नारोवाल मंदिर का विवाद और मेरा पाकिस्तान दौरा
विगत दस दिनों से नारनोल ज़िले (पाकिस्तान) के गांव समाज का सौ वर्ष पुराना मंदिर चर्चा का विषय बना हुआ है। लाहौर से 130 किलोमीटर दूर 1,000 वर्ग मीटर में बने इस मंदिर को गिराना एक बड़ा विवाद बन चुका है। इसके लिए कोई कट्टरपंथियों को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है और कोई भारी बारिश को। यह भी कहा जा रहा है कि इस मंदिर की ज़मीन लीज़ पर दी गई थी, जो इसे गिराने की वजह बनी। मामला कुछ भी हो, इस विवाद ने मुझे अप्रैल 1998 में मेरे पाकिस्तान दौरे की याद दिला दी है। मेरी पत्नी भी मेरे साथ थीं। हमें पाकिस्तान ले जाने वाले कर्नल प्रताप सिंह गिल थे। उन्होंने ‘हिन्द-पाक मिलाप’ नामक ट्रस्ट बनाया था। हमारे 12-15 सदस्यों के जत्थे में पानीपत वाले निरंजन सिंह भी थे और कार सेवा को समर्पित गुरमिंदर सिंह भी।
निरंजन सिंह ने देश के विभाजन के बाद मुसलमान बन कर उस तरफ रह गई अपनी बहन को मिलना था और गुरमिंदर सिंह ने अपनी मां को जो मुसलमान होने के नाते स्वयं तो सीमा पार कर गई थी, लेकिन छह साल के गुरमिंदर (असली नाम अमानत उल्ला) उनसे बिछड़ गए थे। मेरे ज़िम्मे एक को उसकी बहन से मिलाना था और दूसरे को उसकी मां से। हमारे पास नवाज़ शरीफ की कारें थीं और कुरान शरीफ की तीन जिलदें हमने बाज़ार से खरीद ली थीं। उनमें से एक निरंजन सिंह की बहन के लिए थी। यह दिखाने के लिए कि हमें उनके मुसलमान होने से कोई दिक्कत नहीं है।
छह वर्ष के गुरमिंदर उर्फ अमानत का किसी जाट सिख परिवार ने पालन-पोषण किया था। निरंजन सिंह की बहन एक मुसलमान घर में बस चुकी थी। मैं एक बात कभी नहीं भूलूंगा। मैं और मेरी पत्नी महाराजा रणजीत सिंह के किले के पास एक बेंच पर बैठे थे तो 10-12 मुस्लिम महिलाएं, जिन्होंने बुर्के पहने हुए थे, हमारी ओर बढ़ी और मेरी पत्नी से कहने लगीं कि उनका 9-10 वर्ष का बच्चा हमारे साथ तस्वीर खिंचवाना चाहता है। हमारे सहमत होने पर बच्चा हमारे घुटनों के बीच आ गया। उसके आते ही सभी मुस्लिम महिलाएं हमारे पीछे खड़ी हो गईं।
बात ‘सुरति’ पत्रिका की
‘सुरति’ पंजाबी साहित्य, कला, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों की बहु-परतीय रंगत को अपने भीतर समेटने वाली नई पत्रिका है। इसके पन्नों में दर्ज रचनाएं केवल पाठक का मनोरंजन ही नहीं करती, बल्कि उसकी चेतना को झकझोरती हैं और सोच को एक नई दिशा देती हैं। इस पत्रिका की सम्पादकीय, मुलाकात, कविता, कहानी, ़गज़ल, लेख, फोटोग्राफी और कला संबंधी लिखितें साहित्य की विविधता और विशालता को दिखाती हैं। ‘सुरति’ की विलक्षणता इस बात में भी है कि यह परम्परा की जड़ों से जुड़ी रहने के साथ समकालीन जीवन की धड़कनों को भी पूरी संवेदनशीलता के साथ पेश करती है। यहां शब्द सिर्फ विचारों व्यक्त करने का ज़रिया नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदना और चेतना के वाहक भी बनते हैं। इस पक्ष से ‘सुरति’ मात्र एक साहित्यिक पत्रिका नहीं है, बल्कि अपने समय की रचनात्मक, सांस्कृतिक और इंसानी चेतना का दस्तावेज़ है। इसके लिए पाकिस्तान में प्रकाशित हो रहे वर्तमान साहित्य से साझ डालना भी सम्भव है। मुबारकां!
