दशम पातशाह के सच्च्े सिख थे बंदा सिंह बहादुर

प्रथम सिख राज की स्थापना कोई सामान्य बात नहीं थी, जिसमें श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का बंदा सिंह बहादुर के साथ मिलना बहुत बड़े अर्थ रखता है। यह मिलन 3 सितम्बर, 1708 को गोदावरी के किनारे हुआ था, जहां बंदा बहादुर बैरागी साधु की तरह रहते थे। कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी ने अपनी कुर्बानी दे दी थी। इस शहादत की पुष्टि करने वाले उनके सुपुत्र गोबिंद राय थे, जिन्होंने 1699 में बैसाखी के मौके पर संगत से 5 प्यारों के शीश मांगे और उन्हें खंडा के पाहुल का अमृतपान करवाने के बाद 5 प्यारों के हाथों से स्वयं भी अमृतपान किया था। उस दिन से सभी अमृतधारी सिंहों के नाम के साथ सिंह लगना शुरू हुआ तो गुरु साहिब भी गोबिंद राय से गोबिंद सिंह हो गए। 
गुरु साहिब 1685 से 1688 तक यमुना नदी के किनारे पावंटा साहिब में रह कर सिख संगत को युद्ध की रणनीति सिखाते रहे और दशम ग्रंथ की रचना भी करते रहे। जब पहाड़ी राजाओं ने गुरु साहिब का बढ़ता प्रभाव देखा तो वे मुंह मोड़ कर मुगलों का साथ देने के लिए मान गए। अंत में गुरु साहिब को 1704 में धर्म का पालन करने  के लिए आनंदपुर साहिब छोड़ना पड़ा, चमकौर साहिब की गढ़ी में मुगलों से मुकाबला करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जहां बड़े साहिबज़ादे बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह समेत सिर्फ 40 सिख एक हज़ार मुगलों के साथ मुकाबला करते हुए शहीद हो गए। गुरु साहिब ने औरंगज़ेब को जफरनामा (जीत का संदेश) लिखकर चुनौती दी। 1708 में गुरु जी ने नांदेड़ में माधो दास को अमृतपान करवा कर बंदा सिंह बहादुर बनाकर मुगलों के अत्याचार का खात्मा करने के लिए सरहिंद भेजा था। 
बंदा सिंह बहादुर के नांदेड़ छोड़ने के बाद वज़ीर खान द्वारा भेजे दो हत्यारों ने गुरु साहिब पर हमला किया और उन्हें गम्भीर घायल कर दिया। 8 अक्तूबर, 1708 को अपने खाकी लिबास का त्याग करते समय गुरु जी के आखिरी शब्द थे—आज्ञा भई अकाल की तबी चलायो पंथ सब सिखन को हुक्म है गुरु मान्यो ग्रंथ। जब बंदा सिंह बहादुर को यह समाचार मिला तो मुगलों से बदला लेने का उनका गुस्सा और भी बढ़ गया। चप्पड़चिड़ी की लड़ाई इसी की प्रतिक्रिया थी और सिख राज्य की स्थापना इसका अंजाम थी। एक तरफ गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा के रूप में श्री गुरु नानक देव की विचारधारा को क्रियात्मक रूप देकर नये मनुष्य का सृजन किया तो बंदा सिंह बहादुर ने सिख पंथ के सामाजिक और राजनीतिक पक्ष को उभारा। उन्होंने ज़मीन जोतने वालों को ज़मीन के मालिक बनाया। यही वजह है कि जाट सिख समुदाय पहले से सचेत होकर बाबा बंदा सिंह बहादुर के इन्कलाब से जुड़ा रहा। पंजाब के किसान, खासकर जाट किसान आज भी अप्रत्यक्ष रूप में बाबा बंदा सिंह के इन्कलाब से जुड़े हुए हैं। 
अब तो बड़ी संख्या में सिख 3 सितम्बर को हज़ूर साहिब जाकर हाज़िरी लगाते हैं, जिसमें विदेशों में रहते जाट सिख भी शामिल होते हैं। पहले यह जत्था लुधियाना से सचखंड रेलगाड़ी से नांदेड़ पहुंचता था, परन्तु इस वर्ष यह जत्था बस से रवाना हुआ। रास्ते में यह आगरा, ग्वालियर, इंदौर तथा कई अन्य गुरुद्वारों के दर्शन करते हुए नांदेड़ पहुंचा। 
