पूजा की थाली और जूता
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हुआ, बड़ी धूम रही इसकी। देशों के तीरन्दाज़ नेताओं ने वक्तृता के मील पत्थर गाड़े। ऐसे ही गाहे बगाहे और भी शिखर सम्मेलन होते रहते हैं। वहां भी भाषण कला के मीनार खड़े किए जाते हैं, लेकिन कभी-कभी हम सोचते हैं इनमें औरतें कहां हैं? हमने तो सुना था इक्कीसवीं सदी में ‘नारी स्वतंत्रम’ हो गया है। नारी सशक्तिकरण के नारे बुलंद किए जाते हैं। नारी पुरुष समानाधिकार की बातें होती हैं, लेकिन कामकाज, राजनीति में नींव से लेकर शिखर तक इनका वजूद क्यों नज़र नहीं आता? लोकतंत्र है। विधानसभाओं और संसद के चुनाव होते हैं। केन्द्रीय मंडलों का गठन होता है। औरत का प्रतिशत कितना रहता है? आटे में नमक की तरह। केवल भारत ही नहीं विश्व भर के छोटे-बड़े, पिछड़े आधुनिक देशों को देख जाइए। औरतों का प्रतिशत कितना है। नज़र की ऐनक लगा कर तलाशना पड़ता है और अगर कभी कोई औरत अपनी योग्यता के साथ किसी देश की प्रधानमंत्री के ओहदे तक पहुंच जाए, उसकी तुलना लोकप्रिय टॉफियों के ब्रांड से कर दी जाती है।
आइए, पहले फैसला कर लें कि औरत सजग-सचेत जीवित प्राणी है या टॉफियों का डिब्बा। वक्त बदल गया है, लेकिन हम तो अपने देश में शुरू से ही, नारी की पूजा अर्चना में कोई कसर नहीं रखते रहे हैं, वे हमें बताते हैं।
सांस्कृतिक मंत्रों की गूंज होती है, ‘यत्रस्य नारी पूज्यन्ते, रमयन्ते तत्र देवता’ लेकिन सच बताओ चाहे हमने देवी मां के मंदिरों से पूजा-अर्चना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन क्या हमने अपने परिवेश में अपनी ज़िंदगी में उभरती स्त्रियों को देवी रूप माना? पूजा करते तो शायद इस परिवेश में देवता रमते रहते, लेकिन पुरुष का वर्चस्व बढ़ाने वाले प्रेम संवादों के बावजूद क्या हमने उन्हें कभी भोग्या से अधिक माना। इन्होंने शिक्षा परीक्षाओं का शिखर, सेवा प्रतियोगिताओं का नम्बर वन छुआ, लेकिन फिर भी हम उन्हें कमज़ोर लिंग, या अपनी जेब में लगे ‘फाऊंटेन पेन से अधिक मानने के लिए तैयार नहीं।’
हिन्दी के छायावाद ने नारी का महिमा मण्डन करना चाहा, तो कह दिया ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो।’ यह सीमा क्यों? जबकि नारी ने साबित किया है कि पुरुष से कहीं अधिक परिश्रमी, अध्यवसायी और एक-निष्ठ वे हैं। इसरो के द्वारा अंतरिक्ष की शोध करने निकली तो आगे-आगे औरतें थीं। दुनिया डिजिटल से कृत्रिम मेधा के क्षितिज तक पहुंची तो इस विकास यात्रा में पुरुष के कन्धे के साथ कन्धा भिड़ा कर औरतें खड़ी थीं, परन्तु दुनिया की बड़ी से लेकर छोटी कम्पनियों तक की चेयरमैनी बांटने की नौबत आई तो औरतों के नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।
देश की रक्षा में उन्होंने कहां अपना दम पीछे किया? लेकिन उन्हें भारत की सेना में स्थायी कमीशन और प्रमोशन देने की याद हमें अभी आई। हम इतिहास खंगालते हैं। अंग्रेज़ से लड़ने के लिए शूरवीरता से रानी लक्ष्मी बाई आगे बढ़ीं, तो उनका वन्दन करते हुए सुभद्रा कुमारी चौहान ने कह दिया, ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ परन्तु मर्दानी ही क्यों? औरतों के लिए औरतों में उपयुक्त विशेषण क्यों नहीं? उपयुक्त विशेषण नहीं हैं, लेकिन उनके लिए दोगली भाषा अवश्य है। हम कहते हैं भारत ने अपनी कुरीतियों का अन्त कर दिया। राजा राम मोहन राय और लाजपत राय के ज़माने से दहेज प्रथा का अंत हो गया। जी हां, कानूनी रूप से दहेज अपराध घोषित हुआ तो इस शब्द के प्रयोग का अन्त हो गया, लेकिन उसकी जगह ‘उपहार’ ने ले ली। देश का सबसे बड़ा धंधा बन गया ‘शादी ब्याह का उत्सव, और जेब माने या न माने, बढ़-चढ़ कर लड़की को उपहार रूपी दहेज तो देना ही पड़ेगा। नहीं तो हिंसक तलाक, या आत्महत्या कहलाने वाली दुल्हिन हत्याएं।’
हम आज तक कुछ बातें समझ नहीं पाये। यह लड़का ही क्यों हमेशा घोड़ी चढ़ कर दुल्हिन ब्याहने जाता है। दुल्हिन क्यों कार चला कर दूल्हा ब्याहकर नहीं ला सकती। फिर दहेज लड़की वाले ही क्यों दें? वर पक्ष को दहेज देने की ज़िम्मेदारी क्यों नहीं दी जा सकती? अब तो ज़माना बदल गया है, क्योंकि समस्याओं या परम्पराओं को एक नये दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता, लेकिन यहां मूल्य भी परिवर्तित हो गये हैं महोदय! आप लड़की को लाने के लिए दहेज देने लगेंगे, तो चार लोग इसे उपहास का बाज़ार बनाने की बात कहने लगेंगे।



