विकास दर संबंधी अविश्वास क्यों ?
एक अच्छी बात ये हुई कि प्रधानमंत्री ने ये तो माना कि हिंदुस्तान का विपक्ष उनके घर के ही लोग हैं, दुश्मन नहीं। दिल्ली के श्री राम कालेज में प्रधानमंत्री ने ‘नाराज़ फूफा’ का जिक्र किया। उनके कहने का आशय था कि जैसे घर परिवार में फूफा लोग होते हैं, जो हमेशा नाराज़ रहते हैं, वैसे ही देश में कुछ ऐसे लोग हैं जो कभी खुश नहीं हो सकते, वे हमेशा नाराज़ रहते हैं। उनका कहने का अर्थ था कि देश की अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की गति से कुलांचें मार रही है और कुछ लोग उससे भी खुश नहीं हैं, वो मीन मेख निकाल रहे हैं।
दरअसल जब से अप्रैल और जून की तिमाही में जीडीपी के आंकड़े आये हैं, एक बहस शुरू हो गई है कि ये आंकड़े देश की अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर पेश नहीं करते। ये भी कहने की कोशिश की गई कि असली जीडीपी 7.8 प्रतिशत से कम है, और जो आंकड़े बताये जा रहे हैं वो हकीकत नहीं हैं। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने सत्य हिंदी को बताया था कि जो आंकड़े सरकार ने पेश किये हैं उसके हिसाब से असली जीडीपी ज़ीरो प्रतिशत भी हो सकती है। हालांकि उन्होंने ये सफाई भी दी कि मैं सरकारी आंकड़ों की बात कर रहा हूँ, उससे जो हिसाब बनता है, वो ज़ीरो दिखता है। उनका दावा है कि असली जीडीपी 4 या 5 प्रतिशत हो सकती है।
सुभाष गर्ग मोदी सरकार में वित्त सचिव थे। बाद में उन्होंने वीआरएस ले लिया और फिर उन्होंने कई किताबें लिखीं। उनके समर्थन में आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन बोले कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी ही अच्छी है तो वो जमीन पर दिखती क्यों नहीं है। लोग खुश क्यों नहीं हैं? बेरोज़गारी क्यों बढ़ रही है? निजी निवेश क्यों नहीं आ रहा है? भारत सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके कौशिक बसु भी काफी हद तक गर्ग की राय से इत्तेफाक रखते हैं। भारत के पहले मुख्य सांख्यिकीय अधिकारी प्रनब सेन भी कमोबेश मानते हैं कि जीडीपी के आंकड़े देश की असली तस्वीर नहीं पेश कर रहे हैं और गर्ग से सहमत दिखते हैं। मोदी सरकार के आने के बाद से जीडीपी की गणना करने के तरीके में कई बार बदलाव किया गया है। भारत सरकार के दिये विकास के आंकड़ों पर पहले भी सवाल उठ चुक हैं। मोदी सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविन्द सुब्रमण्यम भी कह चुके हैं कि आंकड़ों को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। जितना सरकार बताती है, उतना है नहीं।
सुब्रमण्यम ने 7 सितम्बर के इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि सवाल जीडीपी का नहीं बल्कि सरकार पर भरोसे का है। उनका मानना है कि 2016-17 में जब नोटबंदी की गई थी तब से भारतीय आंकड़ों पर सवाल खड़े होने लगे हैं। उनका कहना है कि जब 86 प्रतिशत करंसी को बाज़ार से निकाल दिया गया था तब कौन इस बात पर विश्वास करेगा कि जीडीपी 8.2 प्रतिशत की गति से भाग रही है। उनकी बात में दम है।
