किशाऊ डैम प्रोजैक्ट से पंजाब को बाहर रखना न्यायसंगत नहीं

मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे,
यह मुतालबा है हक का कोई इल्तिज़ा नहीं है।
मुझे याद है कि शकील बदायूनी का यह शे’अर मैंने इन्हीं कालमों में 19 जून, 2026 को लगभग तीन माह पहले ‘अमित शाह जी कुछ सोचो, धक्का न करो’ के शीर्षक तले लिखे भाग में इस्तेमाल किया था। यह भाग ‘किशाऊ मल्टीपर्पज़ डैम प्रोजैक्ट’ के समझौते संबंधी भारत के गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में 6 राज्यों की बैठक के बारे में था। इसमें अमित शाह को इस समझौते में पंजाब के अधिकार देने के संबंध में कहा गया था। नि:संदेह इस अधिकार की मांग (मुतालबा) देश के गृह मंत्री से की गई थी और यह भी पता था कि शाह साहिब तथा भाजपा ने पंजाब के अधिकारों की बात को नहीं सुनना, परन्तु फिर भी तीन महीने पहले लिखने का वास्तविक उद्देश्य तो पंजाब के नेताओं तथा पार्टियों को सचेत करना था कि वे समय रहते पंजाब के साथ होने वाले एक सम्भावित अन्याय को जान-समझ लें और इसे रोकने के लिए कुछ करें, परन्तु अफसोस पंजाब की किसी भी पार्टी जिनमें सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी, पंजाब कांग्रेस तथा अकाली दल बादल सहित सभी अकाली दल चुप रहे। किसी ने पंजाब के हक के लिए कोई संघर्ष तो क्या करना था, मौखिक रूप से हाय का नारा भी नहीं लगाया। पंजाब भाजपा की मजबूरी तो समझ में आती है, परन्तु शेष दलों का भी चुप रहना चुभता है। वो भी उस समय जब पंजाब विधानसभा के चुनाव सिर पर हैं।
उल्लेखनीय है कि अब 15 सितम्बर, 2026 को ठीक तीन महीने बाद गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान तथा दिल्ली ने इस किशाऊ डैम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। पंजाब पूरी तरह बाहर है। वैसे पंजाब के साथ अन्याय की दास्तान नई नहीं है। पहले तो पूरे देश में भाषा के आधार पर राज्य बनाने का सिद्धांत स्वीकार किया गया, परन्तु पंजाबी भाषा आधारित राज्य बनाने से इन्कार कर दिया गया। अनेक कुर्बानियों से बने पंजाब राज्य में से कई पंजाबी क्षेत्र बाहर रखे गए। 60 वर्ष बीत जाने के बाद भी पंजाब को अस्थायी रूप में बनाई गई संयुक्त राजधानी आज तक नहीं मिली। पंजाब की हाईकोर्ट भी साझी ही है और पानी के मामले में विश्व के प्रत्येक कानून को एक तरफ रख कर पंजाब पुनर्गठन एक्ट में अद्भुत धाराएं 78, 79 तथा 80 शामिल करके धक्के से केन्द्र को सभी अधिकार दे दिए गए। इस मामले में 12 मई, 1994 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके अनुसार उस समय हरियाणा को 5.73 बिलियन क्यूबिक फुट (बीसीएम), उत्तर प्रदेश को 4.032 बीसीएम, राजस्थान को 1.119 बीसीएम तथा हिमाचल को .378 बीसीएम पानी देने का फैसला हुआ था। उस समय भी पंजाब को इससे बाहर रखा गया था। वर्तमान ‘किशाऊ प्रोजैक्ट’ इसी फ्रेमवर्क का हिस्सा है। इसके सहारे ही पंजाब को बाहर रखा गया है और राजस्थान जो यमुना बेसिन का मुख्य रिपेरियन राज्य नहीं, को भी शामिल किया गया है, अपितु सबसे बड़ा हिस्सेदार माना जा रहा है। पंजाब के लिए सरासर दोहरा मापदंड इस्तेमाल किया जा रहा है। ध्यान दें कि हरियाणा पंजाब से रावी, ब्यास का पानी इस आधार पर ले रहा है कि वह अविभाजित पंजाब का भाग था। हालांकि अब उसका बेसिन तथा रिपेरियन दोनों कानूनों के आधार पर इनके पानी पर उसका कोई अधिकार नहीं, परन्तु हैरानी का बात है कि  संयुक्त पंजाब के समय अम्बाला की जगाधरी तहसील ज़िला यमुनानगर से लेकर नीचे तक यमुना नदी जो अविभाजित पंजाब की पूर्वी सीमा के साथ बहती थी, पर पंजाब का कोई अधिकार नहीं। हालांकि पंजाब  पुनर्गठन एक्ट में धक्के से डाली गई धारा 78 में स्पष्ट लिखा है कि अविभाजित पंजाब की नदियों तथा नदी-घाट प्रोजैक्टों के अधिकार उत्तराधिकारी राज्यों को मिलेंगे। है न कमाल का इन्साफ कि हरियाणा तो उत्तराधिकारी राज्य के रूप में पंजाब से प्रत्येक अधिकार ले, परन्तु पंजाब को उत्तराधिकार में कोई अधिकार भी न दिया जाए। 
