आखिर किस पर पड़ेगा यूपीआई शुल्क का बोझ ?
यूपीआई भुगतान पहले मुफ्त था और अब इन पर शुल्क लगा दिया गया है। इससे महंगाई निश्चित रूप से बढ़ेगी, आम आदमी के लिए या फिर वह यूपीआई से भुगतान करना बंद या कम कर देगा। नेशनल पेमेंट्स कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने 15 सितम्बर, 2026 को 2,000 रुपये से ऊपर के यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने की घोषणा की, 300 रुपये की कुल सीमा और यूटिलिटी पेमेंट्स पर फ्लैट 5 रुपये के चार्ज के साथ। इसका अर्थ यह है कि एमडीआर 300 रुपये से अधिक नहीं लगाया जायेगा, 2,000 रुपये से ऊपर का भुगतान चाहे जितनी भी हो और फ्लैट 5 रुपये का चार्ज पेट्रोल व डीज़ल की खरीद, बीमा प्रीमियम, रेल टिकट, स्कूल और अन्य अनेक सरकारी सेवाओं पर लगाया जायेगा। 15 अक्तूबर, 2026 से लागू होने के बावजूद एमडीआर व्यक्ति-से-व्यक्ति को किये गये भुगतान पर नहीं लगेगा और ऑटो डेबिट पर भी कोई चार्ज नहीं लगेगा।
इसी तरह छोटे व्यापारियों, चाय की दुकानों, किराना स्टोर या मिल्क बूथों के लिए भी एमडीआर की छूट होगी, अगर व्यापारी के लिए मासिक रिसीप्ट 1 लाख रुपये से कम है। इसे आसान शब्दों में इस तरह से समझें कि अगर आपने अपने दोस्त को 2,00,000 रुपये बतौर यूपीआई ट्रांसफर किये हैं तो उस पर किसी प्रकार का कोई एमडीआर नहीं होगा, लेकिन अगर आपकी चाय की दुकान है और आपको 1,10,000 रुपये यूपीआई ट्रांसफर से आये तो आपको इस पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर देना होगा। ज़ाहिर है एक दुकानदार के रूप में यह अतिरिक्त पैसा आप अदा करना पसंद नहीं करेंगे। इस स्थिति में आपके पास मुख्यत: दो विकल्प होंगे— एक, आप यूपीआई ट्रांसफा को प्राथमिकता देना बंद या कम कर देंगे और ग्राहकों से नकद लेना चाहेंगे। दूसरा यह कि इस अतिरिक्त बोझ को दुकानदार अपने ग्राहकों पर डालने का प्रयास करेंगे यानी एक कप चाय जो 20 रुपये की बेचते हैं, उसे 21-22 रुपये में देने लगेंगे, महंगाई में वृद्धि करते हुए। यहां यह बताना भी आवश्यक है कि म्यूच्यूअल फंड्स या स्टॉक ब्रोकर्स को भुगतान पर एमडीआर 0.02 प्रतिशत निर्धारित किया गया है, 300 रुपये के कुल कैप के साथ।
वित्त मंत्रालय ने अपने वक्तव्य में कहा है, ‘बैंकों को यह सलाह दी गई है कि वह यह सुनिश्चित करें कि व्यापारी एमडीआर चार्ज ग्राहकों पर न थोपें। यूपीआई एप्लीकेशन प्रोवाइडर्स को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है कि वह प्लेटफार्म फीस या छुपे हुए चार्ज ग्राहकों पर न थोपें।’ इस वक्तव्य का अर्थ यह है कि शुल्क व्यापारियों को बर्दाश्त करना पड़ेगा, लेकिन क्या ऐसा संभव है? ई-कॉम प्लेटफार्म को 0.4 प्रतिशत फीस देनी होगी, 300 रुपये के कैप के साथ। चाहे आप स्मार्ट फोन खरीदें या सोफा सेट, प्लेटफार्म को 300 रुपये देने होंगे। कौन-सा ऑनलाइन प्लेटफार्म (या बड़े फुटकर व्यापारी या रेस्टोरेंट), हर बड़ी बिक्री पर 300 रुपये देना पसंद करेगा। व्यापारी इस फीस को अपने ग्राहकों की तरफ धकेल देंगे अपनी चीज़ों का दाम बढ़ा कर। दुकानदार यूपीआई से पैसा लेना पसंद नहीं करेंगे। ई-कॉम प्लेटफॉर्म्स हाई-वैल्यू सौदे में डिस्काउंट देना बंद कर देंगे या कीमत बढ़ा देंगे। छुरी खरबूजे (पढ़ें ग्राहक) पर गिरे या खरबूजा छुरी पर गिरे, हर हाल में कटेगा खरबूजा ही।
एनपीसीआई का कहना है कि 95 प्रतिशत से अधिक व्यापारियों का लेन-देन, जो 2,000 रुपये से कम है, पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यूपीआई एमडीआर को सभी कार्ड-आधारित ट्रांसफर फीस से कम रखा गया है। स्टैण्डर्ड क्रेडिट कार्ड एमडीआर प्रति लेन-देन पर आमतौर से 1.5 प्रतिशत से 2.5 प्रतिशत के बीच रहता है, जबकि डेबिट कार्ड एमडीआर का कैप 0.9 प्रतिशत तक है। यूपीआई एमडीआर की बेसलाइन 2,000 रुपये से ऊपर के लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत करके और हाई-वैल्यू खरीदारी पर 300 रुपये का कैप लगाने से यूपीआई कमर्शियल एंटरप्राइज के लिए सबसे सस्ता डिजिटल भुगतान स्वीकृति टूल है। कीमत में इस अंतर से व्यापारियों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हुए कम खर्च करना पड़ेगा। यह सब एनपीसीआई का कहना है। वित्त मंत्रालय ने अपने वक्तव्य में कहा है कि एमडीआर सरकार या एनसीपीआई द्वारा एकत्र किया जाने वाला न तो टैक्स है और न ही चार्ज है। इसे पेमेंट इकोसिस्टम में हिस्सेदारों के बीच वितरित किया जाता है। दूसरी ओर भारत पे के सह-संस्थापक व शार्क टैंक इंडिया के पूर्व जज अशनीर ग्रोवर ने कहा है कि यूपीआई पर सरकार द्वारा एमडीआर वसूल करना सिर्फ एक टैक्स कलेक्शन है। अगर सरकार को इससे नुकसान हो रहा है तो एटीएम को पूरी तरह से बंद करके सिर्फ यूपीआई फोकस करना चाहिए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

