सिकुड़ गया ब्रिटिश साम्राज्य

ब्रिटेन एक बहुत बड़ा द्वीप है, जिसमें इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी ऑयरलैंड राज्य आते हैं। इसका क्षेत्रफल लगभग अढ़ाई लाख किलोमीटर है। यह बेहद आश्चर्यजनक बात ही कही जा सकती है कि ब्रिटेन ने कुछ सदियों पहले विश्व के एक बड़े भाग पर शासन किया था। उस समय अक्सर यह भी कहा जाता था कि अंग्रेज़ों के शासन में सूर्य नहीं छुपता। भारत सहित एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर देश इसके गुलाम थे। इस समय के दौरान न सिर्फ इसने अपने अधीन इन कालोनियों को बुरी तरह लूटा, अपितु इन कालोनियों की अधिकतर पूंजी भी इसने अपने देश में इकट्ठी कर ली थी। धीरे-धीरे प्रत्येक ओर आज़ादी की चिंगारियां उठने लगीं, जो ज्वाला के रूप में बदल गईं। ब्रिटेन को विभिन्न विवशताओं के कारण इन देशों को स्वतंत्र करना पड़ा। 20वीं सदी में दो बड़े युद्धों ने ब्रिटेन की ताकत को धीरे-धीरे कम कर दिया। यह भी समय का एक मज़ाक ही कहा जा सकता है कि, जिस देश में सदियों पहले लोकतंत्र की रौशनी पैदा हुई थी, उस देश ने ही दर्जनों देशों को अपना गुलाम बनाए रखा था।
भारत में भी ब्रिटेन ने लगभग 200 वर्ष शासन किया था। यदि आज भारत का मानचित्र बदला है तो यह ब्रिटिश शासन की नीयत का ही परिणाम था। 1947 से पहले पाकिस्तान और बांग्लादेश का अस्तित्व नहीं था। यह भारत का ही भाग थे। देश के विभाजन के समय भी यदि लाखों लोग मारे गये, और लाखों परिवार उजाड़े का शिकार हुए तो इसके लिए भी बड़ा दोष ब्रिटेन को ही दिया जाता है। यह भी समय की मार ही कही जा सकती है कि आज कुछ छोट-छोटे द्वीपों को छोड़ कर पूरा ब्रिटेन जिसे ‘ग्रेट ब्रिटेन’ कहा जाता है, सिर्फ अढ़ाई लाख किलोमीटर तक ही सीमित होकर रह गया है, जिसमें उपरोक्त 4 राज्य ही शामिल हैं, परन्तु विगत लम्बी अवधि से ब्रिटेन बेहद बुरे दौर में से गुज़र रहा है। इसकी आर्थिकता डावांडोल हो चुकी है। इसका राजनीतिक भविष्य अनिश्चित बनता दिखाई दे रहा है। इस बात का यहीं से अनुमान लगाया जा सकता है कि विगत 10 वर्षों में यहां 7 प्रधानमंत्री बने और बदले जा चुके हैं। यहां दो कंज़र्वेटिव और लेबर पार्टियों का ही दबदबा रहा है। कंज़र्वेटिव पार्टी लम्बी अवधि से शासन ज़रूर करती रही है, परन्तु इस समय के दौरान इस देश को दरपेश कठिनाइयां बढ़ती ही रही थीं। इसलिए वर्ष 2024 में हुए आम चुनाव में कंज़र्वेटिव पार्टी की हार हुई और लेबर पार्टी के नेता स्टार्मर प्रधानमंत्री बने थे, परन्तु वह भी 2 वर्ष तक का ही समय पूर्ण कर सके। अंतत: अब लेबर पार्टी के बर्नहम को प्रधानमंत्री बनाया गया है। सभी यत्नों के बावजूद भी यहां कीमतों में लगातार वृद्धि होती रही है। जन-पक्षीय योजनाएं कम होती गई हैं और समूचे रूप में देश में गड़बड़ वाली स्थिति बनती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी  में वृद्धि की ही रही है।
इसी समय में अब स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी ऑयरलैंड द्वारा इंग्लैंड से अलग होने की लहरों ने ज़ोर पकड़ लिया है। स्कॉटलैंड जॉन सिवनी के नेतृत्व में स्वतंत्र देश बनना चाहता है और यूरोपीयन यूनियन का सदस्य भी बनना चाहता है। इसका कारण देश में अर्थ-व्यवस्था का डावांडोल होना, टैक्सों का बढ़ना और ऊर्जा के स्रोतों की कमी को माना जा रहा है। स्कॉटलैंड में तेल और गैस के भंडार हैं। इसी तरह वेल्स भी स्वतंत्रता चाहता है। यहां के नेताओं और लोगों को शिकायत है कि ब्रिटेन की ओर से उन्हें उचित फंड नहीं मिल रहे। वेल्स के प्राकृतिक स्रोतों पर उनका नियंत्रण नहीं है। उत्तरी ऑयरलैंड विगत लम्बी अवधि से अलग पड़ोसी देश ऑयरलैंड गणराज्य के साथ मिलना चाहता है। 1998 में यहां रिफरैंडम हुआ, जिसमें उत्तरी ऑयरलैंड के लोगों ने ऑयरलैंड गणराज्य के साथ एकजुट होने को प्राथमिकता दी थी। 300 वर्ष के बाद आज ब्रिटेन टूटने के कगार पर खड़ा है। यदि ऐसा होता है तो ब्रिटेन अपना 46 प्रतिशत क्षेत्रफल गंवा लेगा। लगभग एक करोड़ लोग इससे अलग हो जाएंगे और इसकी अर्थ-व्यवस्था पर 13 प्रतिशत से अधिक प्रभाव पड़ेगा और उत्तरी सागर के तेल-गैस भंडारों का भी विभाजन होगा।
इस बड़े द्वीप के चार देश बनने से ब्रिटेन निश्चय ही अपना अन्तर्राष्ट्रीय आभा गंवा लेगा। इसे प्रकृति की मार ही कहा जा सकता है, कि वह देश  जिसने कभी विश्व पर शासन किया हो, 4 छोटे-छोटे द्वीपों में बंट कर रह जाएगा। अपनी बन रही ऐसी स्थिति से वह पुन: कैसे उभर सकेगा, यह देखने वाली बात होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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