हूतियों की बढ़ती ताकत से गहराया तेल संकट

पश्चिम एशिया में ईरान और अमरीका के बीच जारी युद्ध अब केवल दो देशों के बीच सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है। इसकी गूंज लाल सागर से लेकर फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य तक सुनाई दे रही है। यमन के हूती लड़ाकों की बढ़ती सक्रियता ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। सऊदी अरब की तेल पाइपलाइन पर ड्रोन हमला व लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार के निकट रणनीतिक क्षेत्र पर हूतियों की बढ़त ने दुनिया के सामने ऊर्जा सुरक्षा का नया संकट खड़ा कर दिया है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है और तेल परिवहन के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं तो आने वाले समय में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। सऊदी अरब ने ड्रोन हमले के बाद अपनी करीब 1200 किलोमीटर लंबी पूर्वी-पश्चिमी तेल पाइपलाइन को एहतियाती कदम के तौर पर अस्थायी रूप से बंद कर दिया। यह पाइपलाइन सऊदी तेल परिवहन व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है और इसके बंद होने की खबर ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों की चिंता बढ़ा दी। सऊदी विदेश मंत्रालय ने हमले के लिए इराक से उड़ाए गए कई ड्रोन को जिम्मेदार बताया। हमले में लोगों के घायल होने की भी खबर सामने आई। सऊदी अरब ने तत्काल जवाबी कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया और इराकी सरकार को आवश्यक कदम उठाने का अवसर दिया लेकिन अपनी संप्रभुता व सुरक्षा की रक्षा के अधिकार को स्पष्ट रखा।
इराक सरकार ने भी हूती हमले की निंदा की। जांच में ड्रोन के इराक से उड़ाए जाने की पुष्टि के बाद एक सैन्य कमांडर को हटाया गया। इसके बाद इराक ने एहतियाती कदम उठाते हुए ईरान के साथ शलमचेह सीमा चौकी भी बंद कर दी। इससे स्पष्ट है कि ईरान व अमरीका के बीच चल रहा संघर्ष अब आसपास के देशों की सुरक्षा व्यवस्था और आपसी संबंधों को भी प्रभावित कर रहा है। जुलाई में अमरीका और सऊदी अरब की ओर से इराक में ईरान समर्थित मिलिशिया के ठिकानों पर की गई कार्रवाई ने भी क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाया था।
सबसे बड़ी चिंता तेल को लेकर है। पश्चिम एशिया दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है। इस क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बनी रहने से तेल उत्पादन के साथ-साथ उसके परिवहन पर भी खतरा बढ़ जाता है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की बड़ी बाधा का सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ सकता है। तेल महंगा होने का असर केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवहन, उद्योग, बिजली, खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा की ज़रूरतों की कीमतों पर भी पड़ता है। इसलिए पश्चिम एशिया का युद्ध दुनिया के लिए ऊर्जा संकट के साथ आर्थिक संकट भी पैदा कर सकता है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि नवम्बर में होने वाले अमरीकी मध्यावधि चुनाव के बाद युद्ध समाप्त हो सकता है और इसके साथ तेल की कीमतों में भारी गिरावट आएगी। उनका कहना है कि ईरान इस संघर्ष को चुनाव तक खींचने का प्रयास कर रहा है। ट्रम्प के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद बाजार में अनिश्चितता कम होगी और तेल की कीमतें तेजी से नीचे आ सकती हैं। लेकिन इस दावे का वास्तविक परिणाम क्या होगा, यह समय ही बताएगा। तेल की कीमत केवल राजनीतिक घोषणाओं से तय नहीं होती। आपूर्ति, मांग, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और प्रमुख तेल उत्पादक देशों की स्थिति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।
दूसरी ओर ईरान की ओर से भी अमरीका के रुख पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन का बयान इस पूरे संकट के बीच विशेष महत्व रखता है। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया को अमरीका जैसे किसी क्षेत्रीय पुलिसकर्मी की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार क्षेत्र की सुरक्षा और यहां के देशों की सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी इसी क्षेत्र के देशों और उसके प्रमुख खिलाड़ियों की होनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता और न ही इस संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहता है। नई दिल्ली से आया ईरानी राष्ट्रपति का संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत पश्चिम एशिया के सभी प्रमुख देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए शांति और स्थिरता का पक्षधर रहा है। भारत के लिए इस संघर्ष का सीधा संबंध उसकी ऊर्जा सुरक्षा से है। भारत अपनी ज़रूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य या लाल सागर के रास्ते तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है तो उसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। महंगा तेल महंगाई बढ़ाने के साथ उद्योग और परिवहन लागत को भी प्रभावित कर सकता है।
ईरान का यह संदेश भी ध्यान देने योग्य है कि अमरीका शायद यह मान रहा था कि सैन्य दबाव के जरिए ईरान की सरकार को बहुत कम समय में कमजोर किया जा सकता है। लेकिन ईरान का दावा है कि युद्ध के दबाव के बावजूद जनता व सरकार के बीच एकजुटता बनी हुई है। दूसरी तरफ अमरीका ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय क्षमता को सीमित करने के लिए दबाव की नीति को प्रभावी मानता है। यही इस संघर्ष का मूल टकराव है। एक तरफ अमरीका अपनी रणनीतिक और सुरक्षा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाना चाहता है तो दूसरी तरफ ईरान इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय स्वतंत्रता के खिलाफ हस्तक्षेप के रूप में देखता है। अंतत: सवाल केवल यह नहीं है कि ईरान और अमरीका के बीच युद्ध में कौन भारी पड़ेगा। असली सवाल यह है कि इस संघर्ष की आर्थिक और मानवीय कीमत कौन चुकाएगा। युद्ध लंबा चलने पर आम जनता को महंगाई और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है। ट्रम्प का दावा है कि चुनाव के बाद तेल सस्ता हो जाएगा, जबकि ईरान का कहना है कि वह युद्ध नहीं चाहता और क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा स्वयं तय करनी चाहिए। इन दोनों दावों के बीच सच्चाई आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि हूतियों की बढ़ती ताकत, लाल सागर में अस्थिरता और होर्मुज का संकट दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी बन चुके हैं।

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