‘मंतव’ पत्रिका का सितम्बर-दिसम्बर अंक
नई पंजाब पत्रिकाओं में ‘मंतव’ भी ‘सुरती’ जितना ही ध्यान आकर्षित करती है। ‘सुरति’ की पुस्तक लड़ी 5 मेरे हाथ में है। ‘सुरति’ ने डॉ. सरदारा सिंह जौहल की प्रशंसा की है, तो ‘मंतव’ ने चित्रकार देव की। बात जौहल साहिब से शुरू करते हैं। प्रोफैसर बिशन सिंह समुंद्री जब आनंदपुर साहिब की पवित्र धरती पर जौहल साहिब से मिले तो उन्होंने सरदारा सिंह को बिना पगड़ी देखा और उनसे कहा, ‘तुम आनंदपुर साहिब में हो, गुरु गोबिंद सिंह की नगरी में। आज से बालों कैंची से मत लगाना और सिर से पगड़ी मत उतारना।’ इस आदेश का असर ही था कि सरदारा सिंह ने उसके बाद अपने केश नहीं कटवाए और पगड़ी पहनना शुरू कर दिया जिसके बारे में जौहल साहिब का मानना है कि पगड़ी ने मुझे बहुत सम्मान दिया है। यह पगड़ी अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों और कॉन्फ्रैंसों में सबका ध्यान आकर्षित करती रही और मेरी एक अलग पहचान करवाती रही।
जहां तक ‘मंतव’ के देव का संबंध है तो पत्रिका के सम्पादक विशाल अपने शब्दों में खूब अच्छे से व्यक्त किया है। ‘देव एक इन्सान का नाम नहीं, बल्कि एक पूरी सदी का नाम है। वो धरती छोड़कर आसमान की तरफ उड़ गया था, लेकिन उड़ते हुए उसे पता चला कि पंख जड़ों का विकल्प नहीं होते। वह पंजाब और यूरोप के बीच नहीं, अपने अतीत और अपने बनाए हुए मैं के बीच लटका हुआ एक उड़ता पेड़ है, लेकिन अमरजीत ग्रेवाल का नाटक ‘उड़ता रुख’ जड़ों की ओर लौटने की कहानी भी नहीं। देव का सफर उड़ान से लौटने का नहीं, बल्कि उड़ान के अंदर ही नई जड़ें बनाने का सफर है।
अमरजीत ग्रेवाल के नाटक में देव के शब्दों में आत्म-विलाप है—पंजाब से यूरोप आया ताकि महान बन सकूं। मैंने अपनी मिट्टी बेची ताकि रंग खरीद सकूं।
अमरजीत ग्रेवाल के नाटक में देव का मन बोलता भी है :
मैं कौण हां?
मैं कोण बन गया हां?
ओह मुंडा जो पिंड विच मिट्टी नाल खेडदा सी
मर गिया....
मैं उसनूं मार दित्ता.....
हर कदम ’ते
मैं आपने आप दा इक टुकड़ा छड्डदा गिया
इक हिस्सा पिंड विच
एक हिस्सा मां की गोद विच
इक हिस्सा रीमा की अक्थां विच
इक हिस्सा अमन दी हासी विच...
अते हुण...
हुण की बचिया?
एक नाम?
इक पछान जो झूठी है?
पेंटिंगा जो मशहूर हन
पर ओह झूठ बोलदीयां हन..
ते फेर उसदी मां ही बोल पैंदी है
जदों तूं छोटी सी
मैं तैनूं छाती नाल ला के सौंदी सी
हुण मैं चली जा रही हां
ते तूं दूर किते-
पता नहीं
यह उस मां के शब्द हैं, जिसे नाटककार अंतिम श्वास लेते हुए दिखाता है। बेटा दूर कहीं समुद्र से पार अपनी पेंटिंग बनाने तथा कविता लिखने में व्यस्त है। अंत में वह देव जो 2025 के दिसम्बर में अपनी किताबों के रैक के नीचे दबा हुआ मिलता है।

