विकसित भारत : मंज़िल तक कैसे पहुंचेगा देश ?

किसी देश के भविष्य के बारे में बात करते हुए उसके सामने कोई बड़ा लक्ष्य रख देना आसान है, लेकिन यह समझ पाना मुश्किल होता है कि ऐसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश ने अब तक कितनी तैयारी की है और जिस रास्ते पर वह चल रहा है। वह वास्तव में उसे वहां ले भी जाएगा या नहीं? भारत के सामने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य है, यानी आज़ादी के सौ साल पूरे होने तक भारत को उस स्थिति में पहुंचाना है, जहां उसकी अर्थव्यवस्था बड़ी और मज़बूत हो, नागरिकों का जीवन बेहतर हो और देश दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी निर्णायक जगह बना चुका हो। विकसित भारत का लक्ष्य सुनने में जितना आकर्षक है, उसकी गंभीरता उतनी ही अधिक है। आखिर विकसित राष्ट्र होना केवल इतना नहीं है कि जीडीपी का आकार बढ़ जाए या देश दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आ जाए। बड़ा सवाल यह है कि अगर ऐसा कोई आर्थिक विस्तार होता है तो उसका असर देश के सामान्य नागरिक के जीवन पर कितना पड़ेगा, इसी सवाल के उत्तर में विकसित भारत की चर्चा को केवल राजनीतिक नारे या सरकारी उपलब्धियों की सूची से अलग करके देखने की ज़रूरत महसूस होती है।
विगत 10-12 सालों में देश में कई सार्थक बदलाव हुए हैं। डिजिटल तकनीक का विस्तार इसका सबसे दिखाई देने वाला उदाहरण है। जिस देश में कभी बैंक खाता, पहचान और सरकारी सुविधा तक पहुंच अपने आप में बड़ी समस्या हुआ करती थी, वहां डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे ने करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन को किस प्रकार बदल दिया है, यह हमारे सामने है। सड़कों, रेल मार्गों, बंदरगाहों और हवाई अड्डों के निर्माण की गति भी तीव्र हुई है। रक्षा उत्पादन में घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश हुई है। ऊर्जा के क्षेत्र में नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण बदलाव उस सोच का है जिसमें भारत को केवल एक बड़े बाज़ार के रूप में देखने के बजाय उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की कोशिश दिखाई देती है। 
यह बदलाव साधारण नहीं है। आज़ादी के बाद लंबे समय तक भारत की आर्थिक बहस में कृषि का संकट और फिर सर्विस सेक्टर की सफलता प्रमुख विषय रहे। उत्पादन क्षेत्र अपेक्षित मज़बूती से नहीं उभर पाया। चीन की आर्थिक सफलता महत्वपूर्ण है, इसमें हम देख सकते हैं कि बड़े पैमाने पर रोज़गार और औद्योगिक क्षमता पैदा किए बिना किसी विशाल आबादी वाले देश को ऊंची आय वाले समाज में बदलना कठिन है। इसलिए सेमीकंडक्टर से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, परमाणु ऊर्जा और अन्य बुनियादी औद्योगिक क्षमताओं में निवेश को केवल कुछ नई फैक्ट्रियों तक सीमित मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे एक बड़े आर्थिक बदलाव की आवश्यकता है। यह आवश्यक है कि देश अपने लिए ज़रूरी चीज़ें बनाने की क्षमता विकसित करे, वैश्विक उत्पादन श्रृंखलाओं में जगह बनाए और ऐसा औद्योगिक ढांचा खड़ा करे जो आने वाले दशकों में लाखों लोगों के लिए अवसर पैदा कर सके।
 विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए तो यह अपरिहार्य है। जब हम विकसित भारत की बात करते हैं तो हमें ऊर्जा को महत्व देकर देखना चाहिए। ज़ाहिर है औद्योगीकरण होगा तो ऊर्जा चाहिए। शहर बढ़ेंगे तो बिजली चाहिए। रेलगाड़ियों को बिजली से चलाने आदि में ट्रांसपोर्ट सिस्टम बदलेगा तो ऊर्जा की दरकार बढ़ेगी। इसलिए परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा और अन्य स्रोतों पर एक साथ विचार करना पड़ेगा। एल्युमिनियम, स्टील जैसी बुनियादी धातुओं और दूसरे औद्योगिक कच्चे माल की क्षमता बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है।
नि:संदेह देश को विकसित बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत काम करना पड़ेगा। भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी बहुत कम है। चीन और विकसित एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ तुलना करें तो यह अंतर साफ  दिखाई देता है। प्रति व्यक्ति आय का यह अंतर कई समस्याओं की जड़ है। हम 2047 तक भारत को विकसित बनाने के लक्ष्य पर एकजुट हो कर काम करें, यह सही है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी तो सोचना होगा कि आर्थिक विकास के प्रकाश को उस बिंदु तक कैसे ले जाया जाए जहां उसकी रोशनी समाज के उन अंधकार भरे हिस्सों तक भी पहुंचे, जो आज उससे पूरी तरह लाभान्वित नहीं हो रहे हैं। इसमें दो राय नहीं है कि देश में गरीबी कम हुई है, लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी है, उपभोग का बाज़ार फैला है। यह परिवर्तन वास्तविक है लेकिन दूसरी तरफ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और स्वच्छता जैसे क्षेत्र हैं, जहां अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। अगर एक परिवार की आय बढ़ जाए लेकिन उसके बच्चे को अच्छी शिक्षा न मिले, उसके पास मोबाइल और इंटरनेट हो लेकिन गंभीर बीमारी के इलाज के लिए उसे ज़मीन बेचनी पड़े तो क्या हम इसे विकसित समाज कहेंगे? इसलिए विकसित भारत का सवाल सिर्फ अर्थव्यवस्था का प्रश्न नहीं है, यह हमारे लिए सामाजिक जीवन का सवाल भी है।
देश में जब बेरोज़गारी की बात करते हैं तो रोज़गार का प्रश्न सबसे ज्यादा असहज करने वाला होता है। भारत उन देशों में है, जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। अगर इस युवा आबादी को लाभ के स्रोत में परिवर्तित करना है तो उसके लिए शिक्षा चाहिए, कौशल चाहिए और ऐसे रोज़गार चाहिए जिनसे व्यक्ति अपने जीवन को आगे ले जा सके। अगर उद्योग बढ़ता है लेकिन रोज़गार पर्याप्त मात्रा नहीं बढ़ता तो विकास की तस्वीर अधूरी रह जाती है। (एजेंसी)

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