भयावह आपदाओं से बचना है तो हिमालय को समग्रता से पढ़ना होगा
नेपाल-चीन सीमा पर आयी विनाशकारी बाढ़ ने इस वर्ष के हिमालय दिवस का अर्थ कहीं अधिक गंभीर बना दिया है। सामान्यत: यह अवसर कभी हिमालय की सुंदरता, जैव-विविधता और नदियों के महत्व को याद करने तक अथवा पर्यावरणीय विसंगतियों को रेखांकित करने तक ही सीमित रहता था, पर अब इस दिन पर्वत-श्रृंखला के इन विषयों के साथ साथ इसको लगातार बदलती हुई भूगर्भीय, जलवैज्ञानिक और जलवायवीय प्रणाली के रूप में गंभीरता से समझना होगा। संयुक्त राष्ट्र ने भी हाल की आपदा को बदलते हिमालय के जोखिमों की चेतावनी माना है। सरकार ने भी क्षेत्र के सभी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी करने के निर्देश दिए हैं, परन्तु संकट केवल ग्लेशियर या उससे बनी झीलों से ही संबंधित नहीं है। समूचा हिमालय खतरे में है। हिमालय युवा और भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत-तंत्र है। यहां चट्टानों का टूटना, भूस्खलन, हिमस्खलन, ग्लेशियरों का सिकुड़ना, पर्माफ्रॉस्ट (जमी बर्फ की तह), ग्लेशियल झीलों का विस्तार और अत्यधिक वर्षा जैसी प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं। 2021 की चमोली आपदा इसका उदाहरण था। वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक जांच में इसे केवल ‘ग्लेशियर फटने’ के बजाय चट्टान, बर्फ और मलबे की जटिल श्रृंखला से जुड़ी घटना माना था। उस समय भी विशेषज्ञों का आग्रह था कि हिमालय में किसी बड़ी आपदा के बाद उसके कारण तलाशने से अधिक महत्वपूर्ण है पहाड़ के भीतर चल रहे बदलावों की लगातार निगरानी करना। निगरानी से मिले संकेतों को समझना।
हिमालय के तेजी से गर्म होने के चलते खतरा बढ़ता जा रहा है अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र की हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि हिन्दू कुश हिमालय में ग्लेशियरों के बर्फ-हानि की दर 2000 के बाद लगभग दोगुनी हो गई है, कुछ स्थानों पर बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी हुई है। अलग-अलग आधिकारिक वैज्ञानिक स्रोतों के अनुसार देश में कम-से-कम 9,775 से लेकर लगभग 35,000 ग्लेशियर हैं। सेंट्रल वॉटर कमीशन 902 ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की निगरानी करता है, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जिओलॉजी 13 ग्लेशियरों की और नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च 6 ग्लेशियरों की निगरानी करता है। जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और अन्य संस्थान कुछ चयनित ग्लेशियरों पर माप और मास-संतुलन अध्ययन करते हैं। फिर भी निगरानी बहुत असमान और अपर्याप्त है। कुछ ही हैं जो विश्व ग्लेशियर निगरानी सेवा के मानकों को पूरा करते हैं। इन ग्लेशियरों को सेंसर से जोड़कर संभावित आपदा की चौबीसों घंटे चेतावनी देने वाला नेटवर्क अभी तक बहुत प्रभावी नहीं है। सच तो यह है कि निगरानी केवल ग्लेशियर की नहीं होनी चाहिए। उसके दायरे में बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट उनसे लगी ढलान, ग्लेशियर निर्मित झील एवं नदी का संपर्क, वर्षा के अलावा संबंधित क्षेत्र में मानव निर्माण इत्यादि सब होने चाहिए।
