बनते बिगड़ते रिश्ते
आगामी दिनों में भारत में ब्रिक्स देशों के प्रमुखों की बैठक होने जा रही है। भारत के अतिरिक्त चीन और रूस भी इस 11 सदस्यीय संगठन में शामिल हैं। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य आर्थिक मज़बूती के लिए मिलकर काम करना है। इससे पहले एक बार फिर भारत और चीन के बीच सीमांत मामले को लेकर बातचीत में तेज़ी आई है। दोनों देशों की सीमा लगभग 3500 किलोमीटर लम्बी है। 1962 में चीन ने सीमांत विवाद को लेकर ही भारत पर हमला किया था। इससे पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू के चीनी समकक्ष चाऊ एनलाई के साथ बहुत अच्छे संबंध थे। दोनों देश आपसी सहयोग के लिए किए गए पंचशील समझौते की भावना से चल रहे थे परन्तु चीन के हमले के बाद दोनों देशों के संबंध बिगड़ते गए। चाहे समय-समय पर दोनों देशों के नेताओं द्वारा एक दूसरे देश के दौरों से यह संबंध कुछ सुधरते भी रहे। इसके साथ पड़ोसी होने के कारण दोनों देशों का आपसी व्यापार भी चलता रहा।
चाहे इस क्षेत्र में चीन भारत से आगे और पहला खिलाड़ी बना दिखाई देता रहा है, परन्तु इसके साथ-साथ दोनों देशों में तनाव भी लगातार बना रहा है। यह तनाव वर्ष 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के खूनी विवाद में बदल गया, जिसमें दोनों देशों के दर्जनों सैनिक मारे गए थे। उसके बाद अब तक आपसी संबंध सामान्य की भांति नहीं हो सके। चाहे इसके बाद दोनों देशों के बड़े और छोटे नेता आपसी दौरे ज़रूर करते रहे। इससे पहले भूटान की सीमा पर दोनों देशों के सैनिक 2 माह तक आमने-सामने खड़े रहे थे। गलवान के घटनाक्रम के बाद भारत ने पूरी दृढ़ता और दलेरी से सीमाओं पर चीनी सैनिकों के सामने डट कर खड़े होने की हिम्मत दिखाई थी। गलवान की घटना के बाद अब तक दोनों देशों में उच्च सैन्य स्तर पर दर्जनों ही बैठकें होती रही हैं, जिसके क्रम स्वरूप ही विगत दिवस अरुणाचल प्रदेश सैक्टर में नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों के कमांडरों में वाचाकमाई सीमांत स्थान पर बैठक हुई और दोनों ने ही शांति और स्थिरता बनाए रखने संबंधी चर्चा की। इससे पहले यह भी समाचार मिलते रहे हैं कि अरुणाचल प्रदेश के सीमांत क्षेत्रों में चीनी सैनिकों ने हमलावर रवैया धारण किया हुआ है और वे भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने का यत्न कर रहे हैं। अब कोर कमांडरों की बैठक से पहले 25 अगस्त को बीजिंग में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच बातचीत हुई है। विगत दिवस पूर्व चीफ ऑफ डिफैंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने एक समारोह में सम्बोधित करते हुए भारत और चीन को एशिया की दो बड़ी ताकतें, बड़ी आर्थिकता और वर्षों पुरानी सभ्यताओं वाले देश कहा था। इसके साथ ही उन्होंने एशिया के भविष्य को इन दोनों देशों के आपसी संबंधों से जोड़ा था।
नि:संदेह आज चीन और भारत अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर दो बड़ी ताकतों के रूप में उभर रहे हैं, परन्तु चीन की विस्तारवादी नीति के कारण भारत हमेशा इसे संदेह की नज़र से ही देखता रहा है। चीन का ऐसा रवैया सिर्फ भारत के साथ ही नहीं, अपितु जापान और दक्षिण चीन सागर में अपने दर्जनों ही पड़ोसी देशों के प्रति भी बना रहा है। चीन अनुपातन इन छोटे देशों के मुकाबले में समुद्र पर अधिक से अधिक अधिकार जताता रहा है, जो अन्य देशों के लिए ़खतरे की घंटी की तरह है। अन्तर्राष्ट्रीय जहाज़ मार्गों पर भी अधिक से अधिक अपना अधिकार जताने की चीन की नीति के कारण आस्ट्रेलिया और यूरोप के ज्यादातर देश भी उसे संदेह की नज़रों से देखते रहे हैं। ऐसी विस्तारवादी नीति किसी समय बड़े टकराव को भी जन्म दे सकती है। चीन ने भारत के पड़ोसी देशों पर भी अपना आर्थिक प्रभाव बनाने की नीति जारी रखी हुई है, जिससे भारत की आशंकाओं में वृद्धि होती रही है। दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन इन आशंकाओं को कितनी सीमा तक दूर कर सकेगा और विश्व के लिए क्या संदेश लेकर आएगा, अब यह देखना शेष होगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

