भारत के लिए चिंताजनक है दक्षिण एशिया युद्ध

6 मास पहले अमरीका ने इज़रायल के साथ मिल कर ईरान पर हमला किया था, जिसमें ईरान के उच्च कोटि के नेता और जरनैल मारे गए थे। उसके बाद शुरू हुए युद्ध में ईरान ने पश्चिम एशिया के खाड़ी देशों में स्थापित अमरीकी अड्डों को निशाना बनाया था। विगत लम्बी अवधि से संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन, जार्डन और कतर ने अपनी सुरक्षा के लिए अपने देशों में अमरीकी सेना के अड्डे स्थापित किए हुए थे। युद्ध शुरू होने पर ईरान की ओर से इन देशों पर किए मिसाइली हमलों में तेल से भरपूर इस धरती को बड़ा श्राप लगा दिखाई देता है। अमरीका भी प्रभावशाली ढंग से इन देशों पर होते हमलों को रोकने में असमर्थ रहा है, जिस कारण इनका बड़ी सीमा तक तेल का व्यापार कम हुआ है। इन देशों के लिए तो यह चिंताजनक बात है ही परन्तु भारत और अन्य उन देशों पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा है, जो खाड़ी देशों से कच्चा तेल मंगवाते रहे हैं।
अब तक भारत ने रूस सहित अन्य तेल निर्यात करने वाले देशों से अच्छी योजनाबंदी करके देश में इसकी ज्यादा कमी नहीं आने दी और न ही युद्ध के दौरान तेल की कीमतों में कोई बड़ी और असहनीय वृद्धि की है, परन्तु यदि यह युद्ध एक सीमित समय में खत्म नहीं होता तो इसका प्रभाव निश्चित रूप से भारत पर भी ज़रूर पड़ेगा, जो इसकी मुश्किलों में वृद्धि करेगा। भारत को एक और बड़ा नुकसान यह हुआ है कि इसने अ़फगानिस्तान और केन्द्रीय एशिया के देशों से सम्पर्क बनाने के लिए ईरान की चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए बड़ी आर्थिक सहायता दी थी। पाकिस्तान द्वारा सड़क मार्ग बंद होने के कारण समुद्र के ज़रिये ईरान की इस बंदरगाह तक पहुंच से वहां अ़फगानिस्तान और अन्य केन्द्रीय एशिया के दर्जनों देशों के साथ भारत का व्यापारिक और अन्य प्रत्येक तरह का अच्छा सम्पर्क बन सकता था। जहां अमरीकी बमबारी ने इस बंदरगाह को तबाह कर दिया है, वहीं युद्ध में व्यस्त होने के कारण ईरान के लिए अभी ऐसी कोई योजनाबंदी कर पाना भी बेहद कठिन दिखाई देता है। इस समय में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच मक्का समझौता होना भी एक तरह से भारत के लिए चुनौती बना दिखाई देता है। यदि अरब देश अमरीका का सहारा लेने के स्थान पर मक्का समझौते की तज़र् पर आपस में एकजुट होकर अपना कोई और बड़ा संगठन बनाते हैं और इसमें पाकिस्तान की भी भागीदारी रहती है, तो भारत को इससे और भी सुचेत होने की ज़रूरत होगी। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रतिदिन नई-नई योजनाएं बनाकर अपने बयान बदलते रहते हैं, परन्तु इस युद्ध के लम्बा होने के कारण उनमें भी बड़ी घबराहट दिखाई दे रही है। उनके सहयोगी इज़रायल के प्रधानमंत्री बैंजामिन नेतन्याहू के सामने वहां अक्तूबर मास में हो रहे चुनाव खड़े हैं और इसी तरह अमरीका में इसी वर्ष नवम्बर मास में 2 वर्ष बाद होते समकालीन चुनाव को लेकर भी ट्रम्प प्रशासन द्वारा घबराहट महसूस की जा रही है। 
ईरान के भी आंतरिक हालात बुरी तरह डावांडोल हो चुके हैं। वहां बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी के साथ-साथ देश के मूलभूत ढांचे का भी भारी नुकसान हो चुका है। यदि ईरान ने होर्मुज़ जलडमरू द्वारा अंतर्राष्ट्रीय जहाज़ों के व्यापारिक आवागमन पर प्रतिबंध लगाए रखा और अमरीका ने भी इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उसकी नाकाबंदी करके उसके तेल कारोबार को इसी तरह ठप्प करके रखा तो हालात और भी खराब हो सकते हैं। युद्ध से पहले ईरान में इस्लामिक शासन के विरुद्ध बड़ी बगावतें हुई थीं, जिन्हें उस समय ईरानी सेना ने हज़ारों लोगों को निशाना बना कर कुचलने का यत्न किया था। यदि हालात ऐसे ही बने रहते हैं तो देश में ऐसी बगावत के फिर उठने की संभावना बन सकती हैं। इसलिए ईरान को भी कोई मार्ग ढूंढ कर इस युद्ध से बाहर निकलने की ज़रूरत होगी। भारत को भी ऐसी स्थिति पैदा करने के लिए अपने प्रभाव को इस्तेमाल करने से गुरेज़ नहीं करना चाहिए।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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