मतों की सामूहिक गणना का मुद्दा फिर चर्चा में
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची व न्यायाधीश वी मोहना की खंडपीठ ने 1 सितम्बर 2026 को केंद्र सरकार से कहा कि वह ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) में रिकॉर्ड किये गये मतों को गिनने के लिए टोटलाइज़र (सामूहिक गणना करने वाला उपकरण) मशीनों के उपयोग की संभावना की समीक्षा करे ताकि बूथ-अनुसार मतदान पैटर्न की गोपनीयता को सुरक्षित रखा जा सके और व्यक्तिगत बूथ पर मतदाताओं को पहचानने व प्रताड़ित किये जाने की आशंका को रोका जा सके। गौरतलब है कि अक्सर यह देखने में आया है कि मतदाता की पहचान हो जाती है कि उसने किसके पक्ष में अपने मत का प्रयोग किया और फिर दूसरा प्रत्याशी या उसके समर्थक संबंधित मतदाता के विरुद्ध हिंसा करते हैं या उसे धमकाते हैं। इस किस्म की अप्रिय वारदातों को रुकवाने के उद्देश्य से योगेश गुप्ता व इमरान खान ने 2014 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, यह मांग करते हुए कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाये कि वह एक चुनाव क्षेत्र के विभिन्न पोलिंग स्टेशनों पर पड़े मतों को मिश्रित कर दे ताकि प्रत्याशी उन क्षेत्रों में मतदाताओं को धमकियां न दे सकें जिनमें उन्हें ठुकरा दिया गया था।
आगे बढ़ने से पहले यह जान लेते हैं कि टोटलाइज़र (सामूहिक गणना करने वाला उपकरण) क्या है? यह मतों की सामूहिक गणना का एक प्रस्ताव है, जिसका उद्देश्य प्रत्याशियों को किसी एक पोलिंग बूथ पर वोटिंग पैटर्न जानने से रोकना है। टोटलाइज़र से होता यह है कि लगभग 14 पोलिंग बूथों पर डाले गये मतों को एक साथ गिन लिया जाता है। वर्तमान में प्रत्येक बूथ पर पड़े मतों को अलग-अलग गिना जाता है। टोटलाइज़र को भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंग्लुरु और इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन ऑ़फ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद ने विकसित किया है। दरअसल, टोटलाइज़र एक इंटरफेस है, जिसे 14 ईवीएम के समूह के मुख्य कंट्रोल यूनिट से जोड़ दिया जाता है। टोटलाइज़र का नतीजा बटन दबाने से मालूम हो जाता है कि 14 ईवीएम पर किस प्रत्याशी को कुल कितने कितने वोट मिले हैं और यह भी ज़ाहिर नहीं होता है कि किस मतदान क्षेत्र में मतदान का पैटर्न क्या रहा?
योगेश गुप्ता व इमरान खान ने टोटलाइज़र की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका इसलिए दायर की थी ताकि प्रत्याशियों को उन क्षेत्रों के मतदाताओं को धमकाने से रोका जा सके जिन्होंने उन्हें ठुकरा दिया था। बात सिर्फ धमकाने व हिंसा की ही नहीं है, देखने में तो यह भी आया है कि सांसद व विधायक मतदाताओं से कहते हैं, ‘मैं तुम्हारा काम क्यों करूं, तुम्हारे क्षेत्र में विकास कार्य क्यों कराऊं, जब तुम लोग मुझे वोट देते ही नहीं।’ चुने जाने के बाद सांसद व विधायक अपने पूरे क्षेत्र के प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की कि अमुक जाति व अमुक धर्म के सदस्य उनके पास किसी काम के लिए न आयें क्योंकि उन्हें लगता है कि वे लोग उनके पक्ष में मतदान नहीं करते। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है; क्योंकि इससे समाज में भेदभाव व ऩफरत फैलती है। इस पर त्वरित प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। इसलिए इस जनहित याचिका का महत्व बढ़ जाता है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में महाराष्ट्र के पूर्व उप-मुख्यमंत्री अजित पवार द्वारा दी गई तथाकथित धमकी का उदहारण दिया है कि आम चुनाव के दौरान बारामती चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं को धमकी देते हुए कहा था कि उनकी पार्टी एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) ईवीएम रीडिंग्स से मतदान पैटर्न को जान लेगी और जिस क्षेत्र ने उसे ठुकराया होगा उसकी जल आपूर्ति बंद करा दी जायेगी। (ज्ञात रहे कि महाराष्ट्र के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की कमी बड़ी समस्या है)।
