ज़िन्दगी बीत जाती है अदालती फैसले की तलाश में
हालांकि देश में कानून का शासन है, लेकिन यहां न्याय पाने में ज़िन्दगी बीत जाती है लेकिन न्याय नहीं मिलता है। कहा जाता है कि देर से मिलने वाला न्याय, न्याय न मिलने के समान है। लेकिन देश की अदालती प्रक्रिया इस तरह जटिल और दुरूह है कि लोग अदालतों के चक्कर लगाते जीवन के बहुमूल्य समय को बर्बाद कर देते हैं और जब अदालत से न्याय मिलता है तब बहुत देर हो चुकी होती है। आंकड़ों के अनुसार भारत की अदालतों में इस समय लगभग 5.86 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। ज़िला व निचली अदालतों में सबसे अधिक करीब 5.2 करोड़ मामले निचली अदालतों में लंबित हैं। उच्च न्यायालय उच्च न्यायालयों में लगभग 64.97 लाख मामले लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट में लगभग 95,000 मामले लंबित हैं। मुकद्दमों के लंबित होने के मुख्य कारण न्यायाधीशों की कमी होना भी है। देश में प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 21 जज हैं, जबकि विधि आयोग ने 50 जजों की सिफारिश की थी। सरकार खुद बड़ी वादी है। कुल लंबित मामलों में से लगभग 50 प्रतिशत मामलों में सरकार खुद एक पक्ष या वादी है। लगभग 20 प्रतिशत मामले जमीन और संपत्ति के विवादों से जुड़े हैं। प्रक्रियागत देरी भी एक बड़ी समस्या है। बार-बार तारीखें लेना, कागज़ी कार्रवाई में देरी और पुराने तौर-तरीके में कोई बदलाव नहीं आया है।
आज देश में पीड़ितों को न्याय के इंतजार में वर्षों लग रहे हैं और अदालतों में जारी ‘तारीख पर तारीख’ के गलत रवैये के चलते मुकद्दमों के लटकते चले जाने के कारण न्याय की प्रतीक्षा में ही लोगों की पूरी ज़िन्दगी बीत रही है। 4 फरवरी, 2026 को गुजरात हाई कोर्ट ने नवम्बर, 1996 से लटकते आ रहे 30 वर्ष पुराने एक मामले में एक पुलिस कांस्टेबल को एक ट्रक ड्राइवर से 20 रुपयों की रिश्वत लेने के आरोप में बाइज़्ज़त बरी कर दिया। फैसला आने के अगले ही दिन 5 फरवरी को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। 5 अप्रैल, 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने गवाहों के बयानों में भारी कमियों के दृष्टिगत संदेह का लाभ देते हुए 2 इंजीनियरों को 35 वर्ष पूर्व 20 सितम्बर, 1991 को उन पर लगे 1,800 रुपए रिश्वत मांगने के आरोपों से यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को साबित करने में नाकाम रहा है। 1 जुलाई, 2026 को लखनऊकी सीबीआई अदालत ने लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष की 8 अगस्त, 2002 को हत्या के लगभग 23 वर्ष बाद फैसला सुनाते हुए आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। सुनवाई के दौरान तीन अन्य आरोपी मर चुके हैं। 19 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1996 के 30 वर्ष पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए गुजरात सरकार के 2 कर्मचारियों (1 क्लर्क और 1 चपरासी) को बरी कर दिया क्योंकि उन पर अभियोग पक्ष अपना आरोप सिद्ध न कर सका। इन दोनों पर 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप था।
25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे हत्याकांड से जुड़े लगभग 45 वर्ष पुराने मामले में देश की न्यायिक प्रणाली की विफलता पर बेहद सख्त और चिंताजनक टिप्पणी की। निचली अदालत को इस मामले का ट्रायल पूरा करने में ही 22 वर्ष लग गए। अदालत ने गौर किया कि 6 आरोपियों में से 2 की मौत आरोप तय होने से पहले ही हो गई थी जबकि दोषी ठहराए गए 4 में से 3 आरोपियों की मौत हाई कोर्ट में ममला लम्बित रहने के दौरान हो गई थी। समय पर न्याय देने के लिए जहां देश की छोटी-बड़ी सभी अदालतों में जजों की कमी यथाशीघ्र दूर करने की आवश्यकता है, वहीं अदालतों में न्याय प्रक्रिया को चुस्त तथा और तेज़ करने की भी ज़रूरत है। यदि अदालतों में पर्याप्त संख्या में जज ही नहीं होंगे तो फिर भला लोगों को समय पर न्याय किस प्रकार मिल सकता है।
बिना किसी संदेह के भारतीय अदालतों में मामलों की भारी तादाद में लंबित मामले न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। आंकड़ों के अनुसार देश की अदालतों में लंबित मामलों में पिछले एक दशक में लगभग 80 प्रतिशत की भारी वृद्धि देखी गई है। अंतर-विभागीय विवादों और अनावश्यक अपीलों के कारण अदालतों पर बोझ लगातार बढ़ता जाता है। प्रक्रियात्मक कमियां और स्थगन अदालती प्रक्रियाओं में बार-बार मिलने वाली तारीखें, बार-बार की जाने वाली अपीलें और मुकद्दमों के प्रबंधन की कुशल प्रणाली न होना मामले को सालों-साल खींचता है। वैकल्पिक विवाद समाधान का कम उपयोग मध्यस्थता, सुलह और लोक अदालतों जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों का देश में अभी भी उतना प्रभावी और व्यापक उपयोग नहीं हो पा रहा है जितना होना चाहिए। (एजेंसी)

