भारतीय सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा है समोसा
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भारतीय गलियों, बाज़ारों, चौपालों और चाय की दुकानों पर यदि किसी नाश्ते की मौजूदगी सबसे सहज दिखाई देती है तो वह है, समोसा। दोस्तों की महफिल हो, बारिश का मौसम, कार्यालय की चाय, सफर का पड़ाव या शादी-विवाह का आयोजन गर्मागर्म समोसा हर जगह अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। 5 सितम्बर को मनाया जाने वाला विश्व समोसा दिवस इसी लोकप्रिय व्यंजन के इतिहास, बदलते स्वरूप और दुनिया भर में बनी पहचान को याद करने का अवसर है। दिलचस्प बात यह है कि समोसे की कहानी भारत से शुरू नहीं होती। इसकी जड़ें ईरान और मध्य एशिया तक जाती हैं। इतिहास में इसका उल्लेख ‘संबूसग’ और इससे मिलते-जुलते नामों से मिलता है। माना जाता है कि मध्यकाल में व्यापारियों, यात्रियों और कारवां के साथ यह व्यंजन ईरान और मध्य एशिया से भारतीय उप-महाद्वीप तक पहुंचा। उस दौर में इसकी भराई में मांस का इस्तेमाल प्रमुखता से किया जाता था। भारत पहुंचने के बाद यहां के शाकाहारी खान-पान, मसालों और स्थानीय स्वाद ने इसे पूरी तरह नया रूप देना शुरू किया।
भारतीय रसोई ने संबूसग को अपने अंदाज़ में ढाला और इसमें आलू, मटर, मसाले तथा विभिन्न सब्ज़ियों की भराई लोकप्रिय होती चली गई। धीरे-धीरे इसका आकार, स्वाद और बनाने का तरीका भी भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप बदलता गया। इसी सांस्कृतिक और पवित्र बदलाव के साथ संबूसग भारतीय जन-जीवन में ‘समोसा’ बनकर रच-बस गया। भारत में समोसे की लोकप्रियता इतनी तेज़ी से बढ़ी कि वह सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा बन गया। चाय और समोसे की जोड़ी आज छोटे कस्बों से लेकर महानगरों के पांच सितारा होटलों सहित संसद भवन तक दिखाई देती है। सड़क किनारे की दुकान से लेकर मिठाई की दुकान, कैंटीन और बड़े रेस्तरां तक समोसे की मौजूदगी आम है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक वर्गों के लोगों की पसंद में समान रूप से शामिल है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों ने भी समोसे को अपने-अपने स्वाद के अनुसार अपनाया है। पारम्परिक आलू-मटर के समोसे के साथ अब पनीर, दाल, मिक्स सब्जियों, सूखे मेवों और अन्य सामग्री से तैयार समोसे भी बाज़ार में मिलते हैं। कुछ स्थानों पर मीठे और आधुनिक प्रयोगों ने भी समोसे को नया रूप दिया है। यानी समोसा केवल अपने मूल स्वरूप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय और पसंद के साथ लगातार बदलता रहा है।
भारत से बाहर भी समोसे के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के कई हिस्सों में यह अलग-अलग नामों और स्थानीय स्वाद के साथ लोकप्रिय है। कहीं इसे संबोसा, कहीं संबुसा, संबुसाक, संबुक्सा तो कहीं अन्य स्थानीय नामों से जाना जाता है। नाम और भरावन भले ही बदल जाएं, लेकिन कुरकुरी बाहरी परत और स्वादिष्ट भरावन इसकी मूल पहचान को कायम रखते हैं। यह उन चुनिंदा व्यंजनों में शामिल है जिसे खाने के लिए किसी खास अवसर या महंगे रेस्तरां की ज़रूरत नहीं पड़ती। सड़क किनारे की छोटी-सी दुकान पर मिलने वाला समोसा भी उतना ही आकर्षण पैदा करता है जितना किसी बड़े प्रतिष्ठान में परोसा जाने वाला समोसा। हालांकि स्वाद के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी ज़रूरी है। सामान्य रूप से तेल में तला गया समोसा कैलोरी और वसा की मात्रा बढ़ा सकता है। इसकी पोषण मात्रा उसके आकार, भरावन और बनाने की विधि पर निर्भर करती है। इसलिए इसका सेवन संतुलित मात्रा में करना बेहतर माना जाता है। बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के साथ अब बेक्ड (सेंका हुआ) तथा कम तेल में तैयार किए जाने वाले समोसे के विकल्प भी लोकप्रिय हो रहे हैं। समोसे की कहानी दरअसल खान-पान के माध्यम से होने वाले सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी है। साधारण दिखने वाला यह लोकप्रिय व्यंजन अपने भीतर इतिहास समेटे हुए है।
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