क्या अब बांग्लादेश से भी सावधान रहें
भारत के लिए पाकिस्तान पहले ही दुश्मन देश जैसा व्यवहार करता नज़र आया है। चीन गुपचुप तरीकों से जो कुछ कर रहा है उसे मित्रता का नाम तो नहीं दिया जा सकता। वह हमेशा दूसरों को अंधेरे में रखता है। यह भी कहा गया है कि हाल ही में नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ की जानकारी उसे कुछ समय पहले ही थी, परन्तु उसने नेपाल सरकार को सावधान नहीं किया। शायद इससे काफी जानें बच सकती थीं। अब बांग्लादेश एक समस्या बनता जा रहा है। कौन नहीं जानता कि पाकिस्तान के पंजे से छुड़ाने और मुक्ति वाहिनी के रूप में बांग्लादेश बनाने में भारत की कितनी बड़ी मदद थी, परन्तु समय गुजरते ही वहां की राजनीति अपनी स्वतंत्रता की दास्तां भी भूल गई। अब स्थिति यह है कि उसे वर्तमान में नज़र अंदाज़ करना मुश्किल होता जा रहा है। इधर शेख हसीना ने दिल्ली में प्रेस कान्फ्रैंस की और नई बनी सरकार पर बांग्लादेश को बर्बाद करने का आरोप लगाया। पहली बात बिल्कुल साफ है कि हसीना वाले दौर में वापस नहीं जाया जा सकता। वह परस्पर सहयोग और विश्वास का दौरा था। ढाका भारत का विश्वसनीय साथी रहा है। हमारे बीच सुरक्षा सहयोग गहरा गया था। राजनीतिक संबंध स्थिर थे। कुछ सोचना नहीं पड़ता था। अब समीकरण बदल चुके हैं। बांग्लादेश का मतदाता दक्षिण पंथ की तरफ झुकता नज़र आया है। एक उदार और धर्म-निरपेक्ष राजनीति के लिए बहुत कम स्पेस बचा है। हिंदुओं पर हमले हुए हैं। उन्हें इन्साफ मिलना कम हो गया है। शेख हसीना राजनीतिक वापसी की बात तो करती हैं, परन्तु यह वर्तमान दौर में मुमकिन लगता नहीं।
पहले रहमान का रुख भारत के लिए अनुदार नहीं नज़र आता था, लेकिन बाद में जो इशारे मिले वे चिंताजनक ही हैं। पाकिस्तान के साथ रिश्ता बनाने की बांग्लादेश की इच्छा इसका एक कारण है जिसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है। उस गठबंधन में भी अच्छी दिलचस्पी दिखाई देती है। हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान तथा तुर्किये ने एक आपसी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसको समझा जा रहा है कि आगे इनमें से एक पर भी हमला हुआ तो सभी पर हमला माना जाएगा। बांग्लादेश ने अब कहा है कि इन तीनों देशों से जुड़े किसी आर्थिक या रक्षा ढांचे में शामिल होने को लेकर उसका अपना रवैया सकारात्मक है, जिसका मतलब होगा कि 1971 के इतिहास यानी पाकिस्तान के द्वारा किए गए नरसंहार के बावजूद ये दोनों देश एक सैन्य गठबंधन में आ सकते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति अचरज भरी है। अभी तक यह सोकाल्ड ‘इस्लामिक नाटो’ मूल रूप से पश्चिम एशिया का समूह है। सीधे तौर पर भारत के खिलाफ नहीं दिखाई देता, लेकिन बांग्लादेश के इसका सदस्य बनते ही हालात बदल जाएंगे। बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन ला रहा है। वह आगे भी इस पथ पर जारी रह सकता है।