तख्त श्री हज़ूर साहिब के जत्थेदार ने जत्थे से मिलकर आशीर्वाद देते हुए नेताओं को सिरोपा देकर सम्मानित किया। इस बार मुझ पर भी कृपा हुई है। यहां नई सराये बन रही हैं और पहले से बनी सरायों में और कमरे बढ़ाए जा रहे हैं। गोदावरी नदी के निकट स्थित गुरुद्वारा लंगर साहिब में 24 घंटे लंगर चलता है। इस गुरुद्वारा साहिब के निकट एक बड़ा बाज़ार भी विकसित हो गया है, जो देर रात तक खुला रहता है। 
बंदा सिंह बहादुर एक बेमिसाल सेनापति थे, जिन्हें पंजाब में मुगलों के अत्याचारों के खिलाफ लड़ने के लिए दशम पातशाह ने चुना था। अमृतपान करने से पहले बंदा सिंह बहादुर माधो दास नामक प्रसिद्ध तपस्वी थे, जिन्होंने गुरु साहिब की शिक्षाओं को स्वीकार किया था। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें एक हुक्मनामा, एक तलवार तथा 5 तीर देकर पंजाब जाकर सरहिंद के मुगल गवर्नर वज़ीर खान को छोटे साहिबज़ादों को शहीद करने की सज़ा देने का आदेश दिया था। बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब पहुंच कर सिख योद्धाओं और स्थानीय किसानों की सेना इकट्ठा करके चप्पड़चिड़ी की लड़ाई में मुगल सेना को पराजित कर सरहिंद पर कब्ज़ा करके पहले आज़ाद सिख राज की स्थापना की। उन्होंने गुरु नानक देव जी और गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम पर सिक्के और सरकारी मुहरें जारी करके दर्शाया कि सच्ची प्रभुसत्ता गुरुओं की है।
जब 12 मई, 1710 को बंदा सिंह बहादुर की कमान में सिख सेना ने चप्पड़चिड़ी की ऐतिहासिक लड़ाई में सरहिंद के मुगल गवर्नर वज़ीर खान को हराया तो मुगलों के पास तोपखाना, घुड़सवार, हाथी और व्यापक सशस्त्र सेना थी। दूसरी ओर सिख सेना के पास अद्वितीय साहस और गुरुओं के प्रति अथाह श्रद्धा थी। लड़ाई के दौरान भाई फतेह सिंह ने वज़ीर खान पर ज़ोरदार हमला करके उसे मौत के घाट उतार दिया तो मुगल सेना मैदान छोड़कर भाग गई। सिखों ने 14 मई, 1710 को सरहिंद पर कब्ज़ा करके पहले खालसा राज का ध्वज फहराया। इसके बाद मुगल बादशाह फरुखसियर ने सिखों को कुचलने के लिए बड़ा अभियान चलाया। अंत में बंदा सिंह बहादुर की सेना को गुरदास नंगल की कच्ची गढ़ी में अब्दुस समद खान के नेतृत्व वाली मुगल सेना ने घेर लिया। यह घेराबंदी लगभग 8 महीने तक चली और रसद-पानी खत्म होने के बावजूद सिख आखिरी सांस तक लड़ते रहे। आखिर दिसम्बर, 1715 में मुगलों ने उन्हें धोखे से बंदी बना लिया। 
बंदा सिंह बहादुर और सैकड़ों सिख कैदियों को लोहे के पिंजरों और ज़ंजीरों में जकड़ कर दिल्ली लाया गया। दिल्ली में ख्वाज़ा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के निकट बंदा सिंह बहादुर को शहीद करने से पहले उनके 4 साल के पुत्र अजय सिंह को उनकी गोद में बिठाकर शहीद किया गया। इसके बावजूद बाबा जी अडिग रहे और अकाल पुरख की रज़ा में रहे। तदुपरांत अनेक अमानवीय यातनाएं देकर बाबा जी को निर्ममता से शहीद कर दिया। महरौली (दिल्ली) में ख्वाज़ा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के निकट गुरुद्वारा शहीदी अस्थान बाबा बंदा सिंह बहादुर सुशोभित है।

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