पर्माफ्रॉस्ट विशेष रूप से उपेक्षित क्षेत्र है। इसी साल अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) ने बताया कि तिब्बती पठार के बाहर पूरे हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में अभी व्यवस्थित पर्माफ्रॉस्ट अवलोकन प्रणाली नहीं है। गर्म होती पर्वतीय भूमि में यह कमी भविष्य के भूस्खलन और अवसंरचनात्मक जोखिमों को समझने में बड़ी बाधा है। पर यह सुखद है कि सरकार ने आईआईटी, वाडिया संस्थान, स्नो एंड एवलांच स्टडी एस्टैब्लिशमेंट तथा अन्य संस्थानों के सहयोग से उपग्रह आधारित ग्लेशियर मानचित्रण, राष्ट्रीय ग्लेशियर इन्वेंटरी, चयनित ग्लेशियरों का मास-संतुलन अध्ययन और विभिन्न संस्थानों के माध्यम से क्रायोस्फि यर अनुसंधान को आगे बढ़ाया है। वह उपग्रह आधारित वास्तविक समय निगरानी को प्रारंभिक बाढ़ चेतावनी से जोड़ने की भी कोशिश में है। ‘मैनुअल ऑब्जर्वेशन’ से ऑटोमेटेड रियल-टाइम मॉनिटरिंग की ओर बढ़ना बेहतर बदलाव ला सकता है। वाडिया इंस्टीट्यूट ने 2025 में द्रोणागिरी और बांगीनी ग्लेशियरों में स्वचालित मौसम केंद्र तथा जल-स्तर और जल-वेग मापक लगाए वे तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा, सौर विकिरण, जल-स्तर और प्रवाह की लगातार जानकारी देते हैं। ऐसे नेटवर्क से ग्लेशियर के द्रव्यमान-संतुलन, जल-प्रवाह के जोखिम को समझना आसान होगा। इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित करने की ज़रूरत है। सरकार राष्ट्रीय हिमालय क्रायोस्फियर निगरानी मिशन की शुरुआत करना होगा, जिसका पहला ज़रूरी कदम तो यह होना चाहिए कि सभी महत्वपूर्ण ग्लेशियर और हिमनदीय झीलों का नए सिरे से एक गतिशील डिजिटल मानचित्र बने और इसके साथ ही अत्यधिक जोखिम वाली झीलों पर हर क्षण चौकस रहने वाले सेंसर लगें। हर नदी बेसिन का ‘डिजिटल ट्विन’ तैयार किया जाए।
नि:संदेह एआई आधारित खतरा-पूर्वानुमान विकसित किया जाना और राज्यों तथा केंद्र की चेतावनी प्रणालियां एकीकृत करना भी अनिवार्य है, तो नेपाल, भूटान और जहां तक संभव हो चीन के साथ वास्तविक समय डेटा साझा किए जाने की व्यवस्था भी। इन सबके अलावा बेहतर यह भी होगा कि समय समय पर हर संवेदनशील घाटी के लिए स्थानीय निकासी-अभ्यास करवाया जाए। आईसीआईएमओडी की 2026 क्षेत्रीय रणनीति भी इसी दिशा में मानकीकृत निगरानी, साझा डेटा प्लेटफॉर्म, क्षमता निर्माण और जल-ऊर्जा तथा आपदा प्रबंधन के लिए यही सब सुझाती है। सेंथेटिक अपरचर रडार वाले उपग्रह रात और बादल घिरे आकाश के बावजूद हिमनदीय झीलों के क्षेत्रफल और उसके बदलाव को लगभग छह दिन के अंतराल पर दिखा सकते है। संदिग्ध ग्लेशियर, चट्टान या झील की उच्च-रिजॉल्यूशन त्रि-आयामी तस्वीर कुछ घंटों में तैयार की जा सकती है, इन चित्रों से स्वचालित रूप से ग्लेशियर की सीमा, साफ बर्फ और मलबे से ढके ग्लेशियरों की पहचान की जा सकती है। इसके अलावा अति संवेदनशील जमीनी सेंसर स्वचालित मौसम केंद्र, जल-स्तर मापक, भूकंपीय सेंसर, जीपीएस, रॉक-वॉल मूवमेंट सेंसर और पर्माफ्रॉस्ट तापमान सेंसर उन संकेतों को पकड़ सकते हैं, जिन्हें उपग्रह नहीं पकड़ पाता। मौसम, बर्फ, ग्लेशियर, नदी और भूगर्भीय आंकड़ों को एक साथ डालकर की गई मॉडलिंग जोखिम मानचित्र तैयार कर देगी जो बता सकती है कि ‘कौन-सी झील कितनी खतरनाक है’ पर तकनीक चमत्कार नहीं कर सकती।
इन सबके बावजूद हर ग्लोफ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड या फिर भूस्खलन को पहले से पकड़ लेना, उसकी चेतावनी हर स्तर पर तत्काल भेज पाना संभव नहीं होगा, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उपग्रह, सेंसर और सीमा-पार डेटा साझाकरण से आपदा की तीव्रता और जनहानि को काफी कम ज़रूर किया जा सकता है। हमें हिमालय को रोज़ देखना, मापना, समझना और उसकी चेतावनी सुनना सीखना होगा। यही भविष्य की सबसे सस्ती, मानवीय और विवेकपूर्ण आपदारोधी नीति होगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



