उत्तम कुमार के महानायक बनने तक का सफर 

उत्तरी कोलकाता की 51 अहिरीटोला स्ट्रीट में स्थित अपने भाई के मकान पर चपाला देवी ने 3 सितम्बर 1926 को एक बेटे को जन्म दिया। बच्चे के नाना ने उसका नाम उत्तम रखा, लेकिन यह नाम बच्चे की मां को पसंद नहीं आया। इसलिए नाम बदलकर अरुण कुमार चट्टोपाध्याय रख दिया गया, जोकि बच्चे के पिता सत्कारी चट्टोपाध्याय को भी पसंद आया, जिनका संबंध ज़िला हुगली के एक ब्राह्मण परिवार से था। बहरहाल, नाना के परिवार के आध्यात्मिक गुरु श्रीपुर्ना संन्यासी ने बच्चे की मुस्कान को देखते हुए भविष्यवाणी की कि पूरा देश उसे उत्तम के नाम से पहचानेगा। यही हुआ, 1950 से 1980 तक बंगाली सिनेमा में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने के कारण उत्तम कुमार को ‘महानायक’ कहा जाने लगा, विशेषकर इसलिए भी कि उन्हें पांच राष्ट्रीय पुरस्कारों व चार फिल्मफेयर अवार्ड्स से सम्मानित किया गया। उत्तम कुमार केवल एक्टर ही नहीं थे बल्कि वह निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक, संगीतकार व प्लेबैक सिंगर भी थे। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे महान व सबसे सफल एक्टर्स में शामिल किये जाते हैं। बहरहाल, हिंदी सिनेमा के दर्शकों के सामने जब भी उत्तम कुमार का नाम लिया जाता है तो ‘दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा’ गीत याद आ जाता है, जोकि 1975 में आयी उनकी फिल्म ‘अमानुष’ का गीत है, जिसे इंदीवर ने लिखा, किशोर कुमार ने अपनी दर्द भरी आवाज़ में गाया और संगीत दिया था। इस सफल व कामयाब फिल्म की अभिनेत्री शर्मिला टैगोर थीं।
विस्तृत मध्यवर्ग परिवार से संबंधित उत्तम कुमार के पिता मेट्रो सिनेमा में प्रोजेक्टर ऑपरेट करते थे। उत्तम कुमार के दो भाई- बरुण व तरुण थे, जिनमें तरुण भी एक्टर बने। उत्तम का पैतृक घर भाबानिपुर में था, जहां जात्रा रिहर्सल व अपने पिता व चाचा द्वारा स्थापित सुहरीद समाज के परफॉरमेंस देखकर उनकी दिलचस्पी एक्टिंग में हुई। उत्तम की प्रारम्भिक शिक्षा चक्राबेरिया हाई स्कूल में हुई, जहां उन्हें पांच वर्ष की आयु में एक्टिंग करने का पहला अवसर मिला ‘गयासुर’ नाटक में। बाल गयासुर की भूमिका अदा करने के लिए उन्हें मैडल से सम्मानित किया गया। सन् 1936 में, यानी मात्र 10 वर्ष की आयु में, उत्तम ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर लूनर क्लब नामक एक थिएटर ग्रुप की स्थापना की, जिसका पहला प्रोडक्शन रबिंद्रनाथ टैगोर का ‘मुकुट’ था। यह इतना सफल हुआ कि उनके पड़ोसी ने अपने घर का एक कमरा नाटक की रिहर्सल के लिए दे दिया। फिर सुहरीद समाज ने उन्हें अपने एक नाटक में बलराम की भूमिका दी। 
उत्तम कुमार 1943 में बीकॉम पास करने के बाद कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट में 275 रूपये मासिक वेतन पर क्लर्क हो गये और उसी वर्ष उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी के फण्ड में 1,700 रूपये दान किये, जो लूनर क्लब ने ‘आनंदमठ’ का विशेष मंचन करके कमाये थे। ध्यान रहे कि उत्तम ने निदानबंधु बनर्जी से शास्त्रीय संगीत की भी तालीम ली थी। वह तैराक भी थे और भाबानिपुर स्विमिंग एसोसिएशन के लगातार तीन वर्ष तक 100 मी फ्रीस्टाइल चैंपियन रहे। उन्होंने योग, कुश्ती व लाठी खेला (बंगाली मार्शल आर्ट्स) की भी शिक्षा ली। जीवनभर मोहन बगान के फैन रहे, उत्तम अच्छे फुटबॉलर भी थे व राइट-बैक पोजीशन पर खेलते थे। वह वॉलीबॉल व क्रिकेट भी खेलते थे। 
इस सबसे मालूम होता है कि जब 1947 में उन्होंने फिल्मी दुनिया में प्रवेश किया तो वह प्रभावी एक्टर बनने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। शुरू में उन्हें एक्स्ट्रा व सहायक भूमिकाएं ही मिल सकीं। लेकिन 1949 में उन्हें पहली बार फिल्म ‘कमोना’ में लीड रोल मिला। आरंभ में वह यह तय नहीं कर पाये कि उनका स्क्रीन नेम क्या होना चाहिए। उन्होंने उत्तम चटर्जी, अरूप कुमार, अरुण कुमार चट्टोपाध्याय आदि स्क्रीन नाम रखे, कभी यह तो कभी वो। फिर 1951 में वह एमपी प्रोडक्शंस में स्टाफ आर्टिस्ट बन गये और उसी वर्ष फिल्म ‘सहजात्री’ में उन्होंने पहाड़ी सान्याल के सुझाव पर अपना नाम उत्तम कुमार रखा। पोर्ट ट्रस्ट में उत्तम कुमार की नौकरी जारी थी, उनकी फिल्में एक के बाद एक फ्लॉप हो रही थीं, उन्हें ‘फ्लॉप मास्टर जनरल’ के अपमानजनक नाम से पुकारा जाने लगा था। वह इतने निराश हुए कि फिल्मोद्योग छोड़ने का मन बना लिया। लेकिन उनकी प्रतिभा को निर्देशक निर्मल डे ने पहचाना, उन्हें ‘बासु परिबार’ (1952) में लीड भूमिका दी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये। उत्तम कुमार स्टार बन गये। उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 211 फिल्मों में अपनी कला का प्रदर्शन करके ‘महानायक’ का उपाधि हासिल की। 
उत्तम कुमार ने गौरी चटर्जी (27 सितम्बर 1929- 21 अप्रैल 1981) से 1 जून 1948 को विवाह किया, एक बेटे गौतम चटर्जी (7 सितम्बर 1950- 2 मई 2005) के पिता बने, लेकिन यह शादी तनावपूर्ण रही। उनका सफल अभिनेत्री सुप्रिया देवी से संबंध हो गया, दोनों ने 1963 में विवाह किया, लेकिन उत्तम कुमार ने गौरी को तलाक नहीं दिया। उत्तम कुमार ने दो बार अपनी आत्मकथा लिखना आरंभ किया, लेकिन दोनों बार ही वह अधूरी रही। बाद में इस आत्मकथा को तरुण कुमार ने पूरा किया, लेकिन जिस दिन उत्तम कुमार का निधन हुआ उसी दिन मूल पांडुलिपी को चुरा लिया गया और उसे 2010 में प्रकाशित किया गया। उत्तम कुमार का 24 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया और सिनेमा ने अपना टाइटल हमेशा के लिए खो दिया।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#उत्तम कुमार के महानायक बनने तक का सफर