कहानी-बूट पालिश

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)

मेरे मन में बस यही था कि राघव जी की अनुपस्थिति में उनके ग्राहक को निराश नहीं होना चाहिए। 
जूते पर पॉलिश करते-करते मैंने आवश्यकता से कुछ अधिक क्रीम लगा दी और जूते को खूब चमका दिया। राघव जी के आने तक मैं चालीस रुपये का काम कर चुका था। ग्राहक पैसे देकर चला गया और मैंने वे पैसे वहीं, जहां राघव जी बैठते थे, रख दिए।
उस समय दुकान पर मेरे अलावा कोई नहीं था।
कुछ ही देर बाद राघव जी आते हुए दिखाई दिए। मैंने मुस्कुराते हुए कहा- ‘आप जब से गए थे, तब से मैंने आपके चालीस रुपये का काम कर दिया है।’
राघव जी दुकान पर आते ही बोले- ‘ये आपने क्या किया, साहब? बाबूजी, आप तो ऑफिसर आदमी हैं!’
मैंने सहज भाव से पूछा- ‘’तो क्या हुआ?’
वे बोले- ‘आपको यह सब नहीं करना चाहिए था।’
उनके चेहरे पर शर्मिंदगी साफ दिखाई दे रही थी।
मैंने कहा- ‘अरे भाई, आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं? मुझे काम की जानकारी थी और आप यहां थे नहीं, इसलिए मैंने कर दिया। देखिए भाई, काम कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। अगर मुझे काम समझ में नहीं आता तो मैं ग्राहक को साफ बता देता।’
मेरी बात सुनकर राघव जी निरुत्तर हो गए।
बैठक पर रखे पैसे उन्होंने उठाकर पैसे वाले डिब्बे में डाल दिए और फिर अपनी जगह पर बैठकर पुन: दुकानदार की भूमिका में आ गए।
उस दिन के बाद उनकी नज़रों में मेरा कद शायद कुछ और बढ़ गया था।
लेकिन मैं पहले की तरह ही सहज और तटस्थ बना रहा। मैं उनके भावनाओं को कतई आहत नहीं करना चाहता था।
इसी तरह करीब दो महीने का समय बीत गया।
नए साल पर मैं अपने कुछ मित्रों के साथ पिकनिक मनाने गया हुआ था। तभी पीछे से एक सज्जन ने आकर मेरी पीठ थपथपाई। अभिवादन के बाद उन्होंने कहा- ‘आज तो दुकान बंद होगी!’
मैं उन्हें देखकर समझ नहीं पाया। मैंने पूछा- ‘मैं समझा नहीं।’
वे बोले- ‘आप भूल गए क्या?’
मैं अभी कुछ कह पाता, उससे पहले ही वे बोले- ‘जहां काम अच्छा होता है, उसे भूलना मेरे लिए संभव नहीं है। आपने मेरे जूतों पर जो पॉलिश की थी, क्या गजब की थी! वाकई आपका काम लाजवाब है। गजब की पॉलिश मारते हैं भाई! लगता है आपको काम का बहुत बढ़िया एक्सपीरियंस है।’
वे बोले ही जा रहे थे- ‘आपने मेरे जूतों को इस कदर चमका दिया था कि महीने भर तक पॉलिश करवाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अभी एक सभा में आमंत्रित था, तो वहां जाने के लिए फिर से पॉलिश करवानी पड़ी। अब तो जब भी आपके उधर आऊंगा, जूतों पर पॉलिश ज़रूर करवाऊंगा।’
अब तक मेरे जेहन में तैर रही उस धुंधली तस्वीर पर से पर्दा हट चुका था।
अरे! यह तो वही सज्जन थे, जिनके जूतों पर मैंने राघव जी की अनुपस्थिति में पॉलिश की थी।
उस दिन मैंने उनके जूतों पर आवश्यकता से अधिक क्रीम लगाकर उन्हें खूब चमकाने की कोशिश की थी, ताकि ग्राहक को राघव जी के काम की गुणवत्ता में कोई कमी महसूस न हो।
उस क्षण मुझे अपने ऊपर गर्व महसूस हुआ।
मैंने राघव जी के काम की गुणवत्ता को बरकरार रखा था, ताकि उनका ग्राहक उनसे जुड़ा रहे और उनकी दुकान पर ग्राहकों की आवाजाही बनी रहे।
इसके बाद मैं अपने मित्रों के बीच पिकनिक में व्यस्त हो गया। दो-तीन दिनों तक मैं शहर से बाहर रहा। इसलिए राघव आहिरे से मिलना नहीं हो पाया।
शहर लौटने के बाद जब उनसे मिला तो मैंने पिकनिक वाली पूरी घटना उन्हें सुनाई। उनके काम की तारीफ और ग्राहक के अनुभव के बारे में बताया तो राघव जी बहुत खुश हुए।
उनके चेहरे की खुशी देखकर मैं भी गर्व से तन गया।
क्योंकि उस दिन मुझे महसूस हुआ कि मैंने सिर्फ किसी के जूते पर पॉलिश नहीं की थी, बल्कि किसी मेहनतकश इंसान के काम की अस्मिता, उसकी प्रतिष्ठा और उसके आत्मसम्मान को बनाए रखने में अपना छोटा-सा फर्ज निभाया था।
सच ही तो है- काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। बड़ा होता है तो सिर्फ इंसान का नजरिया।
 (समाप्त)

-लिली आर्केड फ्लैट नं.101
मेट्रो जोन बस स्टैंड महाजन हास्पिटल समोर
नाशिक-422009, (महाराष्ट्र)
मो.8329680650

#कहानी-बूट पालिश