ब्रिक्स सम्मेलन की उपलब्धि
नई दिल्ली में दो दिवसीय ब्रिक्स सम्मेलन कई पक्षों से बेहद सफल रहा है। भारत ने इस 18वें सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए जिस तरह की परिपक्व सूझ-बूझ का प्रकटावा किया है और जिस तरह सभी सदस्य देशों में संतुलन बिठाने का यत्न किया है, उसको दुनिया भर के बहुत से देशों ने सराहा है। इसके महत्वपूर्ण सदस्यों रूस और चीन ने ऐसी पहुंच अपनाई थी कि अमरीकी डॉलर के स्थान पर आपसी संतुलन के लिए अपनी-अपनी करंसियों को आधार बनाया जाए। इससे पहले यूरोपियन यूनियन ने भी अमरीकी दबदबे को घटाने के लिए यूरो नामक साझी करंसी को अपना लिया था। ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों की जनसंख्या दुनिया भर के मुकाबले में लगभग आधी है और इनकी अर्थव्यवस्था भी अंतर्राष्ट्रीय तौर पर 40 प्रतिशत के बराबर है। भारत का चाहे अमरीका के साथ अब तक व्यापार समझौता सफल नहीं हुआ परन्तु यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन के साथ इसके व्यापारिक
समझौते हो चुके हैं।
इसलिए हाल ही में चाहे ब्रिक्स देशों के बीच आपसी संतुलन के लिए साझी व्यापारिक करंसी की बात सफल नहीं हो सकी परन्तु भारत इस दिशा में संभल कर और सूझ-बूझ के साथ कदम उठा रहा है, जिस कारण उसने इस तरफ कोई बहुत तत्परता अभी नहीं दिखाई परन्तु समुचे रूप में ब्रिक्स देशों के दिल्ली घोषणापत्र से यह प्रभाव ज़रूर मिलता है कि वह अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीतियों के खिलाफ डट कर खड़े होने को प्राथमिकता दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अमरीका लड़खड़ाता नज़र आ रहा है। यह सम्मेलन उस समय हुआ है, जब रूस और यूक्रेन में वर्षों से लड़ाई चल रही है। अमरीका और इज़रायल द्वारा 6 माह पहले ईरान पर किए गए हमले और होर्मुज जलडमरू द्वारा समुद्री जहाज़ों के आवागमन रुकने के कारण दुनियाभर के देशों की आर्थिकता डगमगा चुकी है। ईरान ने अमरीकी अड्डों वाले खाड़ी देशों पर लगातार हमले किए हैं, जिससे दोनों पक्षों में तनाव बहुत बढ़ चुका है, परन्तु ऐसे समय में भारत की सफल कूटनीति के कारण ईरान तथा संयुक्त अरब अमीरात जैसे दुश्मन देश भी एक संयुक्त मंच पर पहुंचे हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी बात क्या हो सकती है कि ब्रिक्स देशों ने संयुक्त घोषणा-पत्र में पहलगाम हमले की कड़ी निंदा की है और इसके साथ ही जिन देशों द्वारा आतंकवादियों को शह दी जा रही है, उसकी भी कड़ी आलोचना इस घोषणा-पत्र में सामने आई है। इस सम्मेलन में भारत का मुख्य प्रभाव लचकदार, सहयोग तथा स्थिरता के विचारों वाला रहा है, जिसकी प्रशंसा इन सभी देशों ने की है। इस घोषणा-पत्र में गाज़ा में फिलीस्तीनियों के अधिकारों को मान्यता दिए जाने का भी ज़िक्र किया गया है और इसके साथ ही अमरीका द्वारा अपने तरीके से टैरिफ लगाने की नीति को भी नकारा गया है। विभिन्न स्थितियों में घिरे तथा अलग-अलग विचारों वाले देशों का इकट्ठे होकर एक-स्वर में बोलना निश्चय ही हैरान करने वाला कहा जा सकता है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ अलग बातचीत भी सकारात्मक अर्थों वाली मानी जा सकती है। चीन के प्रमुख शी जिनपिंग के साथ भी मोदी के आपसी व्यापार तथा सीमाओं की जटिल समस्या संबंधी विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श से यह बात भी परिपक्व हो गई है कि भविष्य में ये दोनों देश इस जटिल मामले के प्रति कोई संतोषजनक समाधान तलाशने में सफल हो सकते हैं। विश्व भर के मीडिया ने भी इस सम्मेलन संबंधी अपनी प्रतिक्रियाओं में भारत की प्रशंसा की है। ब्रिक्स देशों द्वारा कृत्रिम मेधा, आपसी व्यापार तथा सहयोग की भावना से चलने की इच्छा यदि क्रियात्मक रूप में सफल होती है तो इससे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देशों की उलझनों को सुलझाने का मार्ग अवश्य प्रशस्त होता है। इस सम्मेलन से पैदा हुई ऐसी उम्मीद इस समय अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बेहद तप रहे माहौल के लिए एक ठंडी तथा ताज़ा हवा का ऐसा झोंका अवश्य है, जो वातावरण को सुखद बनाने में सहायक हो सकता है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

