ब्रिक्स सम्मेलन
भारत की परीक्षा
भारत के लिए आगामी शनिवार और रविवार के दिन बेहद महत्त्वपूर्ण माने जा रहे हैं। 12 और 13 सितम्बर को नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों की बैठक हो रही है। इसमें इन देशों के प्रमुखों के साथ संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के भी शामिल होने की संभावना है। भारत ने पहले भी तीन बार ब्रिक्स देशों के प्रमुखों की मेहमान-नवाज़ी की है। ब्रिक्स का अपना बड़ा महत्त्व है। 20 वर्ष पूर्व बने इस संगठन में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और साऊथ अफ्रीका शामिल हुए थे। इसीलिए इसका नाम ‘ब्रिक्स’ संक्षिप्त रूप में अंग्रेज़ी शब्दों के अनुसार ‘ब्राज़ील, रशिया, इंडिया, चाइना, साऊथ अफ्रीका’ रखा गया था। लम्बी अवधि के बाद वर्ष 2024 में इस संगठन में मिस्र, इथोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को शामिल किया गया था। वर्ष 2025 में इंडोनेशिया को भी इसका सदस्य बनाया गया था।
गत वर्ष बेलारूस, बोलीविया, कज़ाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाइलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम को इस संगठन के सहयोगी सदस्य बनाया गया था। इस तरह से यह संगठन एक मज़बूत इकाई के रूप में उभरा है। इसमें विश्व की 49.5 प्रतिशत जनसंख्या है। लगभग 40 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक योगदान है और यह लगभग 26 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के प्रमुख शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन के साथ-साथ लगभग सभी देशों के प्रमुख इस सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं। नि:संदेह भारत की ओर से ऐसी अंतर्राष्ट्रीय मेहमान-नवाज़ी और दो दिवसीय बातचीत में स्थूल और सार्थक परिणाम हासिल कर पाना जहां एक कड़ी परीक्षा की बात होगी, वहीं इसमें से निकलने वाले सार्थक परिणामों का संगठन के सभी सदस्यों और समूचे रूप से पूरे विश्व के लिए भी विशेष महत्त्व होगा। इस समय जहां रूस और यूक्रेन के बीच विनाशकारी युद्ध जारी है, वहीं पश्चिम एशिया में भी बड़ा संकट खड़ा दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरू में जहाज़ों का आवागमन रोकने ने भी एक बड़ा संकट पैदा किया हुआ है। इसके साथ ही अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से व्यापार पर टैरिफ लगाने की नीतियों ने भी विश्व को हैरान और परेशान किया हुआ है। इसलिए भारत की ओर से लचकीलापन, अनुसंधान और सहयोग आदि उक्त विषयों को सम्मेलन में चर्चा के लिए केन्द्रीय मुद्दों के रूप में रखा गया है, ताकि लोगों की भावनाओं को आधार बना कर उनकी बेहतरी के लिए सामूहिक यत्न किए जा सकें। यदि खाद्य, ऊर्जा, स्वास्थ्य, प्राकृतिक आपदाओं आदि के लिए यह संगठन संयुक्त यत्नों और सहयोग में शामिल होता है तो यह करोड़ों मनुष्यों के लिए वरदान और ऊंची उड़ान सिद्ध हो सकता है।
भारत के ईरान के साथ भी सुखद संबंध बने रहे हैं। रूस इसका सहयोगी और मित्र बना रहा है। चीन की विस्तारवादी नीतियों के बावजूद दोनों देश एक-दूसरे के साथ मामलों को हल करने के लिए लम्बी बैठकें और शिखर वार्ताएं करते रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग व्यापार और अन्य आर्थिक गतिविधियों में लगे अपने लगभग 400 टीम सदस्यों के साथ भी दिल्ली आ रहे हैं। इससे पहले भी वर्ष 2014 में वह गांधीनगर आए थे। उन्होंने वर्ष 2019 में चेन्नई-मल्लापुरम का दौरा भी किया था और अब वह पूरी तैयारी के साथ दिल्ली की यात्रा कर रहे हैं। अमरीकी राष्ट्रपति की व्यापारिक नीतियों से विश्व भर के देश नाराज़ हैं। इसलिए इस सम्मेलन में विशेष रूप से रूस और ब्राज़ील इस बात पर भी विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श करने के इच्छुक हैं, कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आदान-प्रदान के लिए डॉलर के मुकाबले में कोई और करंसी को विकसित किया जाए। यूरोप में भारत ने यूरोपियन यूनियन द्वारा दर्जनों ही देशों के साथ समझौते किए हैं। ब्रिटेन के साथ इसने अलग रूप से व्यापारिक संबंध बनाए हैं। चाहे अमरीका के साथ अभी तक उसकी नीतियों के कारण समझौता सफल नहीं हो सका, परन्तु समूचे दृश्य के दृष्टिगत मौजूदा समय में डॉलर का प्रवानित विकल्प ढूंढ पाना कठिन प्रतीत होता है, परन्तु आगामी समय में इन देशों के बीच व्यापार के लिए कोई अलग सांझी करंसी के रूप में हल निकाले जाने की संभावना ज़रूर बनी दिखाई देती है। नि:संदेह ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का कद और भी ऊंचा हुआ दिखाई देगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