पिछले कई सालों से देश में बेरोज़गारी सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। इंडिया टुडे के हालिया सर्वे में 65 प्रतिशत लोगों ने माना है कि पिछले साल की तुलना में उनका घर चलाना मुश्किल हो रहा है। सामान्य चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, डॉलर के मुकाबले रुपया सौ पार करने के लिये बेताब हो रहा है, पेट्रोल डीज़ल के दाम सौ रुपये से अधिक हैं। विदेशी निवेश देश में तेज़ी से आ नहीं रहा है। एक्सपोर्ट में प्रगति दिखाई नहीं पड़ती ऐसे में सरकार ये कहे कि सबकुछ चंगा है तो कौन यकीन करेगा।
सरकार जब इस बात से नाराज़ है कि लोग जीडीपी पर विश्वास क्यों नहीं कर रहे हैं तो वो ये सवाल खुद से क्यों नहीं पूछती कि ये विश्वास का संकट क्यों है? क्यों हजारों की संख्या में युवा जंतर मंतर पर इकट्ठा हुये? क्यों झारखंड में छात्रों ने आंदोलन किया? क्यों सरकारी विभागों में लाखों पद रिक्त पड़े हैं और सरकार उनको भर नहीं रही है। एक के बाद एक प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर क्यों लीक हो रहे हैं और जब युवा सड़क पर उतरता है तो उस पर अमानवीय तरह से लाठीचार्ज किया जाता है? सरकार में बैठे लोग और उनके समर्थक क्यों युवाओं को देश विरोधी, आतंकवादी और दिमागी नक्सल बताने की जुर्रत करते हैं?
लोग ये सवाल तो करेंगे कि जब सरकार अपने बारह साल के कार्यकाल में सबसे बड़े संकट से जूझ रही है, सब तरफ निराशा का माहौल है तब अचानक अर्थव्यवस्था इतनी रफ़्तार से कैसे भाग रही है? क्या ये हेडलाइन मैनेजमेंट है या फिर फील गुड फैक्टर बता कर के नया नैरेटिव खींचने की कोशिश है? लोग कैसे सरकार पर भरोसा करें जब प्रधानमंत्री खुद कह रहे हैं कि सोना मत खरीदो, विदेश यात्रा पर मत जाओ, विदेशों में शादी मत करो। ये अच्छी अर्थव्यवस्था का प्रमाण तो नहीं है।
एक तरफ ईरान युद्द है जिसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल के संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था में हाहाकार मचा है। दूसरी तरह अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सिरफिरेपन के कारण दुनिया टैरिफ वार में घिरी हुई है। दोनों की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी संकट के बादल छाये हैं। यूक्रेन युद्ध ने भी काफी बवाल मचा रखा है। तो फिर कैसे लोग मानें कि आंकड़े सच्चे हैं? फिर इस सवाल का जवाब सरकार क्यों नहीं देती कि जीडीपी के आंकड़े आने के बाद से स्टाक मार्केट फ्लैट क्यों है? उसमें उत्साह क्यों नहीं है?
प्रधानमंत्री जी शायद ये भूल गये हैं कि मुख्य न्यायाधीश महोदय ने जब बेरोज़गार युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहा था तो देश में उबाल आ गया था। सरकार को अपने मंत्री का इस्तीफा लेना पड़ा था। कहीं ऐसा न हो कि अब प्रधानमंत्री जी को सरकार से प्रश्न पूछने वालों का यूं मजाक उड़ाना महंगा पड़ जाये वैसे भी ये प्रधानमंत्री की आदत में है कि वो कभी विरोध करने वालों को ‘खान मार्केट गैंग’ कहते हैं तो कभी ‘आंदोलन जीवी’ तो कभी ‘अर्बन नक्सल’। पिछले दिनों लाल किले की प्राचीर से नया नाम दे दिया ‘दिमागी नक्सल’। इन सब में मुझे ये ‘नाराज़ फूफा’ सबसे प्यारा लगता है। इसमें प्रधानमंत्री के हृदय परिवर्तन का सबूत है कि अब वो विरोध करने वालों को, असहमति की आवाजों को देश विरोधी नहीं कह रहे जैसा कि आरएसएस और सरकार के कुछ लोगों ने कहा।