पाल सिंह ढिल्लों की 1983 में लिखी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘ए टेल ऑफ टू रिवज़र् : रीयल फैक्ट्स ऑफ रावी-ब्यास वाटर डिस्प्यूट’ में इस मुद्दे पर काफी चर्चा की गई है। वह विश्व में पानी के लिए इस्तेमाल किए जाते 8 सिद्धांतों की चर्चा करते हैं, जिनमें रिपेरियन, बेसिन, हौरमैन सिद्धांत, ऐब्सोल्यूट टैरिटोरियल सॉवरेनिटी का सिद्धांत, प्रत्येक राज्य को उचित जायज़ हिस्से का सिद्धांत, हैल्ंिसकी रूल्स, पहले इस्तेमाल शुरू करने वाले को प्राथमिकता का सिद्धांत तथा कम्यूनिटी ऑफ इन्ट्रेस्ट का सिद्धांत शामिल हैं, परन्तु वे भी रिपेरियन तथा उचित एवं जायज़ हिस्से को अधिक ठीक मानते हैं, परन्तु वैसे जिस बेसिन सिद्धांत पर पंजाब को बाहर रखा जा रहा है, उसके अनुसार भी पंजाब अविभाजित पंजाब का उत्तराधिकारी होने के नाते घग्गर-हाकड़ा बेसिन के लिहाज़ से भी इसका हिस्सेदार होना चाहिए। 
उल्लेखनीय है कि इस प्रोजैक्ट पर 15 हज़ार करोड़ रुपये खर्च होंगे, जिसमें से केन्द्र ने 13,500 करोड़ रुपये खर्च करने हैं, शेष सिर्फ 1500 करोड़ रुपये 5 राज्यों ने खर्च करने हैं और हिमाचल ने कुछ नहीं खर्च करना। पानी के अतिरिक्त यहां 660 मैगावाट बिजली भी पैदा होगी, परन्तु पंजाब को कुछ नहीं मिलेगा। हमें तो यह डर भी सता रहा है कि कहीं 2352 करोड़ रुपये की लागत से चिनाब का पानी चंद्रा नदी से ब्यास सुरंग में डालने के बाद इसमें से भी पंजाब को बाहर न कर दिया जाए। वैसे तो पंजाब की राजनीतिक पार्टियों ने बहुत देर कर दी है, परन्तु फिर भी अभी भी यासीन ज़मीर के शब्दों में पूछने का साहस कर रहा हूं :
़खुदारा, आ के मेरी लो ़खबर, कहां हो तुम?
मेरे हबीब, मेरे चारागर, कहां हो तुम?
जनहित याचिका के खुलासे
शरमा के मुंह ना फेर नज़र के सवाल पर,
लाती है ऐसे मोड़ पे किस्मत कभी-कभी।
-साहिर लुधियानवी
ग्रेटर मोहाली एरिया डिवेल्पमैंट अथॉरिटी (गमाडा) द्वारा 15 हज़ार करोड़ रुपये का कज़र् लेने के लिए गुजरात की फर्म टिपसन्ज़ कन्सलटैंसी को 191 करोड़ रुपये की मध्यस्थता फीस देने के मामले में पंजाब तथा हरियाणा हाईकोर्ट में चल रही एक जनहित याचिका में कुछ सवाल उभर कर सामने आए हैं। पहला कि गमाडा ने पहले भी बैंकों से सीधे कज़र् लिए हैं। अब 191 करोड़ रुपये की मध्यस्थता फीस क्यों देनी पड़ रही है? दूसरा, जिस प्रोजैक्ट के लिए कज़र् लेना है, उसके लिए पहले ही 2000 करोड़ रुपये से अधिक लिए जा चुके हैं, परन्तु काम तो शुरू नहीं हुआ। फिर 15 हज़ार करोड़ की और ज़रूरत क्यों है? तीसरा सवाल, अकाउंटैंट जनरल आडिट की रिपोर्ट है कि पंजाब सरकार को गमाडा ने 6400 करोड़ रुपये भेजे थे, परन्तु वह पंजाब के एकीकृत फंड में नहीं गए तो यह पैसा कहां खर्च किया गया? चौथा और सबसे बड़ा सवाल यह सामने आया है कि पंजाब सरकार ने गमाडा से पिछले वर्षों की 94 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक राशि खाद्य सुरक्षा के लिए बंजर भूमि को उपजाऊ में तबदील करने लिए मांगी है, परन्तु पंजाब में तो अब बंजर भूमि ही बहुत कम है। इस मामले में पंजाब तथा हरियाणा हाईकोर्ट ने मुख्य जज अश्विनी कुमार मिश्रा, जिनका पंजाब सरकार ने काफी तीव्र विरोध भी किया था और जस्टिस रोहित कपूर की पीठ ने इस राशि का पूरा-पूरा हिसाब तथा हल्फनामा दाखिल करने के लिए 28 सितम्बर की तिथि दी है। देखें, क्या जवाब मिलता है?
