हर युग में मानवता के मार्गदर्शक भगवान श्रीकृष्ण

आज जन्माष्टमी पर विशेष

भारतीय संस्कृति में भगवान श्रीकृष्ण केवल एक आराध्य देव ही नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक रंग, प्रत्येक संघर्ष और प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य का मार्गदर्शन करने वाले ऐसे महानायक भी हैं, जिनके व्यक्तित्व में बाल-सुलभ चंचलता से लेकर विराट दार्शनिक गंभीरता, प्रेम से लेकर पराक्रम, करुणा से लेकर कूटनीति और भक्ति से लेकर कर्मयोग तक जीवन के असंख्य आयाम समाहित हैं। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला जन्माष्टमी पर्व इसी बहुआयामी व्यक्तित्व के स्मरण और उत्सव का अवसर है। इस वर्ष देशभर में जन्माष्टमी 4 सितम्बर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही है। 
श्रीकृष्ण का बाल्यकाल अनेक अद्भुत लीलाओं से भरा है। पूतना वध, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों का संहार, कालिया नाग का दमन, गोवर्धन पर्वत धारण और गोकुलवासियों की रक्षा जैसे प्रसंग उनके बालरूप में ही असाधारण शक्ति और जन-कल्याण की भावना को रेखांकित करते हैं। कृष्ण की बाल लीलाओं का सबसे मोहक पक्ष उनकी सहज मानवीयता है। गोवर्धन लीला कृष्ण के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण सामाजिक और आध्यात्मिक पक्ष सामने लाती है। इंद्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश देते हुए कृष्ण ने मनुष्य को यह समझाया कि जीवन केवल किसी अदृश्य शक्ति की कृपा पर निर्भर नहीं, बल्कि प्रकृति, श्रम, पशुधन, जल और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी से भी जुड़ा है। कृष्ण का जीवन प्रेम की उस व्यापक अवधारणा को भी सामने रखता है, जिसमें प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि समर्पण, विश्वास और आत्मिक एकत्व है। राधा-कृष्ण का संबंध भारतीय भक्ति परम्परा में लौकिक प्रेम से ऊपर उठकर जीव और परमात्मा के आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक बन गया। वृंदावन की रासलीला को इसी कारण केवल नृत्य और संगीत के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि भक्ति की उस अवस्था के रूप में समझा जाता है, जहां भक्त अपने अहंकार को विसर्जित कर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण करता है। कृष्ण की बांसुरी भी इसी आध्यात्मिक प्रतीकवाद को अभिव्यक्त करती है। जिस प्रकार खाली बांसुरी स्वयं कोई सुर उत्पन्न नहीं करती किन्तु कृष्ण के स्पर्श से मधुर हो उठती है, उसी प्रकार अहंकार से मुक्त मनुष्य भी ईश्वर के हाथों में स्वयं को समर्पित करके जीवन को सार्थक बना सकता है।
श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का दूसरा आयाम उनका सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण है। सुदामा के साथ उनकी मित्रता इसका सबसे मार्मिक उदाहरण है। बचपन के निर्धन मित्र सुदामा जब द्वारका पहुंचे तो कृष्ण ने राजा और मित्र के बीच कोई भेद नहीं किया। उन्होंने सुदामा का जिस आत्मीयता से स्वागत किया, वह भारतीय संस्कृति में मित्रता, समानता और संवेदना का आदर्श बन गया। कृष्ण का संदेश स्पष्ट है कि संबंधों का मूल्य धन, पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि आत्मीयता से तय होता है। उनके जीवन में स्त्री सम्मान का पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराई गई स्त्रियों के संदर्भ में पुराणों में कृष्ण द्वारा उन्हें सामाजिक सम्मान प्रदान करने का प्रसंग मिलता है। इस प्रसंग की आध्यात्मिक व्याख्या यह है कि कृष्ण ने उन स्त्रियों को उनके अतीत के कारण सामाजिक बहिष्कार के हवाले नहीं किया, बल्कि उन्हें गरिमा और सुरक्षा प्रदान की। आधुनिक संदर्भ में यह प्रसंग समाज द्वारा पीड़ित और बहिष्कृत लोगों के पुनर्सम्मान की प्रेरणा देता है।
श्रीकृष्ण को केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि असाधारण राजनीतिक दूरदर्शी और कूटनीतिज्ञ भी माना जाता है। महाभारत में श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व विराट रूप में सामने आता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले उन्होंने शांति स्थापित करने के लिए हर संभव प्रयास किया। उन्होंने स्वयं हस्तिनापुर जाकर दुर्योधन से पांडवों के लिए न्यूनतम न्यायपूर्ण समाधान स्वीकार करने का आग्रह किया, किंतु अहंकार और सत्ता-लिप्सा के कारण शांति का मार्ग बंद हो जाता है। युद्ध अनिवार्य होने पर भी श्रीकृष्ण ने हथियार न उठाने का संकल्प लिया और अर्जुन के सारथी बने। यही प्रसंग उनके व्यक्तित्व की महानता को सबसे अलग ढंग से प्रस्तुत करता है कि सर्वशक्तिमान माने जाने वाले ईश्वर स्वयं सारथी बनकर अपने भक्त और मित्र के रथ की लगाम थामते हैं। कुरुक्षेत्र में जब अपने ही परिजनों, गुरुओं और संबंधियों को सामने देखकर अर्जुन मोह और विषाद से भर गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्म, आत्मा, धर्म, योग और जीवन के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दिया। यही उपदेश आगे चलकर ‘श्रीमद्भगवद् गीता’ के रूप में मानवता की महान आध्यात्मिक धरोहर बना। गीता का केंद्रीय संदेश मनुष्य को कर्म से पलायन नहीं बल्कि निष्काम भाव से अपने कर्त्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देता है।  श्रीकृष्ण को समझना केवल उनकी लीलाओं को जान लेना नहीं है। उन्हें समझना जीवन की जटिलताओं को स्वीकार करते हुए उनमें सही मार्ग खोजने की कला को समझना है। वह हमें सिखाते हैं कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने विवेक, कर्त्तव्य और नैतिक साहस का त्याग नहीं करना चाहिए। 
वह यह भी बताते हैं कि धर्म केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं, बल्कि अन्याय के सामने खड़े होने, दुर्बल की रक्षा करने और अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करने का नाम है। मथुरा के कारागार में जन्म लेने वाले श्रीकृष्ण जब गोकुल की गलियों में मुस्कान बिखेरते हैं, गोवर्धन उठाकर समुदाय की रक्षा करते हैं, सुदामा को गले लगाते हैं, शांति का संदेश लेकर हस्तिनापुर जाते हैं और अंतत: कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हैं, तो उनके जीवन की पूरी यात्रा मनुष्य को जीवन के अनेक सत्य समझाती है। शायद इसीलिए श्रीकृष्ण किसी एक परिभाषा में सीमित नहीं किए जा सकते। श्रीकृष्ण आस्था हैं तो दर्शन भी हैं, प्रेम हैं तो नीति भी हैं, करुणा हैं तो पराक्रम भी हैं, आनंद हैं तो संघर्ष भी हैं और ईश्वर हैं तो मनुष्य के भीतर जागृत होने वाली चेतना भी हैं।  

-मो. 94167-40584

#हर युग में मानवता के मार्गदर्शक भगवान श्रीकृष्ण