चुनावी मुद्दा बना नशे का प्रचलन

पंजाब में नशे के मुद्दे के बढ़ते राजनीतिकरण ने एक ओर जहां जन-साधारण को चिन्ता में डाला है, वहीं चुनावों के दौरान नशीले पदार्थों के बढ़ते उपयोग और इसकी तस्करी में वृद्धि ने इस चिन्ता को और घनीभूत किया है। इसका एक बड़ा प्रमाण इस एक तथ्य से भी मिल जाता है कि विगत 20 वर्षों के दौरान सम्पन्न हुए प्रदेश के प्रत्येक चुनाव प्रचार में बड़ा मुद्दा नशा ही रहा है। सितम यह भी है कि प्रत्येक राजनीतिक दल एक ओर जहां नशे को लेकर अन्य दलों खासकर सत्ता पक्ष की घेरेबन्दी करता है, वहीं सभी राजनीतिक दल प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से नशीले पदार्थों की तस्करी और तस्कर माफिया को संरक्षण भी प्रदान करते हैं। यह भी एक कटु तथ्य है कि प्रदेश में प्रत्येक राजनीतिक चुनाव के बाद ऐसी घटनाओं में वृद्धि हो जाती है। वर्ष 2007 से 2017 तक प्रदेश में अकाली-भाजपा सरकार के दस वर्ष के शासन काल में 6000 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थों का नेटवर्क उभर कर सामने आया था। इसी प्रकार बाद में बनी कांग्रेस सरकार के समय में भी पूरे पांच वर्ष तक नशे को लेकर सरकार और विपक्षी दलों के बीच नुक्ता-चीं होती रही। मौजूदा सरकार के पांच वर्ष के कार्यकाल में भी नशे का मुद्दा बरकरार रहा। विगत दो दशक के बीच जितने भी चुनाव हुए, उनमें प्रचार के दौरान भी नशे का मुद्दा ही हावी रहा है। वर्तमान में भी वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत, ‘आप’ की सरकार ने जहां ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ छेड़ रखा है, वहीं भाजपा ने भी नशे के विरुद्ध अभियान को मुद्दा बना लिया है। जालन्धर में भाजपा ने जहां 14 स्थानों पर नशा-विरोधी प्रदर्शनों का आयोजन किया, वहीं पंजाब प्रदेश भाजपा ने जारी किया है—‘भाजपा का नारा, नशा मुकाउना सारा’। प्रदेश भाजपा ने नशा-विरोधी मुहिम के तहत प्रदेश में चार ‘नशा-मुक्त यात्राओं’ के आयोजन की भी घोषणा की है।
नि:संदेह पंजाब की धरती को नशे के अजगर ने विगत कुछ दशकों से इस तरह से अपने नाग-फांस में घेर रखा है कि देश का यह रंगला और समृद्ध प्रांत अपनी चमक-दमक खोते जा रहा है। नशे की ओवर-डोज़ एवं नशे की घातकता से प्रदेश के हज़ारों युवा असमय काल का ग्रास बन चुके हैं। अनेक घरों के चिराग बुझे हैं, तो अनेक परिवारों के सिर का संरक्षण खो गया है। स्थितियों की गम्भीरता का पता इस एक तथ्य से सही तरीके से लगाया जा सकता है कि ज़िला कपूरथला के एक गांव के एक परिवार के पांचों बेटे एक-एक करके नशे की भेंट चढ़ गये, किन्तु कृत्घनता और प्रशासनिक कोताही की हद यह है कि इस ज़िला के अनेक गांवों में नशे का कारोबार और बड़े स्तर पर नशे का सेवन करने वालों की संख्या में वृद्धि का क्रम बदस्तूर जारी है। सर्वोच्च अदालत ने इस एक घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए प्रदेश सरकार को इस महा-व्याधि के विरुद्ध कठोर हाथों से कार्रवाई किये जाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी अपने महत्त्व को स्वयं ब्यां करती है कि इस समस्या पर नियंत्रण पाने के लिए प्रदेश के प्रशासनिक तरीकों में बुनियादी तौर पर बड़े बदलाव लाये जाने की ज़रूरत है। ऐसा नहीं कि प्रदेश की सरकारें इस मामले को लेकर कभी किसी चरण पर निष्क्रिय रही हों। प्रदेश में समय-समय पर बनने वाली सरकारें अपने समय की आवश्यकतानुसार इस समस्या पर वरद्हस्त प्रहार करती रही हैं, और इसकी रोकथाम हेतु अभियान भी चलाती रही हैं, किन्तु इस समस्या की जड़ें इतने गहरे में धंसी हुई हैं कि सफलता की उम्मीद दिखाई देकर भी धूल-धूसरित हो जाती रही है। मौजूदा सरकार की ओर से भी कई बार नशे के विरुद्ध युद्ध अभियान चलाये गये हैं, किन्तु कामयाबी यहां भी छलेडा बन कर आंख-मिचोली करती रही है। बेशक सरकारों की नीयत पर पूर्णरूपेण संदेह तो नहीं किया जा सकता  किन्तु यह भी तय है कि प्रशासनिक स्तर पर कहीं न कहीं कोई छिद्र अवश्य रह जाता है जहां से नशे का अन्धकार घुस आता है। 
नि:संदेह आज यह मामला सिर्फ कानून समस्या होने तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी जुड़े हैं। अब तो राजनीतिक हित भी इसके साथ जुड़ गये हैं। बेरोज़गारी के आलम में थोड़े से वित्तीय लाभ के लिए युवा नशे के कारोबार से जुड़ते हैं, और फिर पैसे के लालच में स्वयं इस दलदल में धंस कर अपने प्राणांत की ओर अग्रसर हो जाते हैं। राजनीतिक दलों को इसमें अपना सत्ता-पथ संवरते दिखाई देने लगता है। नशीले पदार्थों की तस्करी आज अरबों-खरबों रुपये का कारोबार बन चुका है। नशे की तस्करी की आंच अनेक राजनीतिक नेताओं के दामन तक भी जा पहुंची है। तथापि इस आंच से बचने का कोई मार्ग भी दिखाई नहीं देता है। हम समझते हैं कि पंजाब को यदि अपनी युवा शक्ति को विनाश की इस दलदल की ओर तेज़ी से अग्रसर होने से रोकना है, तो सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और प्रशासनिक, सभी धरातलों पर मिल कर इस समस्या पर कड़ा प्रहार करना होगा। नशे के अजगर को नथने के लिए नशे के विरुद्ध सामाजिक, राजनीतिक और सरकारी प्रयासों को  ईमानदारी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए तथा राजनीतिक धरातल पर इन्हें पर्याप्त संरक्षण भी प्रदान किया जाना चाहिए। नि:संदेह इस प्रयास को ईमानदारी से आगे बढ़ाये जाने पर इससे बा-उम्मीदी की आस भी की जा सकती है और एक दिन यह एक महा-अभियान बन सकता है।

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