सवाल दर सवाल उठते जाएंगे,
जवाब दर जवाब देते जाइये।
—लाल फिरोज़पुरी
परम्परा जारी है : सिखों के लिए गर्व की बात
सिख कौम तेरी थावें जो कोई होर हुंदी,
सिखी दे चन्न दी सब दुनिया चकोर हुंदी।
कवि गुरदित्त सिंह कुंदन ने ये पंक्तियां चाहे किसी भी संदर्भ में लिखी हों, परन्तु सच यही है कि सिख कौम अपनी अच्छाइयों का प्रचार नहीं कर सकी। ़खैर, एक परम्परा जारी है कि मुश्किलों में फंसे इन्सानों की सेवा की जाए। यह परम्परा पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी के समय 20 रुपये के लंगर से शुरू हो गई थी। 1597 ईस्वी में अकबर के शासन में लाहौर में पड़े अकाल ने जब जनमानस को मौत के मुंह में डाल दिया, बीमरियों और भुखमरी का दौर चला तो साहिब श्री गुरु  अर्जन देव स्वयं लाहौर पहुंचे। लंगर शुरू किए, बेघरों के लिए इमारतों का निर्माण किया और पानी के लिए बाऊली बनवाई, दवा-दारू का प्रबंध किया। शुक्र है कि सिखों में मुश्किल में फंसे जनमानस की मदद का यह जज़्बा आज भी जारी है। अब जब अगस्त 2026 के अंत में नेपाल में भयावह बाढ़ और भूस्खलन की आपदाएं आईं तो हज़ारों लोग मारे गए, उससे कहीं अधिक घायल और बेसहारा भी हुए। नेपाल में कुल मिला कर सिर्फ लगभग 2000 सिख रहते हैं। 2011 के सरकारी आंकड़े 609 सिखों के हैं, परन्तु उन्होंने विदेशी सिखों की सहायता से जनमानस की पीड़ा को कम करने हेतु हर सम्भव यत्न किया है। स्थानीय सिखों में से एक प्रीतम सिंह ने कहा कि हम नेपाल में बहुत छोटा समुदाय हैं। साधन कम हैं, परन्तु जो भी कर सकते हैं, कर रहे हैं। न्यूज़ीलैंड के सिख समुदाय ने नेपाल के लिए 50 हज़ार अमरीकी डॉलर की मदद भेजी है जबकि मलेशिया की यूनाइटिड सिख्स ने एक टीम नेपाल भेजी, जिसने स्थानीय लोगों और सिखों के साथ मिल कर ऐसे क्षेत्रों में सहायता भेजी, जहां मदद पहुंच नहीं रही थी। यूनाइटिड सिख्स ने 98 ऐसे बच्चों की विशेष मदद की है, जिनके माता-पिता नहीं मिल रहे। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी तथा अन्य सिख संगठनों ने भी राहत सामग्री भेजी है। लंगर लगाए हैं। बेशक भारत सरकार ने बहुत व्यापक स्तर पर नेपाल की मदद की है, परन्तु सिखों द्वारा की गई यह मदद कौम के लिए गर्व की बात है। इस मदद गुरबाणी की यह तुक याद करवाती प्रतीत होती है :
घालि खाइि किछु हथहु देइि।।
नानक राहु पछाणहि सेइि ।। १।।
(सरंग म: 1, अंग : 1245) 
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000

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