जब परीक्षा ही जान लेने लग जाए
किसी देश के लिए सबसे भयावह समाचार सीमा पर हारी हुई जंग नहीं होता। सबसे भयावह समाचार वह होता है, जब देश के बच्चे जीवन से हारने लग जाएं। 10 वर्ष में एक लाख से ज़्यादा विद्यार्थियों द्वारा आत्म-हत्या करना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह वर्तमान का सबसे असहज कर देने वाला सवाल है। जब राज्यसभा में यह आंकड़ा गूंजा, तो राजनीतिक आरोप लगे, जवाब भी आए। लेकिन असली सवाल अभी भी वहीं पर खड़ा है। आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि जीवन संवारने का साधन होने वाली शिक्षा युवाओं के लिए जीवन से हार मानने का कारण बनती जा रही है? अगर किसी देश के युवाओं को किताबों से ज़्यादा डर, प्रतियोगिता से ज़्यादा निराशा और भविष्य से अधिक अनिश्चितता महसूस होने लगे तो यह सिर्फ शिक्षा का संकट नहीं है, यह समाज की अंतरात्मा का संकट बन जाता है। इस त्रासदी को किसी एक सरकार, एक परीक्षा या एक घटना तक सीमित करना आसान है, लेकिन इससे सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। सवाल बड़ा है। यह सवाल आज हमारी शिक्षा व्यवस्था, सरकारों और समाजय, तीनों के सामने खड़ा है।
जब मेहनत अनिश्चित बन जाए : हम हर आत्म-हत्या के बाद कोई न कोई कारण ढूंढ लेते हैं— परीक्षा का दबाव, पेपर लीक, बेरोज़गारी, परिवार की उम्मीदें या मानसिक तनाव आदि। लेकिन कोई भी युवा सिर्फ एक वजह से जीवन नहीं हारता, वह धीरे-धीरे टूटता है। हर रद्द हुई परीक्षा के साथ, हर लीक हुए पेपर के साथ, हर लटकी हुई भर्ती के साथ, हर उस दिन के साथ जब उसे लगने लगता है कि उसकी मेहनत का मूल्य अब उसके हाथ में नहीं रहा। यही सबसे बड़ा संकट है। पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक की घटनाएं अपवाद, वे शिक्षा व्यवस्था के माथे पर एक स्थायी दाग बन गई हैं। इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि युवा इसे लगभग सामान्य बात मानने लगे हैं। किसी भी व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी तब होती है जब उसकी खामी लोगों को हैरान करना बंद कर दे। शिक्षा सिर्फ ज्ञान नहीं देती। यह समाज और सरकार के बीच एक नैतिक समझौता भी होती है कि मेहनत के साथ न्याय होगा। अगर यह पुल टूटने लग पड़े तो संकट सिर्फ एक विद्यार्थी का नहीं रहता, यह पूरी पीढ़ी का बन जाता है।
नीति, नीयत और नाकामी : प्रत्येक विद्यार्थी द्वारा आत्म-हत्या करने के बाद कहा जाता है कि वह दबाव नहीं सहन कर सका। लेकिन क्या हमने कभी यह पूछा है कि वह दबाव कौन पैद कर रहा है? मुद्दा सिर्फ एक विद्यार्थी का नहीं, उस शिक्षा व्यवस्था का है, जो लगातार प्रतियोगिता तो बढ़ रही है, लेकिन अवसर नहीं। परीक्षाएं बढ़ रही हैं, कोचिंग सेंटर बढ़ रहे हैं, फीस बढ़ रही है और उम्मीदें भी बढ़ रही हैं, लेकिन निष्पक्ष भर्ती, समय पर परिणाम और रोज़गार के अवसर उसी रफ्तार से नहीं बढ़े। इसी पृष्ठभूमि में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भी परख होनी चाहिए, जिसे एतिहासिक बदलाव कहा गया था। लेकिन किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके दस्तावेज़ से नहीं, उसके परिणाम से होता है।
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