दया का इनाम
एक गांव में अरूण नाम का नेत्रहीन बालक रहता था। वह सबका दुलारा था पर उसके पिता उसे प्यार नहीं करते थे। उन्हें लगता, अंधा बेटा किस काम आएगा। अरूण को यह बुरा लगता। उसके दुख को उसका कुत्ता मोती ही समझता था। वह हरदम उसके साथ रहता।
एक दिन अरूण को उसके पिता ने डांटा। वह रोता हुआ घर छोड़ कर चला गया। साथ में मोती भी था। किसी तरह लोगों से खाना मांग कर वह अपना गुजारा चलाने लगा। इसी तरह वह बहुत दूर निकल गया।
कई साल बीत गए। एक दिन वह घूमते-घूमते एक मंदिर में पहुंचा। वहीं सो गया। रात को सपने में एक परी बोली, ‘तुम चाहो तो देख सकते हो। पर इसके लिए तुम्हें अच्छे काम करने होंगे।’
अरूण को सपने पर विश्वास नहीं हुआ। सुबह होते ही वह भीख मांगने निकल पड़ा। उसे काफी पैसे मिले। रास्ते में उसे दूसरे भिखारी के कराहने की आवाज सुनाई दी, ‘कोई इस बूढ़े पर रहम करो। मैं न देख सकता हूं, न चल सकता हूं। कोई तो खाने को दो।’
अरूण ने अपनी भीख उसे दी। कहा, ‘आपको इसकी ज्यादा ज़रुरत है।’ इतना कहते ही चमत्कार हुआ। उसे कुछ-कुछ दिखाई देने लगा। वह खुशी से चिल्ला उठा।
अब अरूण लोगों की सहायता करने लगा। उसकी आंखें भी ठीक होने लगीं। एक दिन वह घूमते-घूमते नदी किनारे जा पहुंचा। तभी उसे आवाज सुनाई दी, ‘बचाओ, बचाओ।’
उसके कहने पर मोती नदी में कूद पड़ा। किसी तरह डूबने वाले को खींच कर किनारे पर ले आया। अपनी धुंधलाती आंखों से अरूण ने उस आदमी को देखा। वह एक बूढ़ा था।
‘आप ठीक तो हैं। मेरा कुत्ता मोती कहां है?’ अरूण ने अधीरता से पूछा।
‘तुम्हारे कुत्ते ने मुझे तो बचा लिया पर मैं उसे नहीं बचा पाया।’ बूढ़े ने कहा।
‘हाय मेरा मोती। अब मुझ अंधे का कौन सहारा होगा?’ कहते हुए अरूण रोने लगा।
उसकी बात सुन, बूढ़ा चौंक उठा। उसने पूछा, ‘क्या तुम्हारा नाम अरूण है?’
‘हां, क्यों?’अरूण ने आश्चर्य से पूछा।
‘बेटे, मैं ही तुम्हारा बदनसीब बाप हूं। मेरी डांट सुन, तुम मुझे छोड़ कर चले गए थे। मैंने तुम्हें कहां-कहां नहीं ढूंढ़ा।’ कहते हुए बूढ़े ने अरूण को गले लगाना चाहा तो वह नदी की तरफ भागा और कूद पड़ा। बोला, ‘मैं अपने मोती के बिना नहीं रह सकता।
उसी समय न जाने कहां से मोती आ गया। दोनों डूबने लगे। लोगों ने देखा तो कुछ लोग नदी में कूद पड़े। दोनों को बचा लिया। अरूण के पिता ने उसे गले लगा लिया। पिता का प्यार पा कर अरूण खुशी से फूला न समाया।
(उर्वशी)



