियों को भी आप पहलवानों की सेवाएं उपलब्ध करवाते हैं। -मैंने उनके भाषण पर लगाम देने की गज़र् से कहा।
विधायकों और मंत्रियों को लठैतों की ज़रूरत रहती है क्योंकि मसल-पॉवर का ज़माना है। हमारे पहलवान इस काम के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। स्टेट्स-सिम्बल के रूप में भी पहलवान रखना उनकी अनिवार्यता है। -झुनझुनामल ने समझाया। साथ ही उन्होंने पुन: मुझ से सवाल किया कि मुझे कितने और किस प्रयोजन के लिए पहलवान चाहिये। 
मुझे? -मैंने अचकाते हुए कहा, -मैं कोई चुनाव-वुनाव नहीं लड़ रहा, मैं तो बस यूंही अपनी जानकारी के लिए बात कर रहा था।
न जाने कहां से चले आते हैं मुंह उठाये धंधे के समय टैम खराब करने। -झुनझुनामल ने मेरी तरफ हिमाकत से देखते हुए कहा और अपने बदन पर तेल-मालिश में पुन: जुट गये।
मैंने भगवान् का लाख-लाख धन्यवाद किया कि मैं पहलवान के हाथों पिटने से बच गया!

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