भारत में बूथों को आमतौर से भौगोलिक दृष्टि से मार्क किया जाता है। अगर अलग-थलग या समूह में रह रहे सामाजिक गुट हैं, जैसा कि ग्रामीण भारत के अधिकांश हिस्सों में स्थिति है (और शहरी स्लमों में भी यह चलन तेज़ी से बढ़ता जा रहा है), तो यह संभव है कि उस विशेष समुदाय को पहचान लिया जाये, जिसकी उस पोलिंग बूथ या स्टेशन पर अधिक संख्या है और जिसने एक खास दिशा में मतदान किया हो। आधुनिक भू-स्थानिक टूल्स के आगमन से आज न सिर्फ मतदान केंद्र के ट्रेंड व सामाजिक सेटिंग के पारस्परिक संबंध को जानना आसान हो गया है बल्कि कारण संबंधी अंतदृष्टि भी हासिल की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं ने यह डर 2014 में व्यक्त किया था। आज 12 साल बाद तो यह डर अधिक विकराल हो गया है- वोट काटना, वोट बढ़ाना, वोट चोरी आदि के आरोप हैं। ज़िला प्रशासन के कहने पर बूथों पर मतदान प्रक्रिया को भी धीमा करने की खबरें हैं ताकि जिस प्रत्याशी को प्रशासन विजयी बनाना चाहता है, उसके अनुमानित विरोधी मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित किया जा सके।
इसके बावजूद केंद्र सरकार ने हमेशा ही टोटलाइज़र का विरोध किया है। केंद्र ने 2017 में सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि बूथ-अनुरूप वोटिंग पैटर्न के कारण मतदाताओं को धमकाया नहीं जाता है और बूथ-अनुरूप नतीजे घोषित करने को रोकने की आवश्यकता नहीं है। केंद्र का कहना था कि जब एक प्रत्याशी को मालूम हो जाता है कि अमुक बूथ पर उसे कम समर्थन मिला है, तो वह उस क्षेत्र का समर्थन प्राप्त करने के लिए अधिक मेहनत करता है। फिर 2018 में एडिशनल सोलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली खंडपीठ से कहा था कि टोटलाइज़र के कारण मतगणना आरंभ होने से पहले ही डाटा उल्लंघन हो सकता है। हाल ही में केंद्र ने फिर इसी डर को दोहराया। फलस्वरूप अदालत ने इस डर पर प्रतिक्रिया के लिए चुनाव आयोग को दो सप्ताह का समय दिया। विधि आयोग ने अपने शपथपत्र के ज़रिये अदालत को बताया कि तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में मंत्रियों के समूह ने सितम्बर 2018 में तय किया था कि ‘मीडिया एक्टिविज्म के इस दौर में बड़े पैमाने पर वोटर्स को धमकी/प्रताड़ित नहीं किया जा सकता’।
दूसरी ओर चुनाव आयोग निरंतरता के साथ टोटलाइज़र के पक्ष में रहा है। उसने सबसे पहले इसका सुझाव 2008 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को दिया था। फिर 2018 में उसने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि ‘वोटों की गिनती करने के लिए टोटलाइज़र के इस्तेमाल का समय आ गया है’। यह समर्थन वर्तमान सुनवायी चक्र में भी जारी रहा है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह पहले भी टोटलाइज़र सिस्टम के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश कर चुका है। मतदाता की गोपनीयता को सुरक्षित रखने के लक्ष्य का समर्थन करते हुए चुनाव आयोग ने प्रस्ताव को लागू करने के संदर्भ में कुछ व्यवहारिक व कानूनी चुनौतियों को भी व्यक्त किया, जिनमें बूथ-अनुरूप सत्यापन व वीवीपीएटी से संबंधित चिंताएं भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह ईवीएम द्वारा रिकॉर्ड की गईं वोटों को गिनने के लिए टोटलाइज़र सिस्टम इस्तेमाल करने पर अपनी राय दे। अदालत ने खासतौर से यह जानना चाहा कि क्या ऐसी व्यवस्था लागू करने में कोई रुकावट है और क्या इसकी वजह से कोई नकारात्मक प्रभाव होगा? चुनाव आयोग से भी कहा गया है कि वह अपना प्रस्ताव सरकार को दे।
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