बचपन को आभासी दुनिया के खतरे से बचाने की ज़रूरत

आज का बचपन किताब, खेल के मैदान और परिवार की बातचीत के साथ-साथ मोबाइल की चमकती स्क्रीन के बीच भी बड़ा हो रहा है। डिजिटल दुनिया ने ज्ञान, संवाद और मनोरंजन के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन यही दुनिया बच्चों के लिए कई गंभीर चुनौतियां भी लेकर आई है। सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव अब केवल समय बिताने का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक विकास, व्यवहार, निजी सुरक्षा और सामाजिक जीवन से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। ऐसे समय में नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आई है।
सुप्रीम कोर्ट ने 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों के सुरक्षित इस्तेमाल से जुड़ी याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में इस बात पर विचार करने की मांग की गई है कि नाबालिग बच्चों को सोशल मीडिया खाते खोलने की अनुमति देने से पहले माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति आवश्यक होनी चाहिए। न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कानून मंत्रालय को नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई 24 सितम्बर को निर्धारित की गई है। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया मंचों की वर्तमान आयु-व्यवस्था और भारत में नाबालिग की कानूनी स्थिति के बीच एक स्पष्ट सवाल खड़ा होता है। कई बड़े मंच सोशल मीडिया खाता हेतु 13 वर्ष की आयु की अनुमति देते हैं, जबकि भारतीय कानून में 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति नाबालिग माना जाता है। सोशल मीडिया खाता बनाते समय उपयोगकर्ता को नियम और शर्तों को स्वीकार करना पड़ता है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इतनी कम उम्र में बच्चा जिन शर्तों को स्वीकार कर रहा है, उनकी कानूनी और व्यावहारिक समझ उसके पास वास्तव में कितनी है।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसे केवल सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के सवाल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। असली मुद्दा बच्चों की सुरक्षा और ज़िम्मेदार डिजिटल वातावरण तैयार करना है। सोशल मीडिया का उपयोग पूरी तरह समाप्त करना न तो व्यावहारिक है और न ही आवश्यक। बच्चों को शिक्षा, रचनात्मक गतिविधियों और उपयोगी जानकारी के लिए डिजिटल साधनों की ज़रूरत है। आवश्यकता इस बात की है कि मनोरंजन और सामाजिक संपर्क के नाम पर ऐसी व्यवस्था बच्चों को अनियंत्रित सामग्री, असुरक्षित संपर्क और अत्यधिक स्क्रीन समय की ओर न धकेले।
लगातार स्क्रीन पर रहने का असर बच्चे की दिनचर्या और मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है। पढ़ाई में एकाग्रता कम होना, नींद की समस्या, चिड़चिड़ापन, सामाजिक अलगाव और स्वयं की तुलना दूसरों से करने की प्रवृत्ति जैसी समस्याएं चिंता का विषय हैं। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली चमकदार और अक्सर अवास्तविक जीवनशैली बच्चों के मन में अपने प्रति असंतोष पैदा कर सकती है। इसके साथ ऑनलाइन उत्पीड़न का खतरा भी बढ़ता है। किसी बच्चे का मज़ाक उड़ाना, उसे लगातार परेशान करना, अपमानजनक सामग्री फैलाना या उसे समूह से अलग करने का प्रयास उसके मन पर गहरा असर डाल सकता है। इससे भी गंभीर खतरा अनजान लोगों द्वारा बच्चों को विश्वास में लेकर उनका गलत इस्तेमाल करने का है। झूठी पहचान बनाकर बच्चों से संपर्क करना, निजी जानकारी हासिल करना और धीरे-धीरे उन्हें अनुचित गतिविधियों की ओर ले जाना ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे परिवार और समाज को सतर्क रहना होगा।
बच्चों की निजी जानकारी की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। तस्वीरें, विद्यालय से जुड़ी जानकारी, परिवार का विवरण, स्थान और अन्य व्यक्तिगत सूचनाएं यदि गलत हाथों में पहुंच जाएं तो उनका दुरुपयोग हो सकता है। आयु के अनुरूप न होने वाली सामग्री भी बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए नुकसानदेह हो सकती है। इसलिए सोशल मीडिया की स्वतंत्रता के साथ सुरक्षा की ज़िम्मेदारी को भी बराबर महत्व देना होगा।
इस दृष्टि से माता-पिता की सहमति और अभिभावकीय निगरानी की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। यदि नाबालिग के खाते के निर्माण से पहले माता-पिता या कानूनी अभिभावक की पुष्टि आवश्यक हो, तो कम उम्र में बिना जानकारी के खाते बनाए जाने की संभावना कम हो सकती है। आयु की पुष्टि के लिए सुरक्षित व्यवस्था भी ज़रूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया में बच्चों और परिवारों की निजी जानकारी की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। केवल पहचान की जांच के नाम पर अत्यधिक व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करना भी भविष्य में नई समस्या पैदा कर सकता है। दुनिया के कई देशों में बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने के लिए नियमों को कड़ा किया जा रहा है। 
भारत के सामने भी चुनौती है कि डिजिटल विकास और बाल सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। देश में करोड़ों बच्चे और किशोर इंटरनेट से जुड़े हैं। इसलिए केवल आयु सीमा निर्धारित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों के लिए सुरक्षित डिजाइन, प्रभावी शिकायत व्यवस्था और अनुचित सामग्री से बचाव की ज़िम्मेदारी भी निभानी होगी। अभिभावकों को भी बच्चों से मोबाइल छीनने के बजाय उन्हें डिजिटल दुनिया की समझ देने पर ज़ोर देना होगा।
स्कूलों में भी बच्चों को यह समझाना ज़रूरी है कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली हर जानकारी सच नहीं होती और ऑनलाइन किसी अनजान व्यक्ति पर तुरंत विश्वास नहीं किया जा सकता। 
-मो. 99749-40324

#बचपन को आभासी दुनिया के खतरे से बचाने की ज़रूरत